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'स्वप्न'- कविताओं की धूप-छाव...


मिट्टी का घर,
मिट्टी के बर्तन,
मिट्टी के सपने,
जीवित शरीर मिट्टी,
मृत शरीर भी मिट्टी,
सब जब मिट्टी ही है,
इस मिट्टी से परे स्वमं को कहाँ देखूँ,
कहाँ पाऊँ?
उत्तर बस इतना,
कुछ बंजर,कुछ उपजाऊ।
परंतु मैं स्वमं को इस मिट्टी में 
कहाँ पाऊँ?


-यशिका तिवारी-



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