काशी सत्संग: ...और श्रीकृष्ण वहीं रह गए - Kashi Patrika

काशी सत्संग: ...और श्रीकृष्ण वहीं रह गए

कहते हैं भगवान भाव के भूखे होते हैं और कभी-कभी भक्ति में उनका मन ऐसा रम जाता है कि बैकुण्ठ छोड़ वहीं बस जाते हैं। ऐसी ही कथा महाराष्ट्र के पंढरपुर शहर में स्थित जगत प्रसिद्ध भगवान विट्ठल और देवी रुकमणी के मंदिर के संदर्भ में है। भक्त इस मंदिर को विठोबा के मंदिर के नाम से भी जानते हैं।

भगवान विट्टल के इस प्रसिद्ध नगर में प्राचीन समय में उनका एक भक्त पुंडलिक रहता था। पुंडलिक भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था और श्रीहरि के दर्शनों की ईच्छा रखता था। इसके लिए वह हर तरह के जतन पूजा-पाठ, जप-तप और यज्ञ- अनुष्ठान करता रहता था। पुंडलिक की भक्ति से प्रसन्न होकर एक बार भगवान विष्णु उसके घर पर उसको दर्शन देने के लिए पहुंचे। उस समय पुंडलिक अपने माता-पिता की सेवा कर रहा था। वह अपने माता-पिता की सेवा में इतना तल्लीन था कि उसको भगवान के आने का पता नहीं चला।

भगवान ने उसको अपने आने की सूचना दी। पुंडलिक ने भगवान का स्वागत करने की बजाय भगवान के लिए एक ईंट रख दी और उनसे इंतजार करने को कहा। उसने उस वक्त यह जानने की कोशिश भी नहीं की कि दरवाजे पर कौन आया है।
माता-पिता की सेवा में सारी रात बीत गई और सवेरा हो गया। नगर के लोग अपनी दिनचर्या के लिए घरों से निकल गए। पुंडलिक की माता-पिता की सेवा से श्रीहरि इतने प्रसन्न हुए की उन्होंने स्वयं को मूर्ति रूप में परिवर्तित कर पुंडलिक के घर में निवास करने का निश्चय कर लिया।
कहा जाता है कि पंढरपुर के विट्ठल मंदिर में यही मूर्ति विराजमान है। वैसे ज्यादातर मंदिरों में श्रीकृष्ण के साथ राधा की मूर्ति विराजमान है, लेकिन इस मंदिर में श्रीहरी देवी रुक्मणी के साथ विराजमान हैं। सही भी है, भक्ति में शक्ति होती है और सच्चे भाव एवं माता-पिता की सेवा से प्रभु प्रसन्न होते हैं।
ऊं तत्सत..

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