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बेबाक हस्तक्षेप

बिहार शिक्षा प्रणाली की खामियां एक बार फिर चर्चा में है। सड़क पर उतरे छात्रों ने ‛बिहार विद्यालय परीक्षा समिति’ (बीएसईबी) को कठघरे में खड़ा किया है, जो जांच का विषय है। किंतु, इन परीक्षा परिणामों से एक और तस्वीर सामने आती है, जिसकी लगभग 70 वर्षों से अनदेखी हो रही है, लचर शिक्षा नीति। इसकी वजह से दक्षिण के राज्यों के मुकाबले हिंदी पट्टी के राज्य काफी पीछे हैं।

बिहार बोर्ड के नतीजे में एक गंभीर बात उभरकर सामने आयी है कि इस बार विज्ञान में उत्तीर्ण होने वाले  छात्रों का प्रतिशत बहुत कम है। बिहार में 12वीं की परीक्षा में विज्ञान  में लगभग 45 फीसदी छात्र उत्तीर्ण हो पाये हैं। गणित में बच्चों को पांच अंक तक मिले हैं। कमोवेश यही स्थिति झारखंड की है। यहां भी 12वीं में विज्ञान पढ़ने वाले लगभग 48 फीसदी छात्र पास हो पाये हैं। यानी बिहार और झारखंड दोनों राज्यों में विज्ञान पढ़ने वाले आधे से अधिक छात्र फेल हो गये हैं। छात्र बोर्ड को नंबर की अनियमितता के लिए दोषी ठहरा रहे हैं। इसे ऐसे समझने की कोशिश करते हैं, सीबीएसई के छात्रों को उदारता से नंबर दिये जाते हैं। यहां टॉपर 500 में 499 नंबर ला रहे  हैं। 90 फीसदी नंबर पाने वाले बच्चों की संख्या बड़ी है। विज्ञान को तो छोड़िए, आर्टस के बच्चे भी 100 में 100 नंबर लाते हैं। दूसरी ओर बिहार और झारखंड बोर्ड के नंबरों से उनकी तुलना करें, तो वे आसपास भी नहीं है। बिहार और झारखंड के शिक्षकों की कड़ाई से नंबर देने की आदत अभी तक छूटी नहीं है। नतीजतन यह होता है दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों में जहां  प्रवेश का एक बड़ा आधार नंबर होते हैं, वहां सीबीएसई बोर्ड के बच्चों का  बोलबाला रहता है। यानी नंबरों का यह बड़ा अंतर आगे की राह कठिन कर देता है।

हिंदी राज्यों में शिक्षा की इन परिस्थितियों के लिए कई पहलुओं पर गौर करना जरूरी हो जाता है। एकमतो यह कि बाजारीकरण के इस दौर में न तो शिक्षक पहले जैसे रहे और न ही छात्रों से उनका पहले जैसा रिश्ता रहा। ऐसे आरोप भी लगते हैं कि शिक्षक अपना काम ठीक तरह से नहीं करते। इसमें आंशिक सच्चाई भी है कि बड़ी  संख्या में शिक्षकों ने दिल से अपना काम करना छोड़ दिया है। वे अपने दायित्व का निर्वाह नहीं कर रहे हैं। इसकी रोकथाम के उपाय करने होंगे, अध्यापकों को जवाबदेह बनाना होगा, लेकिन इसके लिए सरकार-प्रशासन भी जिम्मेदार है। प्रशासन लगातार शिक्षकों का  इस्तेमाल गैर शैक्षणिक कार्यों में करता है। शिक्षकों का तर्क है कि ऐसे में पढ़ाई का काम प्रभावित होता है।

कुल मिलाकर, अच्छी शिक्षा के बगैर बेहतर भविष्य की कल्पना नहीं की जा सकती। किसी भी समाज, देश, राज्य के आर्थिक और सामाजिक प्रगति के लिए मुख्य घटक शिक्षित तबका होता है, लेकिन शासन, प्रशासन की अनदेखी से हिंदी राज्यों में शिक्षा का स्तर गिरता जा रहा है। परिणामतः हिंदी राज्य विकास की दौड़ में पिछड़ते जा रहे हैं।
■ संपादकीय

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