सप्ताहांत - Kashi Patrika

सप्ताहांत

हफ्तेभर की खबरों का लेखाजोखा।

आम जन के चश्में से देखे तो, इस हफ्ते लंबे समय से उपेक्षित किसानों पर दिल्ली से लेकर कर्नाटक तक की सरकार दयावान हो गई। वहीँ, देश की शीर्ष अदालत ने दिल्ली के राजनीतिक हालात से लेकर कई मामलों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। 
इस बीच, दिल्ली में अंधविश्वास ने सिर्फ एक हंसते-खेलते परिवार को ही नहीं उजाड़ा, बल्कि पीछे देशभर में फैले अंध आस्था से जुड़े कई सवाल भी छोड़ गया। उधर, बॉलीवुड अभिनेत्री सोनाली बेंद्रे को हाई ग्रेड कैंसर की खबर ने उनके चाहने वालों को सकते में डाल दिया। 

किसानों का कौन? संवेदना का दिखावा!!
सप्ताह के शुरुआत में किसानों पर मेहरबानियों की झड़ी लगाते हुए भाजपा के मंत्री-संत्री इसे “ऐतिहासिक” फैसला बताने में तनिक भी गुरेज नहीं कर रहे हैं। अजीब बात यह है कि किसानों का हित चाहने वाली पार्टी प्रमुख और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली में किसानों का ही “प्रवेश निषेध” है! मीडिया की खबरों के मुताबिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तकरीबन 2 घंटे 15 मिनट आज जयपुर में बिताएंगे। इस दौरान केंद्र व राज्य सरकार की ओर से चलाई जा रही 12 कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों से रूबरू भी होंगे। इस संवाद को प्रदेश की जनता ज्यादा से ज्यादा सुन सके, इसलिए एलईडी सहित पूरा तामझाम भी किया गया है। किंतु, किसानों के मन की बात प्रधानमंत्री तक पहुंचे इसका इंतजाम यहां नदारद है। ‘प्रधानमंत्री लाभार्थी जनसंवाद’ में हाड़ौती संभाग के किसानों का ‘प्रवेश निषेध’ कर दिया है। इस संभाग के किसान उपज का सही दाम नहीं मिलने की वजह से आत्महत्या तक करने को मजबूर हो रहे हैं, लेकिन खबरों के मुताबिक इन्हें रैली से दूर रखा जाएगा। इसके लिए सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम भी राज्य सरकार की ओर से किये गए हैं। भाजपा के पूर्व विधायक घनश्याम तिवारी की माने तो, लाभार्थियों को भी बातचीत की ट्रेनिंग पहले ही दी गई है, ताकि वह प्रधानमंत्री के सवालों का सही और सकारात्मक उत्तर दें। इतना ही नहीं कार्यक्रम में किसी तरह का विरोध-प्रदर्शन न हो इसके लिए काला कपड़ा पहनने, काला रूमाल रखने तक की मनाही है। नीयत साफ है, यदि किसानों ने अपनी पीड़ा का इजहार कर दिया, तो राष्ट्रीय स्तर पर सरकार की किरकिरी तो होगी ही, भाजपा के किसान हितैषी होने के दावे की भी पोल खुल जाएगी।

समर्थन मूल्य में इजाफे की जमीनी हकीकत
2019 के लोकसभा चुनावों से ऐन पहले केंद्र सरकार को किसानों की सुध हो आई और आनन-फानन में धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य 200 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ा दिया। भाजपा का कहना है कि किसानों को उनकी उत्पादन लागत का 1.5 गुणा कीमत उपलब्ध कराने का वादा पूरा किया गया है।
सच को समझने के लिए चार साल पीछे जाना होगा। मई 2014 में सरकार बनी, तो किसानों ने सरकार पर फसलों की लागत का डेढ़ गुना मूल्य देने वादा पूरा करने का दबाव बनाना शुरू किया। सरकार ने फरवरी 2015 में सुप्रीम कोर्ट में एक शपथपत्र देकर इस वायदे को पूरा करने में असमर्थता जताई।  2017 के अंत में गुजरात चुनाव में ग्रामीण इलाकों में भाजपा की हार और यूपी उपचुनाव में किसानों की नाराजगी ने सरकार की नींद उड़ा दी। फलस्वरूप, 2019 के आम चुनाव से पहले आखिरी पूर्ण बजट में किसानों के गुस्से को शांत करने के लिए लागत का डेढ़ गुना मूल्य देने की घोषणा की गई।
यहां भी झोल है। फसलों की लागत तय करने वाली केंद्रीय सरकारी संस्था कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) अलग-अलग फसलों की तीन तरह की लागत की गणना निश्चित करता है। पहली, ए2 लागत- यानी खाद, बीज, कीटनाशक, ईंधन, जुताई, सिंचाई, मजदूरी आदि पर होनेवाला वास्तविक खर्चा। दूसरी, ए2+एफएल लागत- इसमें उपरोक्त ए2 लागत में किसान के द्वारा खेतों में किए गए स्वयं के पारिवारिक श्रम के बाजार मूल्य को भी जोड़ दिया जाता है।
तीसरी है सी2 लागत, जिसमें ए2+एफएल लागत के ऊपर खेतों के किराए, किसान की पूंजी और ट्रैक्टर आदि जैसे औजारों के मूल्य पर ब्याज, अवमूल्यन आदि की गणना भी की जाती है। वास्तव में सी2 लागत ही खेती की असली आर्थिक लागत होती है। उद्योगपति और अर्थशास्त्री उद्योगों में बननेवाले उत्पादों की लागत की गणना भी इसी प्रकार करते हैं। अब, किसानों का कहना है कि वायदा सी2 यानी संपूर्ण लागत का डेढ़ गुना एमएसपी देने का था। यही सिफारिश स्वामीनाथन आयोग द्वारा भी की गई थी। सरकार केवल ए2+एफएल लागत का ही डेढ़ गुना एमएसपी देगी, जो 2014 से पहले भी कई फसलों पर मिला करता था। यानी सरकार की कथनी और करनी में फर्क है।

