बेबाक हस्तक्षेप - Kashi Patrika

बेबाक हस्तक्षेप

“कबीरा खड़ा बाजार में...” जी हाँ, कबीर इस बार फिर बाजार में हैं, सहमति उनकी नहीं है, लेकिन खड़े कर दिए गए हैं! बात सबकी भलाई की भी नहीं है। सारा तामझाम सिर्फ सियासत के लिए है। लोकसभा 2019 का बाजार सज गया है, सो जनता को किस कदर लुभाया जाए, ताकि सत्ता की गद्दी बैठने को फिर से मिल जाए। बस सबकुछ इसी के इर्दगिर्द बुना जा रहा है। विकास तो सिर्फ धनिकों का हुआ, जिसका मतदान प्रतिशत इतना नहीं कि उसके भरोसे गद्दी मिल जाए। आम लोग जो घंटों पंक्ति में खड़े रहकर देश और अपनी किस्मत बदलने की कोशिश करते हैं, उनके हाथ कुछ खास लगा नहीं। तो, विकास, रोजगार, महंगाई, पानी की कमी इन मुद्दों पर बात करने से सरकार का ही नुकसान है। क्यों न फिर जाति-धर्म-समुदाय-प्रांत पर एक बार फिर राजनीति चमकाने की तैयारी है और हर राजनीतिक दल इसी कसरत में जुटा है।

यहीं वजह है दो साल से पैसों के अभाव में भले ‛मगहर महोत्सव’ टल रहा था। मगर, परिनिर्वाण दिवस पर अचानक राज्य और केंद्र दोनों को संत कबीर और उनकी वाणी याद आ गई। समझने की कोशिश करें, तो देशभर मे
एक तो देशभर में कबीर को मानने वालों की संख्या कम से कम चार करोड़ है, जिनमेँ ज्यादातर दलित-पिछड़े हैं। दूसरे कबीर में सभी सम्प्रदाय के लोग आस्था रखते हैं और देशभर में फैले कबीरपंथियों की आस्था मगहर में है, इसलिए इस छोटे से मंच से सभी को साधने की तरकीब है।

वैसे भी, केंद्र की सत्ता के लिए यूपी का साथ महत्व रखता है और पूर्वांचल के दस जिलों की 13 सीटों पर इस पंथ को मानने वाले लोगों का खासा प्रभाव है। जानकारों के मुताबिक दलितों-पिछड़ों को ही एक छत के नीचे लाकर भाजपा पहले भी 13 में से 12 सीटें जीत चुकी है। उत्तर प्रदेश के अलावा देश के तमाम राज्यों में कबीर पंथी फैले हुए हैं। कई जगहों पर इनकी अलग-अलग गद्दियां हैं और कुछेक भिन्नताओं के बावजूद कबीर के प्राकट्य स्थल काशी और निर्वाण स्थल मगहर में सबकी अगाध श्रद्धा है। महत्वपूर्ण यह भी है कि महागठबंधन अगर बन गया, तो भाजपा को दलित-पिछड़ा गठजोड़ नुकसान पहुंचा सकता है। ऐसे में, यह समझना मुश्किल नहीं लगता कि लोकसभा चुनाव से ऐन पहले कबीर के प्रति अचानक उमड़े प्रेम के पीछे क्या है?

हालांकि, राजनीतिक जानकारों का मनना है कि यूपी-बिहार में दलितों और पिछड़ों को मठों के जरिए साध पाना इतना आसान नहीं है। यहां राजनीति के केंद्र में मठ नहीं हैं और मठ के महंतों का ऐसा राजनीतिक प्रभाव भी नहीं है। मुश्किल यह भी है कि दलित-पिछड़ों को साधने के चक्कर में भाजपा का पारंपरिक मतदाता उससे दूरी बना सकता है, क्योंकि उसके लिए आस्था के केंद्र अयोध्या और राम हैं, न कि मगहर और कबीर।

कुल मिलाकर, भाजपा का ‛मगहर’ प्रेम कितनी कारगर होती है, यह तो वक्त ही बताएगा। फिलहाल, सोशल मीडिया पर एक और चर्चा है,“जीते काशी, मरते मगहर।” 
■ संपादकीय

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