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एक कहानी खत्म हुई है, एक कहानी बाकी है...


एक कहानी खत्म हुई है एक कहानी बाकी है,
मैं बे-शक मिस्मार हूँ लेकिन मेरा सानी बाकी है।

दश्त-ए-जुनूँ की खाक उड़ाने वालों की हिम्मत देखो,
टूट चुके हैं अंदर से लेकिन मनमानी बाकी है।

हाथ मिरे पतवार बने हैं और लहरें कश्ती मेरी,
जोर हवा का कायम है दरिया की रवानी बाकी है।

गाहे बेगाहे अब भी चले जाते हैं हम उस कूचे में,
जेहन बुजुर्गी ओढ़ चुका दिल की नादानी बाकी है।

कुछ गजलें उन जुल्फों पर हैं कुछ गजलें उन आँखों पर,
जाने वाले दोस्त की अब इक यही निशानी बाकी है।

नई नई आवाजें उभरीं 'पाशी' और फिर डूब गईं,
शहर-ए-सुखन में लेकिन इक आवाज पुरानी बाकी है।
■ कुमार पाशी

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