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अमिताभ बच्चन ने जब पिता से पूछा, “मुझे पैदा क्यों किया”

फादर्स डे स्पेशल।।
परिवार का मुखिया होने के नाते अनुशासन से लेकर आर्थिक पक्ष तक की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी उनके कन्धों पर होती है। ऐसे में ज्यादातर सख्त दिखने वाले इंसान (पिता) के दिल में झांक कर देखिए तो वहां आपको परिवार के लिए त्याग करने वाला नरम दिल इंसान और सच्चा दोस्त मिलेगा। तभी तो, जब भी सर्वोच्च की बात आती है तो उसे पिता से जोड़ दिया जाता है और हम ईश्वर को भी परम पिता पुकारते हैं। आज फादर्स डे के मौके पर कुछ नामचीन हस्तियों की नजर से देखते हैं कि कैसे होते हैं पिता...


अमिताभ बच्चन ने अपने एक साक्षात्कार में अपने पिता हरिवंशराय बच्चन के बारे में कहा, “वे काफी सख्त इंसान थे। हमारी बहुत ज्यादा बातचीत नहीं होती थी। एक बार मैंने गुस्से में पूछ लिया था कि उन्होंने मुझे पैदा ही क्यों किया? इसके जवाब में बाबूजी ने एक कविता लिखी थी-

जिंदगी और जमाने की कशमकश से घबराकर, 
मेरे बेटे मुझसे पूछते हैं कि हमें पैदा क्यों किया था?
और मेरे पास इसके सिवाय कोई जवाब नहीं है कि, 
मेंरे बाप ने मुझसे बिना पूछे मुझे क्यों पैदा किया था? 
और मेरे बाप को उनके बाप ने बिना पूछे,
उन्हें और उनके बाबा को बिना पूछे, 
उनके बाप ने उन्हें क्यों पैदा किया था?
जिंदगी और जमाने की कशमकश पहले भी थी, 
आज भी है शायद ज्यादा कल भी होगी, शायद और ज्यादा…
तुम ही नई लीक रखना, अपने बेटों से पूछकर उन्हें पैदा करना।”

अमिताभ अपने बाबूजी को आज भी बहुत याद करते हैं। उनका कहना है, “मुझे लगता है कि मैं उनके साथ जितना भी समय बिता पाया वो काफी कम था, क्योंकि वे बहुत व्यस्त हुआ करते थे। काश मैं उनके साथ थोड़ा और वक्त बिता पाता और उनके विचारों को समझ पाता। जीवन के अंतिम दिनों में जब वे निरंतर कमजोर होते जा रहे थे, उन्होंने कहा था कि जब तक जीवन है, तब तक संघर्ष है।”
(मुकेश अंबानी और धीरूभाई अंबानी)

आज भी वो हमारे साथ हैं

मुकेश अंबानी को लगता है आज भी उनके पिता ‛धीरूभाई अंबानी’ उनके साथ हैं। मुकेश कहते हैं,“जैसा कि गीत में कहा गया है- आत्मा न पैदा होती है और न मरती है। इसी तरह धीरूभाई हमारे दिलों में जिंदा हैं। मुझे आज भी लगता है कि वो यहीं कहीं बैठे हुए हैं और हमें देखकर मुस्कुरा रहे हैं। मेरे पिता कालजयी इतिहासपुरुष हैं और वह हर पीढ़ी के भारतीयों के लिए आदर्श व प्रेरणास्रोत हैं।” वे बताते हैं कि जब मैं स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़ाई खत्म कर लौटा, तो 25 साल का था। एक दिन बिजनेस सीखने के लिए पिता के पास बैठा हुआ था। मैंने उनसे पूछा- मुझे क्या काम करना चाहिए? तो मेरे पिता ने कहा- अगर तुम नौकरी करते हो, तो मैनेजर हो, अगर आंत्रप्रेन्योर बनते हो, तो तुम्हें पता चल जाएगा कि क्या करना है? मैं तुम्हें कुछ नहीं कहूंगा। खुद ही समझो कि तुम क्या करना चाहते हो? मुकेश मानते हैं कि आज वे जो भी हैं अपने पिता की बदौलत हैं, क्योंकि सपनों को पूरा करने का हौसला पिता ने दिया। 
(आदित्य बिड़ला और कुमार मंगलम)


