Pages

Pages

Pages

घंट-घड़ियाल में गूंजी 'अजान'

बनारस में घंट-घड़ियाल में गूंजती अजान की पाक आवाज जब कानों में पड़ती है, तब आप एक अनोखे आध्यात्मिक अनुभव से गुजरते हैं, जिसे शब्दों में नहीं पिरोया जा सकता। बस, इतना ही कह सकते हैं कि गंगा जमुनी तहजीब को सहेजे-समेटे काशी में यहां पैगंबर भी उतने ही मौजूं हैं, जितने शिव। बनारसियों की इबादत का अंदाज-ए-बयां भी वही है, जिसमें रूह को ऊपर और जुबान को नीचे रखा गया है। शायद ऊपरवाले को भी अकीदत की यही नुमाइंदगी पसंद है, तभी यह शहर जिंदा है और यहां के लोग जिंदादिल।


रमजान के 30 रोजों के बाद लोग टीकटकी लगाए चांद के दीदार का बेसब्री से इंतजार करते हैं। चांद निकला भी, पर सिर्फ कुछ हिस्सों में मेहरबान हुआ। भारत में यह इन्तजार एक दिन लंबा खिंच गया। शहर बनारस में शनिवार को ईद मनाई जाएगी, जिसके मद्देनजर बाजार गुलजार हैं, तो खाटी बनारसीपन ओढ़े हंसते-मुस्कुराते चेहरों के बीच धर्म-मजहब का भेद मिट जाता है। एक बनारसी त्यौहार मनाने में सराबोर है, तो दूसरा बधाई की सौगात देने को। यकीन नहीं आता, पर सच है तभी तो, इस शहर में हिंदू हाथों से बनी सेवइयां न सिर्फ बनारस के मुस्लिम भाइयों द्वारा खायी जाती हैं, बल्कि पूरे देश का जायका बढ़ाती है। यह आज की बात नहीं तकरीबन 40 साल पुरानी बात है...

यहां हिंदू करते हैं ईद की तैयारी

काशी के भदऊं चुंगी इलाके में है सेवईं मंडी। यहां की बनी सेवईं किमामी या छत्ता या बनारसी सेवईं के नाम से  प्रसिद्ध है। यह पूरी तरह से हिंदू बस्ती है, जिसमें तकरीबन चालीस वर्षों से यहां के हिंदू परिवार के लोग रमजान शुरू होते ही ईद की तैयारी में जुट जाते हैं। महिला-पुरुष सब मिल कर बनाते हैं सेवईं। छत पर लोहे के एंगल या बांस पर सेवई को सुखाया जाता है। यह कारोबार पीढ़ियों से चल रहा है।
इन हिंदुओं द्वारा बनाई जाने वाली सेवईं का तौर-तरीका कुछ अलग है। ये लोग महीन, मध्यम और मोटी तीन तरह की सेवइयां बनाते हैं। इसके चलते इनके हाथ की बनी सेवईं की मांग न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि महाराष्ट्र, राजस्थान, गुजरात, बिहार सहित कई अन्य प्रांतों में भी है। व्यापारियों का कहना है कि अब धीरे-धीरे हर जगह यहां की सेवइयां मशहूर हो रही है, क्योंकि जो खासियत यहां की सेवइयों में मिलती है, वह कहीं और नहीं मिलती। इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि आज भी बनारस के इस मोहल्ले में अधिकांश घरों में सेवइयों का निर्माण हाथों से होता है न की मशीन से।

विशाल भारत संस्था ने बटोरी “फितरा” से दुआ
हर धर्म-सम्प्रदाय के अपने कुछ नियम-उसूल होते हैं, जिसके इर्द-गिर्द जिंदगी का तानाबाना बुना होता है। किंतु सबके मूल में नेकी-सच्चाई-इंसानियत ही है। रमजान का महीना भी शारीरिक-आध्यत्मिक शुद्धि का माना जाता है, जिसमें की गई हर नेकी का अल्लाह तआला सत्तर गुना अता करते हैं। इस पवित्र माह में जकात (दान) और ईद पर दिया जाने वाला फितरा खास महत्व रखता है। बनारस में इस बार “फितरा” की दुआ गरीब परिवारों को अनाज बांटकर ‛विशाल भारत संस्था’ ने बटोरी। संस्था द्वारा संचालित अनाज बैंक से गुरूवार को 250 मुस्लिम परिवारों को आटा, दाल, चावल, तेल आदि बांटा गया। अनाज पाकर चेहरों पर सुकून उभर आया, जिसमें भाव था कि ईद पर उनके मकां में भी रौनक होगी। साथ ही धर्म-सम्प्रदाय से इतर मददगार के लिए होठों पर दुआ।
पुलिस की कसरत
ईद के त्यौहार को कोई बुरी नजर न लग जाए, इसलिए प्रशासन ने कमर कस ली है और मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में मुस्तैदी से डट गई है। वाराणसी पुलिस के अधिकारी गुरुवार को सड़क पर उतरे। इस दौरान एडीजी जोन पीवी रामाशास्त्री, आईजी रेंज विजय सिंह मीना ने शहर के कई इलाकों का निरीक्षण करने के साथ ही फुट पेट्रोलिंग भी की। इस दौरान संबंधित क्षेत्राधिकारी व एसपी सिटी भी संग-संग मौजूद रहे। स्थानीय पुलिसकर्मियों को आवश्यक निर्देश भी दिए गए। अमन और शांति के मद्देनजर गुरुवार शाम कोतवाली सीओ और सिटी मजिस्ट्रेट ने पंचगंगा घाट स्थित धरहरा मस्जिद पहुंचकर वहां शांति व्यवस्था का जायजा लिया। शहर के आदमपुर, कोतवाली, लक्सा, दशाश्वमेध और चौक थाना इलाकों की पुलिस ने अपने-अपने थानाध्यक्षों के साथ स्थानीय लोगों को अमन कायम रहने का भरोसा दिलाया।

वैसे भी, दिलों में दूरियां और धर्म का धंधा तो आदि काल से सियासतदारों की सौगात रही है, वरना रोजमर्रा की जद्दोजहद में उलझा हर इंसान आम होता है, जिसकी जरूरत रोटी-कपड़ा-मकान के जुगाड़ तक ही सिमटी रहती है। सही ही है, “मजहब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना...।” और गंगा-जमुनी तहजीब में सराबोर शिव की नगरी में यह उतना ही सच है, जितना की स्वयं भोलेनाथ।
सोनी सिंह

No comments:

Post a Comment