काशी सत्संग: परमात्मा की खोज - Kashi Patrika

काशी सत्संग: परमात्मा की खोज


एक ट्रक ड्राइवर था वह रोज सफर करता था कभी कहीं, कभी कहीँ। उसकी भगवान में बहुत श्रद्धा थी। वह भगवान के दिव्य स्वरूप को देखना और उनसे बात करना चाहता था।
वह रोज सुबह-शाम भगवान के मंदिर में जाता। चाहे वह कहीं वीरान जगह भी सफर क्यों न कर रहा हो, उसे रोजाना कोई न कोई मंदिर मिल ही जाता, जहाँ वह पूजा करता और पूरे रास्ते भक्ति संगीत सुनता रहता।  भगवान ने उसके अंदर की तड़प देख कर उसको सही रास्ता दिखाने के लिए उसके मन में एक दिन एक विचार डाल दिया।

जब वह ड्राइवर पूजा कर के आया, तो उसने सोचा इतने साल हो गए मंदिर में जाते हुए लेकिन आज तक भगवान से बात तक नहीं हुई, मुझसे कहीं कोई गलती हो रही है। उसने मन ही मन सोचा मंदिर में पत्थर से बनी भगवान की मूरत है, मुझे चलता-फिरता भगवान ढूंढ़ना चाहिए। ये सोच कर वह सफर पर निकल पड़ा। अब वह रोजाना साधु-संतों की मण्डली में जाकर उनके प्रवचन सुनता और उसे बहुत आनंद आता।

एक दिन उसने एक संत से अपने मन की बात बताई और उनसे आग्रह किया कि मुझे भगवान से मिला दें। संत ने कहा, “बेटा जब तुम परमात्मा को पत्थर की मूरत में ढूंढ़ते थे, तो परमात्मा रोजाना तुम्हे मंदिर में उसी पत्थर रूप में दर्शन देते थे, अब तुम परमात्मा को इंसानो में ढूंढ़ते हो तो तुम्हे रोज हरिभक्तों के दर्शन होते है।” लेकिन बेटा जैसे भगवान ने स्वयं गीता में कहा है, "जब तक तू मुझे और अपने को अलग-अलग समझेगा, तब तक पूर्णता को प्राप्त नहीं हो सकता। तू यह समझ ले मैं समस्त प्राणियों की आत्मा हूँ।”

संत ने उसे समझाया कि तेरी आत्मा में ही ईश्वर का अंश है, इसलिए अपने अंतर में खोज। भगवान तुझे स्वयं से मिलाना चाहता है, तभी तुझे भगवान के भक्तों की शरण में आकर सत्संग और ज्ञान पाने का मौका मिला है। ये बातें सुनकर ड्राइवर का मन बहुत प्रसन्न हुआ। उसने उस संत की शरण लेकर उनसे ज्ञान लिया और सतगुरु के बताये नियम पर चलकर कुछ ही दिनों में ध्यान में लीन होकर परमात्मा के दिव्य स्वरूप को प्राप्त हो गया।
ऊं तत्सत...

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