मेरे भीतर से श्रेष्ठ कैसे निकलेगा, वे जानते थे

पिता काफी व्यस्त रहा करते थे, लेकिन उन्होंने हमेशा मेरे लिए समय निकाला। मुझे याद है कि उन्होंने कभी मेरे स्कूल का कोई फंक्शन मिस नहीं किया। उन्हें पता रहता था कि मेरे दोस्त कौन हैं। इतना ही नहीं, वे यह भी जानते थे कि मैं क्या कर रहा हूं। मगर मैं उनसे डरता भी था। एक बार ऐसा कॉलेज के दिनों में हुआ। मैं बी. कॉम की पढ़ाई कर रहा था। पिता मुझे फोन करते हैं और कहते हैं ‘कुमार मुझे लगता है, इसके साथ-साथ तुम्हें सीए का कोर्स भी कर लेना चाहिए।’ हैरानी इस बात की थी कि तब परीक्षा में सिर्फ दो महीने का समय रह गया था। हकीकत तो यह है कि मैं तो सीए का कोर्स करना ही नहीं चाहता था, लेकिन इतनी हिम्मत नहीं जुटा सका कि पिता को ना कह दूं। अगर उन्होंने कहा कि यह काम सही है, तो मैं वह करता ही था। असल में वे जानते थे कि मेरे भीतर से सर्वश्रेष्ठ कैसे निकालना है। हालांकि मेरे दादाजी ने मेरे पिता से और पिता ने मुझसे साफ कह रखा था कि जब बात बिजनेस की हो तो फैसले खुद ही लेने है। फिर उन फैसलों की जिम्मेदारी भी खुद उठानी है। यही सीख पिता के जाने के बाद मेरे काम आ रही है। मुझे याद है कि ऐसी सीख मुझे 15 साल की उम्र से ही मिलने लगी थी। मैं कंपनी की मीटिंग्स में पिता के साथ जाने लगा था और मीटिंग के बाद अक्सर उनसे सवाल-जवाब करता था।
(सज्जन जिंदल और ओपी जिंदल)

“जब दूसरे दीवार देखते हैं, मैं दरवाजे देखता हूं”

मैं जब मुड़कर देखता हूं तो पिताजी के साथ बिताए प्यारभरे क्षण याद आते हैं। हम उन्हें बाऊजी कहते थे। वे अक्सर कहते थे, ‘जब दूसरे लोग दीवार देखते हैं, मैं दरवाजे देखता हूं।’ ठीक इसी तरह उन्होंने हमारी परवरिश की। उन्होंने मुझे जो अमूल्य शिक्षा दी वह बताने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। उनके जोश और लगन से तो सभी परिचित हैं, लेकिन उनका आभामंडल सादगीभरा रहा। उन्होंने 17 साल की किशोरवय में आंत्रप्रेन्योरशिप की यात्रा शुरू की थी। इस यात्रा में उन्होंने लाखों जिंदगियों को प्रेरणा दी, जिनमें समाज और बिजनेस से जुड़े लोग भी समान रूप से शामिल हैं। वे कहते थे, ‘ओम के पैर नहीं हैं, पहिए हैं।’ उन्होंने सच्चे तौर पर एक पीढ़ी को जीना सिखाया। मैं जब छोटा था, वे हमेशा कहते थे सपने देखो। उन्होंने मुझे कभी रोका या टोका नहीं। उन्होंने हमेशा हम भाइयों को फ्री हैंड दिया। उनका मेहनती व्यक्तित्व न केवल सीखने में जोश भरने की प्रेरणा देता था, बल्कि मुझे कड़े परिश्रम और प्रतिदिन बेहतर होते रहने के लिए प्रेरित भी करता था, मैंने ऐसा ही किया। मेरा लक्ष्य खुद को उनके सामने साबित करना नहीं था, बल्कि उनके विज़न के अनुरूप खुद को योग्य बनाना था। उनका नजरिया उनके प्यारभरे और दूसरों का ध्यान रखने वाले व्यवहार से उजागर होता था।'
(प्रकाश पादुकोण और दीपिका)