“आप” की सरकार, फिर लाचार!!
दिल्ली में सर्वोच्च कौन को लेकर सियासी ड्रामेबाजी सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद भी  थमती नहीं दिख रही है। दिल्ली में ट्रांसफर-पोस्टिंग के मसले को लेकर दिल्ली सरकार और एलजी के बीच टकराव अब भी जारी है। लगता है दिल्ली की सरकार ट्विटर के जरिए चलती है और ट्रांसफर-पोस्टिंग मामले पर भी मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने उप राज्यपाल से शुक्रवार को हुई मुलाकात की जानकारी भी ट्विटर पर साझा की। आज केंद्रीय गृह मंत्री से मिलने का समय मांगने की बात भी ट्विटर पर आई।
बहरहाल,  सुप्रीम कोर्ट में जिन सांविधानिक व्यवस्थाओं का हवाला दिया है, उससे भी सभी वाकिफ ही थे। यह व्यवस्था भी यही कहती है कि उप-राज्यपाल सिर्फ सलाह दे सकते हैं, सरकार को किसी काम के लिए बाध्य नहीं कर सकते, साथ ही विधानसभा के फैसलों के लिए उप-राज्यपाल की सहमति जरूरी नहीं है। हालांकि, कोर्ट के फैसले के बाद भी तकरार सुलझा नहीं, क्योंकि अदालत वैधानिक और अवैधानिक की व्याख्या कर सकती है, वह इस लिहाज से सही-गलत भी बता सकती है, लेकिन वह उस राजनीतिक उलझन को नहीं सुलझा सकती, जो दिल्ली की खींचतान का सबसे बड़ा कारण है।
यानी, जैसा की केजरीवाल फिर अदालत जाने की बात कह रहे हैं। हर ऐसे मामले पर मुकदमेबाजी होगी और अटकते-लटकते फैसले अदालतों में भटकते रहेंगे और इन सबके बीच दिल्ली की जनता बिना सहमति फंसी रहेगी।

कोर्ट “सुप्रीम”: कई मामलों पर लिया संज्ञान
उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को  कहा कि प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) ‘मास्टर ऑफ रोस्टर’ होता है और उनके पास शीर्ष न्यायालय की विभिन्न पीठों के पास मामलों को आवंटित करने का विशेषाधिकार और प्राधिकार होता है।
जस्टिस एके सीकरी एवं जस्टिस अशोक भूषण ने अपने अलग-अलग लेकिन समान राय वाले आदेश में कहा कि सीजेआई की भूमिका समकक्षों के बीच प्रमुख की होती है और उनके पास अदालत के प्रशासन का नेतृत्व करने का अधिकार होता है, जिसमें मामलों का आवंटन करना भी शामिल है। यह आदेश पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण की याचिका पर आया है जिन्होंने प्रधान न्यायाधीश द्वारा शीर्ष न्यायालय में मामलों को आवंटित करने की वर्तमान रोस्टर प्रणाली को चुनौती दी थी।
वहीं, भीड़ की बढ़ती हिंसा और हत्या की घटनाओं पर चिंता जताते हुए कहा कि गोरक्षा के नाम हिंसा नहीं होनी चाहिए। कोर्ट ने खा कि भीड़ द्वारा की गई हत्या कानून व्यवस्था की समस्या नहीं, बल्कि अपराध है और राज्यों का दायित्व है कि वे ऐसी घटनाओं पर रोक लगाएं। कोर्ट ने कहा कि कोई भी व्यक्ति कानून अपने हाथ में नहीं ले सकता।
तीसरा मामला जगन्नाथ मंदिर से जुड़ा है, जिसके संदर्भ में कोर्ट ने कहा धर्म और जाति के आधार पर दर्शन करने से लोगों को रोकना गलत हैं। सुप्रीम कोर्ट ने तत्कालीन प्रबंधन से आग्रह किया हैं कि आप मंदिर में प्रवेश सभी लोगों को करने दे, जो मंदिर की प्रतिष्ठानुरूप कपड़े धारण करते हैं और मंदिर में दर्शन के नियमों का पालन करते हैं।

