खबरों का बाजार गर्म है, ‛संत कबीर के 250वें प्राकट्य उत्सव एवं 500वें परिनिर्वाण साल पर 28 जून को (आज) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संत कबीर नगर (मगहर) में उनकी मजार पर चादर चढ़ाएंगे। साथ ही वह कबीर अकादमी का शिलान्यास करेंगे और एक जनसभा को भी संबोधित करेंगे।’ मेरे मन में एक सवाल कुलबुला रहा है कि आखिर वह संत जिसके पार्थिव शरीर को फूल के रूप में जलाया ही नहीं गया, बल्कि दफनाया भी गया।
“राम” के नाम पर वोट बटोरने वालों का जमघट यहां क्यों और संदेश किसके लिए? या कबीर के शब्दों में ही उत्तर छिपा है,
“ईसा अल्ला ईश्वर सारे मन्तर सीख,
जाने कब किस नाम पर, मिले जियादा भीख।”
चर्चा निकली ही है, तो समझने की कोशिश करते हैं संत कबीर को और संत कबीर नगर यानी मगहर को-
संत कबीर की राम भक्ति पर संदेह नहीं, क्योंकि उन्होंने स्वयं कहा है, “हरिमोर पिउ, मैं राम की बहुरिया...”। समय-समय पर कबीरदास प्रभु राम के प्रति अपनी असीम श्रद्धा प्रकट भी करते रहे। वैसे भी, कबीर के बारे में प्रचलित किंवदन्ती के अनुसार वे पञ्चगंगा घाट(बनारस) की सीढ़ियों पर पड़े थे। संत रामानंद उसी समय गंगा स्नान के लिए सीढियां उतर रहे थे कि उनका पैर कबीर के शरीर पर पड़ गया। उनके मुख से तत्काल ‛राम राम’ शब्द निकला। उसी ‛राम’ को कबीर ने दीक्षा मंत्र मान लिया और उन्हीं में रमे रहे। तो कबीर की राम भक्ति पर संदेह की गुंजाइश नहीँ बचती।
किंतु, “राम रहीम एक हैं, नाम धराया दोय, कहै कबीर दो नाम सुनि, भरम पड़ो मति कोय॥" यह गहरी बात कहने वाले कबीरदास सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल हैं, जिन्हें राम और रहीम दोनों में विश्वास रखने वाले पूजते हैं। उनकी परिनिर्वाण स्थली में भी एक ही छत के नीचे आरती और अजान दोनों गूंजते हैं। जी हां, आजीवन समाज और लोगों के बीच व्याप्त आडंबरों पर कुठाराघात करने वाले कबीरदास की नगरी मगहर में एक ही परिसर में जहां अजान वातावरण में आस्था की मिठास घोलती है। वहीं, घंटे-घड़ियाल के मधुर संगीत के बीच आरती के सुर भक्ति भाव की गंगा बहाते हैं।
संतकबीरनगर में स्थित है मगहर
गोरखपुर राष्ट्रीय राजमार्ग के समीप बस्ती से 43 किलोमीटर और गोरखपुर से 27 किलोमीटर दूरी पर स्थित मगहर 1865 तक गोरखपुर जिले का एक गांव था। 1997 में यह बस्ती जिले के कुछ भागों को अलग करके संतकबीरनगर नाम से नए जिले का सृजन हुआ, जिनमें मगहर भी था। जब हम राष्ट्रीय राजमार्ग पर बस्ती से गोरखपुर की तरफ चलते है, तो राष्ट्रीय राजमार्ग से दाहिने जाती हुई सड़क पर उतर कर दो-ढाई किलोमीटर अंदर स्थित है कबीर का निर्वाण स्थल। काशी में अपने जीवन का अधिकांश भाग बिता चुके कबीर ने मरने से करीब तीन वर्ष पूर्व यहां आ बसे, " लोका मति के भोरा रे, जो काशी तन तजै कबीरा, तौ रामहि कौन निहोरा रे।"
मजार और समाधि के बनने की कहानी
