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बेबाक हस्तक्षेप

भारत जैसे विशाल देश को अपने संसाधनों और लोगों के बल पर ही २१ वीं सदी की बढ़ती चुनौतियों को स्वीकार करना होगा। आज हमारे बहुलता प्रधान देश में बढ़ती आबादी सभी की चिंता का विषय बना हुआ हैं। रोजगार में न के बराबर होने वाली वृद्धि केंद्र और राज्य सरकारों की नीतियों और खामियों की ओर इंगित करती हैं। तो शिक्षा व्यवस्था में न के बराबर गुणवत्ता परक बढ़ोत्तरी शिक्षा तंत्र की खामियों को बड़े पैमाने पर उजागर करती हैं।

आज देश के हर युवा को गुणवत्ता परक शिक्षा मुहैया करवाना और उनके लिए रोजगार और स्वरोजगार के नए क्षेत्र मुहैया करवाना सरकारों का काम हैं। पर कोई भी  सरकार इस ओर ध्यान नहीं दे रही हैं। सभी केवल सत्ता के सुख को भोगने की दिशा में निरंतर प्रयासरत हैं।

आज देश में केवल १७.५ प्रतिशत शिक्षित युवा ही रोजगार के लायक गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा ग्रहण कर पाए हैं। ऐसे में खामियों को कौन दूर नहीं कर पा रहा हैं यह महत्वपूर्ण सवाल बन जाता हैं। सरकार ने निजी क्षेत्र के लोगों को शिक्षा में योगदान देने के लिए बड़े पैमाने पर पैठ  बनाने का अवसर प्रदान किया हैं। पर सभी निजी संस्थान केवल और केवल अपनी धन लोलुप्ता में लगे हुए नजर आते हैं। सभी निजी विश्वविद्ध्यालय भी वही कोर्स चलाते हैं जो सरकारी विद्यालय चला रहे हैं। ऐसे में वो केवल आपसी प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दे कर युवकों को अपने यहाँ एडमिशन लेने को प्रोत्साहित करते हैं न कि शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने की दिशा में कार्य करते हैं।

तो क्या ये मान लिया जाए की शिक्षा के क्षेत्र में सभी सरकारें पूर्ण रूप से विफल रही हैं ? ये सवाल उतना ही महत्वपूर्ण हैं जितना की देश का विकास। अगर गुणवत्ता परक शिक्षा और बेरोजगारी के आकड़े देखे जाए तो सभी सरकारों का इसको कम करने में योगदान न के बराबर रहा हैं और सभी विफल भी रहीं हैं।

आज देश में शिक्षा और उच्च शिक्षा का जो स्तर हैं वो केवल योग्य विद्ध्यार्थियों को रोजगार मुहैया कराने तक सिमित हैं। ऐसे में शिक्षा की आवश्यकता पर ही सवाल खड़े हो जाते हैं जो शिक्षा सबको सुलभ रूप से रोजगार नहीं प्रदान कर सकती वैसी शिक्षा का क्या काम ?

तो इन सब के बीच आप भी अपने बच्चे को पहले १२ साल बेसिक और माध्यमिक शिक्षा के दुष्चक्र में धकेले और उच्च शिक्षा के लिए अपने घर की आधी जमीन बेच दे या फिर ऋण के दुष्चक्र में फस जाए। क्योकि आप की चुनी सरकार इस दिशा में कोई भी कार्य नहीं कर रही हैं और केवल कागजी करवाई कर रही हैं।

ऐसे में २०१९ में आप और हम राम भरोसे ही जीने को मजबूर हैं।

:संपादकीय 

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