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बेबाक हस्तक्षेप

जम्मू-कश्मीर में बढ़ती चुनौतियां को देखते हुए सरकार ने सख्ती का एक और कदम बढ़ा दिया है। सेना का ‛ऑपरेशन आल आउट’ तेज करने के साथ ही आतंकियों का जनाजा निकालने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। यानी अब सैन्य कार्रवाई में मारे गए दहशतगर्दों को दफनाने की जिम्मेदारी सुरक्षा बलों की होगी। हालांकि, सरकार के इस फैसले को लेकर राजनीति भी शुरू हो गई है।

खैर, बीते वर्षों में घाटी में ध्रुवीकरण की राजनीति तेज हुई है और द्वेष और नफरत की सियासत से घाटी में हालात और खराब हुए हैं। ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जब आतंकवादी को शहीद की तरह महिमामंडित करते हुए उसके जनाजे के वक्त घाटी में हजारों की संख्या में लोग इकट्ठा होते रहे हैं। इसका फायदा उठाकर वहां के चरमपंथी गुटों के कमांडर लोगों को न सिर्फ भड़काते हैं, बल्कि जनाजे की तस्वीरें और वीडियो आदि सोशल मीडिया के जरिए प्रसारित कर युवाओं को बरगलाने का भी काम करते हैं। परिणामस्वरूप कुछ घटनाएं सामने आईं, जब एक आतंकी मारा गया, तो उसकी प्रतिक्रिया में पांच नए आतंकी पैदा हो गए। इतना ही नहीं, पत्थरबाजों की बढ़ती भीड़ भी इसी ओर इशारा करती है। हालात को देखते हुए जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा एजंसियों के अधिकारी ऐसे जनाजों पर रोक लगाने की सिफारिश करते रहे हैं। केंद्र सरकार का यह फैसला उसी के मद्देनजर आया है।

वैसे भी, चरमपंथी संगठनों के प्रति स्थानीय युवाओं में आकर्षण बढ़ रहा है। समय रहते इस पर लगाम नहीं कस गया तो सुरक्षाबलों की परेशानी तो बढ़ेगी ही जम्मू-कश्मीर की स्थिति पर काबू पाना और मुश्किल हो जाएगा। वैसे भी, अगर मारे गए आतंकियों के जनाजे नए आतंकी बनाने का जरिया बन रहे हैं, तो उन पर रोक लगनी ही चाहिए। हालांकि, जनाजे में मृतक के चुनिंदा परिवार वाले बेशक शामिल हों और उनकी इच्छा के अनुरूप शव को दफनाया जाए। विदेशी आतंकवादी के मामले में भी यही होता है कि चार-छह स्थानीय लोगों की उपस्थिति में सुरक्षा बल उसके शव को दफना देते हैं। इस पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए और ऐसे मामलों को लेकर सियासत करना उचित नहीं है।
■ संपादकीय

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