तंग आ चुके हैं कशमकश-ए-जिंदगी से हम
ठुकरा न दें जहाँ को कहीं बे-दिली से हम।
मायूसी-ए-मआल-ए-मोहब्बत न पूछिए
अपनों से पेश आए हैं बेगानगी से हम।
लो आज हम ने तोड़ दिया रिश्ता-ए-उमीद
लो अब कभी गिला न करेंगे किसी से हम।
उभरेंगे एक बार अभी दिल के वलवले
गो दब गए हैं बार-ए-गम-ए-जिंदगी से हम।
गर जिंदगी में मिल गए फिर इत्तिफाक से
पूछेंगे अपना हाल तेरी बेबसी से हम।
अल्लाह-रे फरेब-ए-मशिय्यत कि आज तक
दुनिया के जुल्म सहते रहे खामुशी से हम।
■ साहिर लुधियानवी
ठुकरा न दें जहाँ को कहीं बे-दिली से हम।
मायूसी-ए-मआल-ए-मोहब्बत न पूछिए
अपनों से पेश आए हैं बेगानगी से हम।
लो आज हम ने तोड़ दिया रिश्ता-ए-उमीद
लो अब कभी गिला न करेंगे किसी से हम।
उभरेंगे एक बार अभी दिल के वलवले
गो दब गए हैं बार-ए-गम-ए-जिंदगी से हम।
गर जिंदगी में मिल गए फिर इत्तिफाक से
पूछेंगे अपना हाल तेरी बेबसी से हम।
अल्लाह-रे फरेब-ए-मशिय्यत कि आज तक
दुनिया के जुल्म सहते रहे खामुशी से हम।
■ साहिर लुधियानवी



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