जीवन से क्यों हार गया संत! - Kashi Patrika

जीवन से क्यों हार गया संत!

सुख और दुख दोनों से सामन्जस्य बिठाकर चलना ही जीवन है। वक्त अच्छा हो या बुरा बीत जाता है...आध्यत्मिक गुरु भय्यूजी महाराज सबको जीने का मंत्र देते थे। उनके ही शब्दों में-
याद बन-बन के कहानी लौटी, सांस हो-हो के विरानी लौटी, लौटे सब गम जो दिये दुनिया ने, मगर न जाकर जवानी लौटी” 

अर्थात्, यह सब बीत जायेगा। यह जवानी, युवा अवस्था, यह दो दिन की इठलाहट, यह दो दिन के लिए तितलियों जैसे पंख यह सब बीत जाएंगे। यह दो दिन की चहल-पहल फिर गहरा सन्नाटा, फिर मरघट की शान्ति। मित्रों, हमारा यह जीवन सुखों एवं दुखों का संगम है। अतः ना तो हमें सुख के क्षणों में अति आनंदित होना चाहिए और ना दुःख के घड़ी में विलाप करनी चाहिए। जीवन में कुछ भी स्थिर नहीं। जीवन में बुरा से बुरा वक्त गुजर जाता है पर उन क्षणों में हमें अपना धैर्य नहीं खोना चाहिए।

जीवन मंत्र देकर दूसरों का सबल बनने वाला संत अपने जीवन में तनाव से हार गया! उनका सुसाइड नोट तो इसी ओर इंगित करता है। भय्यूजी महाराज आज पंचतत्व में विलीन हो गए और पीछे छोड़ गए एक सवाल। वह यह कि आज के टेक्नो युग में हम हर मोड़ पर रफ्तार को मात देने में सक्षम होते जा रहे हैं, किंतु खुशी, सन्तुष्टि, अपनत्व काफी पीछे छूटता जा रहा है, परिणाम है अवसाद-अकेलापन। ऐसे में, मुश्किलों से निकलने का एक ही रास्ता सूझता है, जीवन खत्म कर लेना।

कई बार ऐसा लगता है कि आर्थिक तंगी या विफलता लोगों में हताशा भर देती है, जिससे वे आत्महत्या को प्रेरित होते हैं। किंतु भय्यूजी महाराज के पास रौब-रुतबा और अर्थ की कमी नहीँ थी, फिर ऐसा क्या हुआ? तनाव को गहरे में समझने, मनोवैज्ञानिक नजरिए से देखने
 की कोशिश करते हैं।

भारत में 5.6 करोड़ लोग है डिप्रेशन के शिकार: विश्व स्वास्थ्य संगठन WHO की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत को गंभीर मानसिक स्वास्थ्य संकट का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि देश में इस समय करीब 5 करोड़ 60 लाख लोग अवसाद से पीड़ित हैं, जबकि 3 करोड़ 80 लाख चिंता और इससे जुड़ी बीमारियों में फंसे हैं। हालांकि, जो चीज इस स्थिति को और गंभीर बना रही है, वह है समाज में इन रोगों के प्रति नकारात्मक और अपरिपक्व सोच। डॉक्टर की नजर से, "निराशाजनक विकलांगता और मृत्युदर के मामले में अवसाद एक बड़ी जन स्वास्थ्य समस्या है। सभी निराश मरीजों से विशेष रूप से आत्मघाती विचारों के बारे में पूछताछ की जानी चाहिए। आत्मघाती विचार एक मेडिकल इमर्जेसी है। इसके रिस्क फैक्टर्स में मनोवैज्ञानिक विकार, शारीरिक रोग, आत्मघाती प्रयासों का पूर्व इतिहास या आत्महत्या को लेकर पारिवारिक इतिहास शामिल हैं।"
अकेलापन यानी आत्महत्या को न्यौता: मनोविज्ञानी की मानें तो, अवसाद के कारण आत्महत्या करने का खतरा अकेले रहने वालों में बढ़ जाता है। उम्र बढ़ने से भी आत्महत्या का जोखिम बढ़ता है। हालांकि, छोटे बच्चे और किशोरों में बड़ों के मुकाबले आत्महत्या की प्रवृत्ति अधिक पाई जाती है। पुरुषों की तुलना में महिलाओं के मन में आत्महत्या करने के विचार अधिक बार आते हैं। लेकिन पुरुष इसमें तीन गुना अधिक सफल रहते हैं। आत्मघात की दर ऐसे लोगों में अधिक पाई जाती है, जो अविवाहित हैं, विधवा या विधुर हैं, अलग रहते हैं, तलाकशुदा हैं और शादीशुदा होकर भी जिनके बच्चे नहीं होते।
मनोविज्ञानी कहते हैं कि जिन लोगों में सिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम प्रभावी है, उनमें घबराहट व तनाव की भावना अधिक रहती है। जब कोई व्यक्ति उदास होता है, तो उसके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के बीच एक डिस्कनेक्ट होता है। क्वांटम भौतिकी के अनुसार, अवसाद और चिंता का तंत्र पार्टिकल डुएलिटी के बीच असंतुलन से प्रभावित हो सकता है। इसमें संतुलन से अवसाद व अन्य मानसिक विकारों के इलाज में मदद मिल सकती है। पैरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम शरीर को तनाव से मुक्त होने में मदद करके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इससे रक्तचाप बढ़ता है, आंखों की पुतलियां फैलती हैं और मन विचलित होता है। साथ ही अन्य शरीर प्रक्रियाओं से हटकर ऊर्जा इससे लड़ने में लग जाती है।

