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ओ पिया, पानी बरसा...

अज्ञेय “इत्यलम्”


ओ पिया, पानी बरसा!
घास हरी हुलसानी
मानिक के झूमर-सी झूमी मधुमालती
झर पड़े जीते पीत अमलतास
चातकी की वेदना बिरानी।

बादलों का हाशिया है आस-पास
बीच लिखी पाँत काली बिजली की
कूँजों के डार-- कि असाढ़ की निशानी!
ओ पिया, पानी !
मेरा हिया हरसा।

खड़-खड़ कर उठे पात, फड़क उठे गात।
देखने को आँखें, घेरने को बाँहें,
पुरानी कहानी !
ओ पिया, पानी !
मेरा जिया तरसा।
ओ पिया, पानी बरसा।
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