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अव्यवस्था के बीच, राजनेता सर्वाहारी

नाकामियों की भी एक सीख होती हैं, जो उससे सीख पा जाता हैं वो जीता हुआ ही माना जाता हैं। पर आजादी के बाद से ही हमारे नेताओं ने ये जान लिया कि भारत का नागरिक गरीब और इतना कमजोर हैं कि इसे दबा कर रखो और रोटी के चंद टुकड़ों के लालच में ये अपना जमीर भी राजनेताओं को बेच सकता हैं। आज कुछ ऐसा ही माहौल देश में हैं जिसने राजनेताओं को सर्वाहारी बना दिया हैं। एक ओर वो जहाँ जनता को दिग्भ्रमित कर पांच साल के लिए सत्ता पे काबिज हो जाते हैं, वहीं दूसरी ओर आम जनता का सत्ता पाने के बाद खुलकर दोहन भी करते हैं।

ऐसा ही कुछ 2014 में भी हुआ जब जनता ने कांग्रेस से आजिज आकर एक बेहतर भविष्य के लिए मोदी को प्रधानमंत्री चुना। पर मोदी के बीते चार सालों से ज्यादा के शासन में जनता एक बार फिर खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही हैं। आम जनता की दुश्वारियों को दूर करना तो अलग मोदी ने आम जनता को नकार दिया और खुद कॉर्पोरेट घरानों के एजेंट के रूप में कार्य करने लगे। मोदी एकमात्र ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन पर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे हुए सबसे ज्यादा आरोप लगे हैं और मोदी ने हर बार उन आरोपों को झूठा बोलकर मुख्य मुद्दे से किनारा कर लिया हैं। 

भारत और विश्व 
आज पूरे विश्व में एक असमंजस की स्थिति बनी हुई हैं कि विश्व की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था को आखिर हो क्या गया हैं। भारत पूरे विश्व में अपनी एक अलग पहचान रखता हैं, जिसका सभी देशों से मधुर सम्बन्ध हैं। गाहे-बगाहे भारत पर आतंकवाद के रूप हमला करने वाले इसने अपने पडोसी पकिस्तान को भी गले लगाया हैं। चीन के साथ धोखा खाने के बाद भी इसने कभी चीन से वार्तालाप का रास्ता नहीं छोड़ा। यहाँ तक कि भारत ने उत्तर कोरिया जैसे तानाशाह को भी साधने का सफल प्रयास किया हैं।  

मोदी सरकार पिछले चार सालों में इसको समझ ही नहीं पाई और उसने एक के बाद एक गलतियां कि और परिणाम सामने हैं। आज भारत अंदर ही अंदर मोदी के शासन में टूट रहा हैं। देश धर्म,जात-पात, आमिर-गरीब के पैमाने पर टूट रहा हैं और मोदी अपने चुनावी जुमलों से बहार ही नहीं निकल पा रहे हैं। जब प्रधानमंत्री ही ऐसा हैं तो ऐसे में उनके अंदर के राजनेता आज सर्वाहारी हो गए हैं और जनता का खून चूस रहे हैं। तो ऐसे में भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था के मामले में पिछड़ जाए तो कोई असमंजस की बात नहीं हैं। 

देश और राज्य 
भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती हैं कि इसने इतने विशाल देश को अलग-अलग शासन व्यवस्था के रूप में बाट कर चलाने का प्रयास किया हैं। यह भारत जैसे विशाल देश की आवश्यकता भी हैं कि इसने केंद्र और राज्य शासन का बटवारा किया था। 2014 में मोदी के आते ही यह व्यवस्था पटरी से उतर गई। मोदी ने अपने शासन के पहले दो साल भरसक यह प्रयास किया कि वो इस व्यवस्था को पलट दे ताकि वह सुगमता से केंद्र के माध्यम से पूरे भारत पर शासन कर सके। मोदी इसमें बहुत हद तक सफल भी हुए और एक के बाद एक राज्यों के चुनाव जितने के बाद मोदी और मजबूत होते गए। जिस भी राज्य में बीजेपी जीती उसमे मोदी का परोक्ष शासन हो गया और राज्य के अधिकार गौण हो गए। 

पर जिस व्यवस्था का निर्माण सदियों पहले हुआ था उसके साथ मोदी ने धोखा किया और आज स्थिति यह हैं कि अगर किसी के घर में पानी भी नहीं आ रहा हैं वो मोदी को दोषी समझने को मजबूर हैं क्योकि उसके बीच के कड़ी को मोदी ने सिरे से नकार दिया था। अब जनता मोदी से हिसाब मांग रही हैं तो मोदी खुद को बचाने का प्रयास कर रहें हैं। 

इस सब के बीच राज्यों और केंद्र के अन्य नेता सर्वाहारी हो गए हैं जो कभी जनता पे लानत भेजते हैं तो कभी मोदी पे क्योकि मोदी ने स्वयं उन्हें उनकी जिम्मेदारी से मुक्त कर रखा हैं। 

बदलाव 
निकट भविष्य में भी इस व्यवस्था में कोई बदलाव की उम्मीद नहीं हैं क्योकि मोदी के सलाहकार मोदी नाम की माला ही आम जनता से जपवाना चाहते हैं। उन्हें पता ही नहीं हैं कि लोकतंत्र सामूहिक जिम्मेदारी का शासन होता हैं। 
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