काशी सत्संग: जब यमदेव से कुपित हो गए शिव - Kashi Patrika

काशी सत्संग: जब यमदेव से कुपित हो गए शिव


देवाधिदेव महादेव अपने भक्तों की रक्षा स्वयं करते हैं। एक भक्त के प्राण बचाने के लिए उन्होंने मृत्यु के देवता से कुपित होकर उसके प्राण हर लिए...
गोदावरी के तट पर ‘श्वेत’ नामक एक ब्राह्मण रहते थे। उनका सब समय निरंतर साम्ब सदाशिव की पूजा में व्यतीत होता था। वे अतिथियों को भी शिव समझकर उनका आदर-सत्कार किया करते थे। श्वेत का समय भगवान के ध्यान में बीतता था। उनकी आयु पूरी हो चुकी थी, किंतु उन्हें इस बात का ज्ञान न था। उन्हें न रोग था न शोक, इसलिए आयु पूरी हो चुकी है, इसका आभास नहीं हुआ। यमदूत समय से उन्हें लेने आएं, परंतु वे उनके घर में प्रवेश नहीं कर पा रहे थे। उधर, चित्रगुप्त ने मृत्यु से पूछा- मृत्युदेव! श्वेत अब तक यहां क्यों नहीं आया? तुम्हारे दूत भी नहीं आएं।

मृत्युदेव स्वयं उन्हें लेने दौड़े। गृह के द्वार पर यमदूत भय से कांपते दिखायी पड़े। उन्होंने कहा,‘नाथ, हम क्या करें? श्वेत तो शिव द्वारा सुरक्षित है। उसे तो हम देख भी नहीं पा रहे हैं, उसके पास पहुंचना तो अत्यंत कठिन है।’
दूतों की बात सुनकर मृत्युदेव का क्रोध और भभक उठा। वे झट ब्राह्मण के घर में प्रवेश कर गए और झपटे यह देखकर भैरव बाबा ने कहा- मृत्युदेव! आप लौट जाइये, किंतु मृत्युदेव ने उनकी बात को अनसुनी कर श्वेत पर फंदा डाल दिया। भक्त पर मृत्यु का यह आक्रमण भैरव बाबा को सहन न हुआ। उन्होंने मृत्यु पर डंडे से प्रहार किया। मृत्युदेव वहीं ठंड हो गए। यमदूत भागकर यमराज के पास पहुंचे। वे डर के मारे थर-थर कांप रहे थे। मृत्यु की मृत्यु सुनकर यमराज को बड़ा क्रोध हो आया। उन्होंने हाथ में यमदण्ड ले लिया और अपनी सेना के साथ श्वेत के पास पहुंच गए।

वहां भगवान शंकर के पार्षद पहले से ही खड़े थे। सेनापति कार्तिकेय के शक्ति अस्त्र से सेनासहित यमराज की भी मृत्यु हो गयी। यह समाचार सुनकर भगवान सूर्य देवताओं के साथ ब्रह्मा के पास पहुंचे और ब्रह्मा सबके साथ घटनास्थल पर आये। देवताओं ने भगवान शंकर की स्तुति की और कहा- भगवान ! यमराज सूर्य के पुत्र हैं। ये लोकपाल हैं। इन्होंने कोई अपराध या पाप नहीं किया है, अत: इनका वध नहीं होना चाहिए। इन्हें जीवित कर दें, नहीं तो अव्यवस्था हो जायगी। भगवन! आप से की हुई प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं होती।

भगवान आशुतोष ने कहा- मैं भी व्यवस्था के पक्ष में हूं। वेद की एक व्यवस्था है कि जो मेरे अथवा भगवान विष्णु के भक्त हैं, उनके स्वामी स्वयं हम लोग होते हैं। मृत्यु का उन पर कोई अधिकार नहीं होता। यमराज के लिए यह व्यवस्था की गयी है कि वे भक्तों को अनुचरों के साथ प्रणाम करें।

इसके बाद भगवान आशुतोष ने नंदी के द्वारा गौतमी गंगा (गोदावरी) का जल मरे हुए लोगों पर छिड़कवाया। तत्क्षण सब के सब स्वस्थ होकर उठ खड़े हुए। यानी जो ईश्वर का सच्चा भक्त होता है, प्रभु स्वयं उसके स्वामी होते हैं और वह जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो उनके द्वारा ही संचालित होता है।
ऊं तत्सत...

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