मगहर पहुंच कर उन्होंने एक जगह धूनी रमाई। जनश्रुति है कि वहां से चमत्कारी ढंग से एक जलस्रोत निकल आया, जिसने धीरे-धीरे एक तालाब का रूप ले लिया। आज भी इसे "गोरख तलैया" के नाम से जाना जाता है। तालाब से हट कर उन्होंने आश्रम की स्थापना की। यहीं पर जब कबीर अपना शरीर छोड़ने वाले थे, तो उनके शिष्यों को इसकी पूर्वसूचना दी गई। शिष्यों में हिन्दू और मुसलमान दोनों थे। सारी जिंदगी साम्प्रदायिक संकीर्णता से ऊपर उठकर सही मार्ग पर चलने का उपदेश देने वाले कबीरदास के शिष्य उनके शरीर छोड़ते ही उनके शिष्य उसी संकीर्णता के वशीभूत होकर गुरु के शरीर के अन्तिम संस्कार को लेकर आमने-सामने खड़े हो गए। हिन्दू चाहते थे कि कबीर का शव जलाया जाए और मुसलामान उसे दफनाने के लिए कटिबध्द थे। पर जब वे शव के पास पहुंचे तो शव के स्थान पर उन्हें कुछ फूल मिले। फूल बांटकर एक हिस्से से हिन्दुओं ने आधे जमीन पर गुरु की समाधि बना दी और मुसलमानों ने अपने हिस्से के बाकी आधे फूलों से मकबरा तथा आश्रम को समाधि स्थल बना दिया गया। यहां मगहर में कबीर साहेब की समाधि और मजार एक परिसर में स्थित है, तो यहीं के रानी बाजार मुहल्ले में एक ही परिसर में स्थित मंदिर और मस्जिद में एक साथ ही आरती और अजान होती है। दोनों संप्रदायों के लोग पूरी निष्ठाभाव से अपने धर्म का पालन करते हुए पूजा और इबादत करते हैं।
हालांकि, सर्वधर्म में समभाव रखने वाले कबीर हिन्दू और मुस्लिम समुदाय की रुढ़ियों के घोर आलोचक थे। कबीर लिखते हैं, “कंकर पत्थर जोरि के मस्जिद लयी बनाय, ता चढ़ि मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय।” कबीर एक ईश्वर को मानते थे और कर्मकाण्ड के घोर विरोधी थे। तभी तो उन्होंने कहा, “पाथर पूजे हरि मिले, तो मैं पूजू पहाड़। ताते या चाकी भली, पीस खाए संसार।”
ऐसे में, संत कबीर के ‛मगहर’ से आगामी लोकसभा चुनाव (2019) का आगाज कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी क्या भाईचारा का पाठ देश को पढ़ाना चाहते हैं? या यूं कहें-
“हिंदू का हो दान या, मुस्लिम की खैरात
गेहूँ चावल दाल का क्या मजहब क्या जात।”
अर्थात् ‛वोट का क्या मजहब, क्या जात।’
■ सोनी सिंह
“राम” के नाम पर वोट बटोरने वालों का जमघट यहां क्यों और संदेश किसके लिए? या कबीर के शब्दों में ही उत्तर छिपा है,
“ईसा अल्ला ईश्वर सारे मन्तर सीख,
जाने कब किस नाम पर, मिले जियादा भीख।”
चर्चा निकली ही है, तो समझने की कोशिश करते हैं संत कबीर को और संत कबीर नगर यानी मगहर को-
संत कबीर की राम भक्ति पर संदेह नहीं, क्योंकि उन्होंने स्वयं कहा है, “हरिमोर पिउ, मैं राम की बहुरिया...”। समय-समय पर कबीरदास प्रभु राम के प्रति अपनी असीम श्रद्धा प्रकट भी करते रहे। वैसे भी, कबीर के बारे में प्रचलित किंवदन्ती के अनुसार वे पञ्चगंगा घाट(बनारस) की सीढ़ियों पर पड़े थे। संत रामानंद उसी समय गंगा स्नान के लिए सीढियां उतर रहे थे कि उनका पैर कबीर के शरीर पर पड़ गया। उनके मुख से तत्काल ‛राम राम’ शब्द निकला। उसी ‛राम’ को कबीर ने दीक्षा मंत्र मान लिया और उन्हीं में रमे रहे। तो कबीर की राम भक्ति पर संदेह की गुंजाइश नहीँ बचती।
किंतु, “राम रहीम एक हैं, नाम धराया दोय, कहै कबीर दो नाम सुनि, भरम पड़ो मति कोय॥" यह गहरी बात कहने वाले कबीरदास सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल हैं, जिन्हें राम और रहीम दोनों में विश्वास रखने वाले पूजते हैं। उनकी परिनिर्वाण स्थली में भी एक ही छत के नीचे आरती और अजान दोनों गूंजते हैं। जी हां, आजीवन समाज और लोगों के बीच व्याप्त आडंबरों पर कुठाराघात करने वाले कबीरदास की नगरी मगहर में एक ही परिसर में जहां अजान वातावरण में आस्था की मिठास घोलती है। वहीं, घंटे-घड़ियाल के मधुर संगीत के बीच आरती के सुर भक्ति भाव की गंगा बहाते हैं।