छोटी-छोटी बातों का ख्याल रखते हैं

मैं अपने डैडी की लिटिल गर्ल और सपोर्ट सिस्टम दोनों हूं। कभी हम हंसी-मजाक करते हैं तो कभी एक-दूसरे की टांग खिचाई करते हैं। बचपन में जब मैं कोई शरारत करती थी तो वे बहुत सख्ती से पेश आते थे। कभी-कभी तो स्टोर रूम में बंद कर देते थे। एक एथलीट होने के कारण वे अलग तरह के डीएनए से बने थे। उन्होंने हमेशा मुझे और मेरी बहन को गाइड किया, लेकिन अपनी सलाह हम पर थोपी नहीं। उन्होंने एक बार कहा था कि आप हर तरह के स्टार बन सकते हैं। दुनिया में भारी सफलता पा सकते हैं, लेकिन अगर आप अच्छे इंसान नहीं हैं तो आपको हमेशा याद नहीं रखा जाएगा। वे मुझे रिलेक्स देखकर बहुत खुश होते हैं। जब कभी भी मैं बेंगलुरू में होती हूं, तो वे सारे असाइनमेंट अलग रख देते हैं और मेरे साथ रहते हैं। वे बहुत छोटी-छोटी बातों का भी ध्यान रखते हैं। मुझे एयरपोर्ट छोड़ने जाते हैं। घर से एयरपोर्ट तक जाने के 45 मिनट हमारे लिए बहुत कीमती होते हैं। वे मेरी सारी फिल्में देखते हैं और मैं जो कुछ भी करती हूं उसे पसंद करते हैं। वे मेरी फिल्मों में से हमेशा कुछ न कुछ अच्छा निकाल ही लेते हैं। मेरे आलोचकों में मेरी मां और बहन हैं। उन्होंने मुझे सलाह दी है, जो आपके कंट्रोल में न हो उस पर कभी झल्लाना नहीं। चीज अगर आपके कंट्रोल में न हों तो उस पर पसीना मत बहाओ।
(ऋषि कपूर की गोद में रणबीर)

मैं उनसे आज भी डरता हूं

मैं जब बड़ा होने लगा तो उन्हीं की तरह का एक्टर बनना चाहता था। एक्टिंग के प्रति उनमें कमाल का जुनून और उत्साह है। हम दोनों में टिपिकल पुराने जमाने के बाप-बेटे वाला संबंध है। मैं तो उनसे आज भी नजरें मिलाकर बातें नहीं कर पाता। वे मेरे साथ उसी तरह का रिश्ता रखना चाहते थे, जैसा मेरे दादाजी यानी उनके पिताजी के साथ उनका था। बचपन में उनके साथ डिनर टेबल तक पर मैं डरता था। तब मुझे सब्जी बहुत अच्छी नहीं लगती थी। चिकन खाया करता था। उस पर अगर वे मुझे नॉर्मल आवाज में भी सब्जी खाने को कहते तो मेरी रुलाई फूट पड़ती थी। वे स्टैंड लेने वालों में से एक हैं। आलोचनाओं की परवाह नहीं करते और अपनी बात रखकर ही मानते हैं। वे आसानी से मेरी तारीफ नहीं करते। मम्मी से कहलवा देते हैं। जब भी मैं कुछ अच्छा करता हूं, तो वे बहुत कम शब्दों में कहकर निकल जाते हैं। उनका यह तरीका भी मुझे अच्छा लगता है। इस बहाने मैं ज्यादा चार्ज्डअप रहता हूं। वे बड़े जुनूनी हैं। जो भी चीज या बात उन्हें अच्छी लग जाए, वे उसे शिद्दत से निभाते हैं। जैसे इस उम्र में भी अलग-अलग रोल करने की उनमें चाह है। रिश्तों के मामलों में वे बड़े कमिटेड इंसान हैं। जो इंसान उन्हें भा गया, वे उनका साथ मरते दम तक निभाने वालों में से एक हैं।
■ (इनपुट और फोटो भास्कर)

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