‛महिलाओं के लिए विश्व में सबसे ज्यादा असुरक्षित भारत’ - Kashi Patrika

‛महिलाओं के लिए विश्व में सबसे ज्यादा असुरक्षित भारत’


चौकिए मत, ताजा रिपोर्ट यहीं इशारा करती है, जिसमें महिलाओं के खिलाफ दिन-ब-दिन बढ़ते अपराध के कारण भारत को महिलाओं के लिए विश्व में सबसे असुरक्षित जगह माना गया हैं। गौर करने की बात यह है कि इस रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान,  अफगानिस्तान, सऊदी अरब और सीरिया जैसे देश भी महिलाओं की सुरक्षा की दृष्टि से भारत से पीछे रह गए हैं।

‛भारत महिलाओं के लिए दुनिया का सबसे देश खतरनाक देश है’ मंगलवार को जारी ग्लोबल एक्सपोर्ट के एक पोल में यह बात सामने आई है। इसके अनुसार यौन हिंसा और महिलाओं को नौकरानी बनाने में भारत सबसे आगे है। थॉमसन-रॉयटर्स फाउंडेशन की तरफ से  महिला मुद्दों पर काम करने वालीं 550 महिला विशेषज्ञों के साथ किया गया है, जिसमें यह रिपोर्ट सामने आई। हालांकि, भारत के राष्ट्रीय महिला आयोग ने सर्वे के दावों को ख़ारिज किया है।

सरकारी आंकड़े
इस सर्वे के दावों को खारिज भी कर दिया जाए, तो सरकारी आंकड़े दिखाते हैं कि 2007 से साल 2016 के बीच महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा के मामलों में 83% की बढ़ोतरी हुई है। 2012 से 2016 के बीच यानी सिर्फ चार साल में रेप के 39,000 मामले सामने आए। इस दौरान हर चार घंटे में एक महिला बलात्कार का शिकार हो रही थी। भारत सरकार की ओर से जारी इन आंकड़ों को देखकर अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं की हालात चिंताजनक हैं।

शर्मसार करती घटनाएं
झारखंड की ताजा घटना, जिसने पूरे देश को शर्मसार किया। यहां के नक्सल प्रभावित खूंटी में पांच लड़कियां मानव तस्करी और पलायन को लेकर जागरूकता फैलाने जा रही थीं, तभी अभियुक्तों ने इन्हें अगवा करके गैंग रेप ही नहीं किया, वीडियो भी बनाया और धमकाया कि अगर वे पुलिस के पास गईं तो वीडियो को पब्लिक कर दिया जाएगा। उधर, दिल्ली में एक मेजर पर एक महिला की हत्या का आरोप लग रहा हैं। महिला के खिलाफ घरेलू हिंसा की घटनाएं भी रोजाना अखबार में होती हैं। इसके आलावा रेप, सामूहिक रेप की बढ़ती घटनाओं ने देशवासियों को सकते में डाल दिया है। ज्यादातर महिलाएं, यहाँ तक की पुरुष भी खासकर अपनी बच्चियों की सुरक्षा को लेकर परेशान हैं।

हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। आय दिन होने वाली महिलाओं के खिलाफ इस हिंसा का वीभत्स चेहरा तब सामने आता हैं, जब प्रशासनिक अमला भी इसमें शरीक दिखाई देता है। खुद को सभ्य समाज का अंग बताने वाले भी इसमें बराबर के भागीदार हैं।

अगर देश को इस कुत्सित और कुण्ठित मानसिकता से बाहर निकलना है, तो बड़े पैमाने पर सामाजिक परिवर्तन की आवश्यकता होगी।

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