संतकबीरनगर में स्थित है मगहर
गोरखपुर राष्ट्रीय राजमार्ग के समीप बस्ती से 43 किलोमीटर और गोरखपुर से 27 किलोमीटर दूरी पर स्थित मगहर 1865 तक गोरखपुर जिले का एक गांव था। 1997 में यह बस्ती जिले के कुछ भागों को अलग करके संतकबीरनगर नाम से नए जिले का सृजन हुआ, जिनमें मगहर भी था। जब हम राष्ट्रीय राजमार्ग पर बस्ती से गोरखपुर की तरफ चलते है, तो राष्ट्रीय राजमार्ग से दाहिने जाती हुई सड़क पर उतर कर दो-ढाई किलोमीटर अंदर स्थित है कबीर का निर्वाण स्थल। काशी में अपने जीवन का अधिकांश भाग बिता चुके कबीर ने मरने से करीब तीन वर्ष पूर्व यहां आ बसे, " लोका मति के भोरा रे, जो काशी तन तजै कबीरा, तौ रामहि कौन निहोरा रे।"
मजार और समाधि के बनने की कहानी
मगहर पहुंच कर उन्होंने एक जगह धूनी रमाई। जनश्रुति है कि वहां से चमत्कारी ढंग से एक जलस्रोत निकल आया, जिसने धीरे-धीरे एक तालाब का रूप ले लिया। आज भी इसे "गोरख तलैया" के नाम से जाना जाता है। तालाब से हट कर उन्होंने आश्रम की स्थापना की। यहीं पर जब कबीर अपना शरीर छोड़ने वाले थे, तो उनके शिष्यों को इसकी पूर्वसूचना दी गई। शिष्यों में हिन्दू और मुसलमान दोनों थे। सारी जिंदगी साम्प्रदायिक संकीर्णता से ऊपर उठकर सही मार्ग पर चलने का उपदेश देने वाले कबीरदास के शिष्य उनके शरीर छोड़ते ही उनके शिष्य उसी संकीर्णता के वशीभूत होकर गुरु के शरीर के अन्तिम संस्कार को लेकर आमने-सामने खड़े हो गए। हिन्दू चाहते थे कि कबीर का शव जलाया जाए और मुसलामान उसे दफनाने के लिए कटिबध्द थे। पर जब वे शव के पास पहुंचे तो शव के स्थान पर उन्हें कुछ फूल मिले। फूल बांटकर एक हिस्से से हिन्दुओं ने आधे जमीन पर गुरु की समाधि बना दी और मुसलमानों ने अपने हिस्से के बाकी आधे फूलों से मकबरा तथा आश्रम को समाधि स्थल बना दिया गया। यहां मगहर में कबीर साहेब की समाधि और मजार एक परिसर में स्थित है, तो यहीं के रानी बाजार मुहल्ले में एक ही परिसर में स्थित मंदिर और मस्जिद में एक साथ ही आरती और अजान होती है। दोनों संप्रदायों के लोग पूरी निष्ठाभाव से अपने धर्म का पालन करते हुए पूजा और इबादत करते हैं।
हालांकि, सर्वधर्म में समभाव रखने वाले कबीर हिन्दू और मुस्लिम समुदाय की रुढ़ियों के घोर आलोचक थे। कबीर लिखते हैं, “कंकर पत्थर जोरि के मस्जिद लयी बनाय, ता चढ़ि मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय।” कबीर एक ईश्वर को मानते थे और कर्मकाण्ड के घोर विरोधी थे। तभी तो उन्होंने कहा, “पाथर पूजे हरि मिले, तो मैं पूजू पहाड़। ताते या चाकी भली, पीस खाए संसार।”
ऐसे में, संत कबीर के ‛मगहर’ से आगामी लोकसभा चुनाव (2019) का आगाज कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी क्या भाईचारा का पाठ देश को पढ़ाना चाहते हैं? या यूं कहें-
“हिंदू का हो दान या, मुस्लिम की खैरात
गेहूँ चावल दाल का क्या मजहब क्या जात।”
अर्थात् ‛वोट का क्या मजहब, क्या जात।’
■ सोनी सिंह




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