देश की सियासत में इन दिनों तेजी से बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। जनता राजनीतिक दलों पर अब दीर्घकालिक विश्वास करने के मूड में नहीं दिख रही और अपनी रोजमर्रा की जरूरतों एवं मूलभूत सुविधाओं को लेकर सजग भी है और उस पर पैनी नजर भी बनाए है। हालांकि, देश के सियासतदारों में भी परिवर्तन हो रहा है और लोक की भलाई को परे रख ‘तंत्र’ सिर्फ और सिर्फ सत्ता की जुगार तक निहित होता जा रहा है। उसी के इर्दगिर्द सारे प्रपंच रचे जा रहे हैं। देश में कई जगह विरोध के सुर हैं, घाटी में मौत का तांडव हो रहा है, महंगाई तब-अब आम आदमी को परेशान किए है, हवा में सांस लेना दूभर हो रहा है...लेकिन सभी दल और उनके सेवक-सिरमौर राजनीति चमकाने में व्यस्त हैं। लोक के प्रति सत्ता के संवेदनहीनता की यह स्थिति लोकतंत्र के हित में नहीं दिख रही है।
नॉर्थ-ईस्ट जल रहा है, राहुल गांधी के लिए इफ्तार पार्टी एवम् प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के फिटनेस वीडियो की खिल्ली उड़ाना महत्वपूर्ण रहा। कश्मीर में हो रही मौतों के बीच प्रधानमंत्री विकास का पाठ पढ़ाते रहे, जबकि देश में विकास की सबसे बड़ी दस योजनाएं मात्र 2 से 3 प्रतिशत ही पूरी हुई हैं। और महंगाई पिछले वर्ष से दोगुनी हो गई है।
देशभर में किसान दुर्दशा, आम जन पर बढ़ता आर्थिक बोझ, युवाओं में भविष्य की चिंता, दलितों में असुरक्षा की बढ़ती भावना, भारत का करोड़ों लूटकर विदेश में बैठे धनकुबेर इन सब मुद्दों का समाधान तलाशने की बजाय सरकार और विपक्ष लोकसभा और तीन राज्यों के निकटतम विधानसभा चुनाव में 'सत्ता पर कैसे काबिज हों' की नीति बनाने में जुटा है। स्थिति यह है कि कुर्सी के लालच में कोई हाथ किसी भी शर्त पर थामने की तैयारी चल रही है! नतीजतन छोटे-मोटे स्थानीय राजनीतिक दल भी केंद्र की सत्ता का महत्वपूर्ण अंग हो रहे हैं और उस पर बैठने के सपने भी बुन रहे हैं। राजनीति का यह बदलाव देशहित में तो कदापि नहीं दिख रहा, किंतु जनता के पास विकल्प भी नहीं है, सो वो भी समय-समय पर पारी-पारी सरकार बदलकर अपनी स्थिति बदलने की कोशिश करती दिखती है। यह तो, तय है कि अब 20 साल तक आँखें मूंदकर हालात बदलने का इंतजार करने का रिस्क जनता भी उठाने को तैयार नहीं है, यानी देश तो बदल ही रहा है।
■ संपादकीय
नॉर्थ-ईस्ट जल रहा है, राहुल गांधी के लिए इफ्तार पार्टी एवम् प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के फिटनेस वीडियो की खिल्ली उड़ाना महत्वपूर्ण रहा। कश्मीर में हो रही मौतों के बीच प्रधानमंत्री विकास का पाठ पढ़ाते रहे, जबकि देश में विकास की सबसे बड़ी दस योजनाएं मात्र 2 से 3 प्रतिशत ही पूरी हुई हैं। और महंगाई पिछले वर्ष से दोगुनी हो गई है।
देशभर में किसान दुर्दशा, आम जन पर बढ़ता आर्थिक बोझ, युवाओं में भविष्य की चिंता, दलितों में असुरक्षा की बढ़ती भावना, भारत का करोड़ों लूटकर विदेश में बैठे धनकुबेर इन सब मुद्दों का समाधान तलाशने की बजाय सरकार और विपक्ष लोकसभा और तीन राज्यों के निकटतम विधानसभा चुनाव में 'सत्ता पर कैसे काबिज हों' की नीति बनाने में जुटा है। स्थिति यह है कि कुर्सी के लालच में कोई हाथ किसी भी शर्त पर थामने की तैयारी चल रही है! नतीजतन छोटे-मोटे स्थानीय राजनीतिक दल भी केंद्र की सत्ता का महत्वपूर्ण अंग हो रहे हैं और उस पर बैठने के सपने भी बुन रहे हैं। राजनीति का यह बदलाव देशहित में तो कदापि नहीं दिख रहा, किंतु जनता के पास विकल्प भी नहीं है, सो वो भी समय-समय पर पारी-पारी सरकार बदलकर अपनी स्थिति बदलने की कोशिश करती दिखती है। यह तो, तय है कि अब 20 साल तक आँखें मूंदकर हालात बदलने का इंतजार करने का रिस्क जनता भी उठाने को तैयार नहीं है, यानी देश तो बदल ही रहा है।
■ संपादकीय


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