बिगड़ता सामाजिक आर्थिक ताना-बाना - Kashi Patrika

बिगड़ता सामाजिक आर्थिक ताना-बाना

हर दौर से वाकिफ़ हैं बस बोलता नहीं 
मयस्सर कुछ भी नहीं इसे, हाय री किस्मत 
इसी का खून है जो कभी खौलता नहीं।

राजनीति की बिसात पर कश्मीर को बिछा दिया गया हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष अब जम कर इसपर राजनीति कर रहें हैं। पर उन आम लोगों का क्या जो कश्मीर में खौफ के साए में जीने को मजबूर हैं। इस बार सत्ता पक्ष ज्यादा कटघरे में दिखाई दे रहा हैं जिसने कश्मीर में साढ़े तीन साल तक शासन की मलाई खाई हैं और अब उसने अपने ही साझीदार पर सारे आरोप मढ़ कर खुद को पाक साफ़ साबित करने की बिसात बिछाई हैं।

ऐसा नहीं हैं कि आज ये केवल कश्मीर की स्थिति हैं पर अमूमन सभी राज्यों में जहाँ भी बीजेपी का शासन हैं यही स्थिति हैं। उत्तर प्रदेश को गाहे बगाहे धार्मिक उन्माद के सैलाब में झोंक दिया जाता हैं। मध्यप्रदेश में वहां के मूल निवासी और किसान ही अपने जीवन को लेकर आशंकित रहते हैं। मध्यप्रदेश में जीवन का हिसाब किताब ऐसा है कि लोग दो जून की रोटी जुटाने में ही इतने मशगूल हैं कि किसी मुद्दे पर बेचारे विचार क्या व्यक्त करेंगे।

यही स्थिति झारखंड और छत्तीसगढ़ का भी है जहाँ किसी भी जन सरोकार के मुद्दे को लेफ्ट और अल्ट्रा लेफ्ट के चश्मे से देख कर दबा दिया जाता हैं। न जाने कितनी महिलाओं की अस्मित्ता आज सरकारी फाइलों में दफ़न कर दी गई हैं।

महाराष्ट्र और गोवा की स्थिति भी ऐसी ही हैं जहाँ महाराष्ट्र में एक ओर जन सरोकार के हर मुद्दे को बीजेपी विपक्ष की साजिश बता कर एक के बाद एक दफन करती जा रही हैं तो गोवा में हद ही हो गई जब वहां के मुख्यमंत्री ने ही कह दिया गौ मांस की कमी नहीं होने दी जाएगी। अब यह बीजेपी के आंतरिक विरोधाभास का प्रतिक तो कत्तई नहीं है हाँ वरण इसे सुविधा की राजनीति जरूर कह सकते हैं।

असम से लेकर गुजरात तक लगभग पूरे भारत में आज यही स्थिति व्याप्त हैं जिसमे लोग आपस में ही जीवन की जंग के लिए लड़ने को मजबूर कर दिए गए हैं। जब-जब आम जनता में फूट होती हैं तो फायदा केवल सत्ता पक्ष का ही होता हैं। अंग्रेजों ने भी इसी नीति के सापेक्ष लगभग 200 वर्षों तक भारत पर शासन किया था।

विदेशी शासन चाहे जितने वर्षों तक भारत पर रहा पर वो कभी भारत की मूल अवधारणा को नहीं हिला सका। पर आज भारत के इतिहास में पहली बार ऐसा हो रहा हैं कि भारत का सामाजिक आर्थिक ताना-बाना बिगड़ता जा रहा हैं। आम जन आर्थिक रूप से गरीब होता जा रहा हैं और धन का संग्रह कुछ चुनिंदा लोगों की तिजोड़ियों में होता जा रहा हैं। पर विडम्बना देखिए लोग इससे ज्यादा उत्साहित हैं कि उन जैसे गरीब से उनका पडोसी ज्यादा गरीब हैं। ये बदलाव भारत का खुद का नहीं बल्कि राजनीतिक गरीबी का उदाहरण हैं जहाँ लोगों को इस तराजू पर तौल दिया गया हैं कि अगर आप बीजेपी को मानते हो तो भारतीय और नहीं मानते हो तो पाकिस्तानी। ऐसे में आम लोगों में वैचारिक विकास क्या होगा आप खुद ही समझ सकते हैं।

ये पूरा का पूरा नरेटिव बीजेपी का हैं जिसने सत्ता लोलुप्ता में पूरे भारत को अंदर से खोखला कर दिया हैं। लोगों का तो यहाँ तक कहना हैं कि अगर बीजेपी और कुछ वर्षों तक शासन में रही तो वो सत्ता के लिए सामूहिक नरसंहार भी करवा सकती हैं। जैसा विदेशी आक्रांताओं के काल में हुआ था।

:नीजि विचार (संतोष)

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