जीवनशैली को संतुलित रखने के सुझाव: अपने सिस्टम को सपोर्ट करने वाले खाद्य पदार्थो का सेवन करें। साबुत अनाज वाले खाद्य पदार्थो का अधिक उपभोग करें। हरी पत्तेदार सब्जियां, प्रोटीन, अच्छी वसा और कॉम्पलेक्स कार्बोहाइड्रेट का सेवन अधिक करें।
खूब पानी पीएं, शरीर को पर्याप्त रूप से हाइड्रेट रखें। हाइड्रेटेड रहने से लसीका तंत्र विषाक्त पदार्थो को दूर करने में मदद करेगा और शरीर से मेटाबोलिक वेस्ट को हटा देगा। यह ऊतकों को डिटॉक्सीफाई करने, पोषण देने और उनको फिर से बनाने के लिए आवश्यक है। कुछ न कुछ शारीरिक गतिविधि अवश्य करें। व्यायाम शरीर के लिए एक सकारात्मक तनाव देता है, उदाहरण के लिए, योग को मन व तन दोनों के लिए अच्छा माना जाता है।
हर काम को सोच-समझ कर करें। इसमें आपके दैनिक जीवन से जुड़े काम, आदतें, विचार और व्यवहार शामिल हैं। समझदारी का मतलब है, जानबूझकर और सक्रिय रूप से शरीर को तनाव की स्थिति से बचाकर रखना।

जो बदल नहीं सकते, उसे स्वीकार करें: तनाव के कुछ स्रोत अनिवार्य होते हैं। ऐसे कारकों से आप बच नहीं सकते या आप उन्हें बदल भी नहीं सकते, जैसे किसी परिजन की मृत्यु, कोई गंभीर बीमारी, या कोई राष्ट्रीय मंदी। ऐसी स्थिति में उपजे तनाव से उबरने का सबसे अच्छा तरीका है चीजों को उसी रूप में स्वीकार कर लेना। भले ही स्वीकार करना कठिन होगा पर दीर्घकालिक रूप से उस परिस्थिति के विरोध में खड़ा होना जिसे आप बदल नहीं सकते, के मुकाबले यह अधिक आसान और फायदेमंद होगा।
नियंत्रण न हो सकने वाली चीजों पर नियंत्रण करने का प्रयास न करें। जीवन में कई चीज़ें नियंत्रण से बाहर होती है- खासकर अन्य लोगों के व्यवहार। उनसे परेशान होकर तनाव लेने बेहतर होगा कि आप ऐसी चीज़ों पर अपना ध्यान केंद्रित करें जिन्हें आप अपने नियंत्रण में ला सकते हैं, जैसे कि ऐसा तरीका जिसे आप समस्याओं से निपटने के लिए चुनते हैं।
सदैव आगे की ओर देखें। कहते हैं: “जो हमें मार नहीं सकता, वह हमें मजबूत बनाता है।” बड़ी चुनौतियों से मुकाबला करते समय आप उन्हें अपने निजी अनुभव के एक मौके के रूप में देखें। यदि आपका गलत चयन आपको तनाव का शिकार बना डालता है, तो आप उनपर विचार करें और अपनी गलतियों से सीखें।

भावनाओं को बांटना सीखें: भरोसेमंद लोगों से बात करें या किसी थेरॉपिस्ट से परामर्श प्राप्त करें। यदि आपनी भावनाओं को दूसरों को बताते हैं, तो भले ही आप उसे बदल न सकें पर इससे आप हल्का महसूस करेंगे। साथ ही इस तथ्य को स्वीकार करें कि हम एक हम एक अधूरी दुनिया में जी रहे हैं, जहां लोग बार-बार गलतियां करते हैं। क्रोध और नाराजगी को मन से बाहर निकालें। दूसरों को माफ कर आप अपनी नकारात्मक ऊर्जा से मुक्त होते हैं और जीवन में आगे की ओर बढ़ते हैं। यदि आप नियमित रूप से मस्ती और आराम के लिए समय निकालते रहेंगे तो आप तनाव के कारणों से बखूबी निपट सकेंगे।
■■काशी पत्रिका

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