केंद्र की सत्ता का मुख्य केंद्र कही और से संचालित होता है। गाहे-बेगाहे यह बात सामने आ जाती है। कश्मीर में गठबंधन टूटते समय एक बार फिर इसका एहसास हुआ। केरल से लेकर बंगाल तक, कर्नाटक चुनाव से लेकर कश्मीर में सत्ता के पतन तक, असम से लेकर गुजरात तक हर कही केंद्र और राज्य की नीतियों में 'एक संगठन' का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दखल दिखाई पड़ता हैं। राजनीतिक गलियारे में यह संगठन 'संघ' के नाम से जाना जाता है।
अपने अलग-अलग अनुसांगिक संगठनों के माध्यम से एक सामाजिक संगठन किस तरह लोकतंत्र को प्रभावित करता हैं ये देखना दिलचस्प हैं। वो भी तब जब पूरा भारत बेरोजगारी की मार झेल रहा हो और देश को एक मजबूत शासन व्यवस्था की आवश्यकता हैं। ऐसे में केंद्र की शक्ति का दो केंद्रों से संचालन कब तक भारत के आम नागरिकों को दिग्भ्रमित करता रहता हैं ये लोगों को निर्धारित करना हैं।
हालिया राजनीतिक बदलावों को देखे तो स्थिति स्पष्ट होती हैं पूर्व राष्ट्रपति का संघ के कार्यक्रम में उपस्थित होना और इस का राजनीतिक गलियारों में जम कर प्रचार करना, राम माधव का राष्ट्रीय सवयं सेवक संघ की ओर से केवल कश्मीर को देखने के लिए बीजेपी में भेजा जाना और उन का एक पत्रकार सम्मलेन में यह घोषणा करना की बीजेपी कश्मीर में समर्थन वापसी ले रही हैं। मोदी मंत्रिमण्डल के चेहरों का नागपुर से संचालन करना और पूरे देश में चुनी हुई सरकार के सामानांतर एक सरकार चलाना ये सभी कहीं न कहीं दृष्टिगोचर होते रहते हैं। वैसे, सत्ता के दोनों केंन्द्र (भाजपा-संघ) में भी मतभेद बार-बार उजागर होता है।
इन सब के बीच, सत्ता के दो केंद्रों के बीच फंसी जनता महंगाई, बेरोजगारी, काला धन, वादों-दावों को सहती पांच साल बीतने की बांट जोह रही है। “सबका साथ, सबका विकास” जुमलों तक सिमट कर रह गई और इस बार फिर जनता जाति, धर्म, सम्प्रदाय में बिखरती प्रतित हो रही है।
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