दिल्ली से कर्नाटक तक “अंधविश्वास”
दिल्ली के बुराड़ी में अंधविश्वास के खेल में एक ही परिवार के 11 लोगों की जान चली गई। वहीँ, कर्नाटक में मंत्रीजी की आस्था कहें या अंधविश्वास जिसमें रोजाना 342 किलोमीटर की यात्रा करके वे ऑफिस जाते हैं, क्योंकि उन्हें अभी तक वास्तु के हिसाब से सही सरकारी आवास नहीं मिला है।
एक तरफ देश के प्रधानमंत्री डिजिटल इंडिया की बात करते हैं। सोशल मीडिया पर सरकार बनती-बिगड़ती हैँ। दुखद की देश का एक तबका अंधविश्वास में इस कदर जकड़ा है, जहां शिक्षित होते हुए भी पूरा परिवार ही मोक्ष की बलि चढ़ गया। हालात फिक्र करने के हैं, क्योंकि महानगर में बसे पढ़ेलिखे और आर्थिक रूप से सम्पन्न परिवार की यह स्थिति है। क्राइम ब्रांच इस केस में अब तक करीब 130 लोगों से पूछताछ कर चुकी है और शुक्रवार को एक महिला तांत्रिक को हिरासत में लिया है। क्राइम ब्रांच ने जिस तांत्रिक महिला को गिरफ्तार किया है, वो भाटिया परिवार का घर बनाने वाले कॉन्ट्रैक्टर की बहन है। गौरतलब है कि इस सामूहिक आत्महत्या के मुख्य साजिशकर्ता परिवार के छोटे बेटे ललित ने मौत से पहले अपने कॉन्ट्रैक्टर को ही फोन किया था।
वहीँ, कर्नाटक के एक मंत्री इन दिनों अपने अंधविश्वासी स्वभाव के लिए चर्चा में हैं। एचडी रेवन्ना कर्नाटक की सरकार में लोक निर्माण विभाग में मंत्री हैं। वे रोजाना 342 किलोमीटर की यात्रा करके ऑफिस आते जाते हैं, क्योंकि उन्हें अभी तक वास्तु के हिसाब से सही सरकारी आवास नहीं मिला है। मंत्री जी सुबह ऑफिस जाने से पहले 5 से 6 मंदिरों के दर्शन भी करते हैं। कर्नाटक की एचडी कुमारस्वामी सरकार में कई निर्णय इन्हीं की सलाह के अनुसार लिए जाते हैं।

देशद्रोह विवाद: कन्हैया और उमर खालिद की पीएचडी सस्पेंड
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय कैंपस में नौ फरवरी 2016 को देश विरोधी नारे लगाने के मामले में पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार व उमर खालिद की पीएचडी सस्पेंड हो गई है। वहीं, तीसरा आरोपी अनिर्बन पीएचडी पूरी कर 2017 में कैंपस छोड़ चुका है। पांच सदस्यों वाली उच्चस्तरीय कमेटी ने 11 अप्रैल 2016 की रिपोर्ट बरकरार रखते हुए दूसरी रिपोर्ट प्रबंधन को सौंप दी है। इस रिपोर्ट की सिफारिश के आधार पर प्रबंधन फैसला लेगा।
सूत्रों के मुताबिक, कमेटी ने पहली रिपोर्ट में कन्हैया कुमार, उमर खालिद और अनिर्बन को दो-दो सेमेस्टर निलंबित करने की सिफारिश की थी। इसी सिफारिश को बरकरार रखा गया है। जिसके बाद दोनों की पीएचडी डिग्री सस्पेंड हो गई है। दरअसल, कन्हैया पीएचडी में चौथे वर्ष का छात्र है। जबकि खालिद को एक साल का एक्सटेंशन मिला हुआ है।

कैंसर से जूझ रहीं सोनाली बेंद्रे
अभिनेत्री सोनाली बेंद्रे को हाई ग्रेड कैंसर की खबर ने उदास किया। सोनाली ने खुद इस बात की जानकारी सोशल मीडिया पर दी थी। अभी न्यूयॉर्क में उनका इलाज चल रहा है। फिल्म जगत की हस्तियां, सोनाली के दोस्त और देशभर से लोग उनकी सलामती की दुआ कर रहे हैं।

अंततः गुलजार की पंक्तियां,
“सब्र हर बार इख्तियार किया,
हम से होता नहीं हजार किया, 
आदतन तुम ने कर दिए वादे,
आदतन हम ने एतबार किया।”
सोनी सिंह

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