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खूब लड़ी मर्दानी...“काशी में जन्मी रानी थी”

पुण्यतिथि विशेष।। 18 जून, 1858 का दिन था, जब क्रान्ति की यह ज्योति अमर हो गई

“इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में...” अदम्य शौर्य, साहस और आत्मविश्वास से परिपूर्ण 23 साल की वीरांगना का नाम भारत के इतिहास ही नहीं भारतीयों के हृदय में भी सदैव अमर रहेगा। अंग्रेजों के दांत खट्टे करने वाली
महारानी लक्ष्मीबाई का जन्म काशी की पावन भूमि पर हुआ था। 19 नवम्बर, 1828 को वाराणसी के भदैनी में मराठी परिवार में हुआ था। उनके बचपन का नाम “मणिकर्णिका” था, लेकिन प्यार से उन्हें 'मनु' पुकारा जाता था। उनकी माँ का नाम भागीरथीबाई और पिता का नाम मोरोपंत तांबे था। मनु की अवस्था अभी चार-पांच वर्ष ही थी कि उसकी मां का देहान्त हो गया। पिता मोरोपंत तांबे एक साधारण ब्राह्मण और अंतिम पेशवा बाजीराव द्वितीय के सेवक थे। माता भागीरथी बाई सुशील, चतुर और रूपवती महिला थीं। अपनी मां की मृत्यु हो जाने पर वह पिता के साथ बिठूर आ गई थीं। यहीं पर उन्होंने मल्लविद्या, घुड़सवारी और शस्त्रविद्याएं सीखीं।

और बन गईं “लक्ष्मीबाई”:
1842 में मनु का विवाह झांसी के राजा गंगाधर राव निम्बालकर के साथ हुआ और इस प्रकार वे झांसी की रानी बन गईं। और काशी की बेटी महारानी लक्ष्मीबाई बन गई।

धरोहर संजोने की कवायद
वाराणसी में महारानी लक्ष्मीबाई की जन्मस्थली लंबे समय तक उपेक्षा का शिकार रही, लेकिन 2013 में इस स्थान का कायाकल्प हुआ। तत्कालीन प्रदेश सरकार की कोशिश से इसे कलात्मक रूप दिया गया। खुले आसमान के नीचे गुलाबी पत्थरों से बने पूरे परिसर के बीच में महारानी की विशाल एवम् आकर्षक प्रतिमा स्थापित है, जिसमेँ वह हाथ में तलवार लिए अंग्रेजों को ललकारने के भाव में दिख रही हैं। पीछे की गुलाबी दीवारों पर लक्ष्मीबाई के जीवन से जुड़ी घटनाओं को चित्र के रूप में उकेरा गया है जैसे- बाल गंगाधर राव से विवाह, अस्त्र-शास्त्र की शिक्षा लेती ‛मनु’, गंगाधर राव के निधन पर शोकाकुल बैठी महारानी आदि। पार्कनुमा बने इस स्थल के दर्शन के लिए लोग आते हैं।

सरकार की उपेक्षा
लक्ष्मीबाई की जन्मस्थली को सहेजने की कोशिश तो हुए, लेकिन लोगों की माने तो सरकार की ओर से इसको वह महत्व नहीं दिया जा रहा, जो मिलना चाहिए। सरकार की ओर से वीरांगना लक्ष्मीबाई के शहादत दिवस या जन्मदिवस पर उनकी जन्मस्थली को नमन करने अमूमन कोई नहीं पहुंचता है। अलबत्ता समाजसेवी संगठनों की ओर से जरूर यहां कार्यक्रम आयोजित हो जाता है। पर्यटन और संस्कृति विभाग की तरफ से भी रानी लक्ष्मी बाई की जन्मस्थली पर कोई आयोजन नहीं किया और न इस स्थान को पर्यटन की दृष्टि से प्रोत्साहित नहीं किया गया है।

कहा है: वाराणसी में अस्सी चौराहे से करीब आधा किलोमीटर दूर स्थित यह स्थान भदैनी बी01/190-91 में है। यहां से तुलसी और अस्सी दोनों घाट करीब हैं। अस्सी चौराहे पर महारानी लक्ष्मीबाई जन्मस्थली का बोर्ड भी लगा है।

सुभद्रा कुमारी चौहान की पंक्तियों से वीरांगना को नमन...
...घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,
दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
सोनी सिंह




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