कांग्रेस की ओर से दिल्ली में आयोजित इफ्तार पार्टी आयोजन से पहले ही चर्चा का विषय बन गई। इसमें कौन-कौन शामिल होगा, ज्यादातर उत्सुकता इसी के इर्दगिर्द मंडराती रही। कारण महागठबंधन की एकजुटता दिखाने का अच्छा अवसर था। हालांकि, व्यस्तताओं के बहाने कई बड़े चेहरे नदारद रहे, तो कुछ शामिल भी हुए। इन सबके बीच एक बार फिर भारतीय राजनीति का वह चेहरा उभरा, जिसमें एकाधिकारवादी प्रवृत्तियों को समय-समय पर झटका देने की क्षमता अंतर्निहित है। जब भी विरोधी दल एक हुए, वे दीर्घजीवी भले न हुए हों, उन्होंने केंद्र में सत्तारूढ़ दल की राजनीतिक प्रवृत्तियों में जरूरी संशोधन करने का काम किया। गैर-कांग्रेसवाद इसी का नतीजा था। ताजा तस्वीर गैर-मोदीवाद या गैर-भाजपावाद की बन रही हैं! शरद पवार जैसे कद्दावर नेता वर्तमान राजनीतिक स्थिति की तुलना
1977 से करते हैं, जब इंदिरा गांधी को हराने के लिए सभी विरोधी दलों ने हाथ मिला लिये थे। हालांकि, 1977 से आज की तुलना इसलिए नहीं की जा सकती कि तब बहुत सारे क्षेत्रीय दलों को एक मंच पर ला देनेवाला आपातकाल जैसा बड़ा कारक मौजूद था। किंतु, गैर कांग्रेसवाद के विरोध में विपक्ष एकजुट हुआ है और मौजूदा केंद्र सरकार भी इसी का परिणाम है।
एकाधिकारी प्रवृत्ति के विरोध में महगठबंधन का मन तो बना है, लेकिन इसे अमली जामा पहनाना टेढ़ी खीर है। राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस एवं क्षेत्रीय दलों का संयुक्त मोर्चा बनने में इतने अधिक अंतर्विरोध हैं कि उसके वास्तव में बन जाने तक वह सवालों के घेरे में ही रहेगा। कुछ क्षेत्रीय दलों की कांग्रेस से अपने राज्यों में ही बड़ी लड़ाई है, तो कुछ कांग्रेस से भी उतना ही परहेज करते हैं, जितना भाजपा से। इसके आलावा उनके नेताओं की अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं, जिससे टकराव और बिखराव की संभावना बनी हुई है। उधर, भाजपा भी विपक्ष का नेता कौन? सवाल उठा कर महागठबंधन में बिखराव को हवा दे रहा है, क्योंकि सच यह है कि विरोधी दलों के पास मोदी के मुकाबले कोई बड़ा नेता है, न ही वे ज्यादा दिन तक एक रह पायेंगे।
कुल मिलाकर, भारतीय राजनीति एक बार फिर अपने पुराने मूड में है। जब कांग्रेस की कुछ अतियों ने बीच-बीच में क्षेत्रीय दलों को उभारा और फिर भाजपा की अखिल-भारतीयता को जन्म दिया। इन सबमें दिलचस्प यह है कि गैर-कांग्रेसवादी विचार बनने में बीस साल का लंबा वक्त लगा, जबकि मोदी सरकार की नीतियों और कार्यशैली के विरोध में गैर-भाजपावाद पांच वर्ष में ही कुनमुनाने लगा है।
1977 से करते हैं, जब इंदिरा गांधी को हराने के लिए सभी विरोधी दलों ने हाथ मिला लिये थे। हालांकि, 1977 से आज की तुलना इसलिए नहीं की जा सकती कि तब बहुत सारे क्षेत्रीय दलों को एक मंच पर ला देनेवाला आपातकाल जैसा बड़ा कारक मौजूद था। किंतु, गैर कांग्रेसवाद के विरोध में विपक्ष एकजुट हुआ है और मौजूदा केंद्र सरकार भी इसी का परिणाम है।
एकाधिकारी प्रवृत्ति के विरोध में महगठबंधन का मन तो बना है, लेकिन इसे अमली जामा पहनाना टेढ़ी खीर है। राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस एवं क्षेत्रीय दलों का संयुक्त मोर्चा बनने में इतने अधिक अंतर्विरोध हैं कि उसके वास्तव में बन जाने तक वह सवालों के घेरे में ही रहेगा। कुछ क्षेत्रीय दलों की कांग्रेस से अपने राज्यों में ही बड़ी लड़ाई है, तो कुछ कांग्रेस से भी उतना ही परहेज करते हैं, जितना भाजपा से। इसके आलावा उनके नेताओं की अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं, जिससे टकराव और बिखराव की संभावना बनी हुई है। उधर, भाजपा भी विपक्ष का नेता कौन? सवाल उठा कर महागठबंधन में बिखराव को हवा दे रहा है, क्योंकि सच यह है कि विरोधी दलों के पास मोदी के मुकाबले कोई बड़ा नेता है, न ही वे ज्यादा दिन तक एक रह पायेंगे।
कुल मिलाकर, भारतीय राजनीति एक बार फिर अपने पुराने मूड में है। जब कांग्रेस की कुछ अतियों ने बीच-बीच में क्षेत्रीय दलों को उभारा और फिर भाजपा की अखिल-भारतीयता को जन्म दिया। इन सबमें दिलचस्प यह है कि गैर-कांग्रेसवादी विचार बनने में बीस साल का लंबा वक्त लगा, जबकि मोदी सरकार की नीतियों और कार्यशैली के विरोध में गैर-भाजपावाद पांच वर्ष में ही कुनमुनाने लगा है।
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