प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी आने वाले हैं। चार साल से ज्यादा समय के कार्यकाल में उन्होंने दिल्ली से वाराणसी की दूरी कई बार नापी भी। लेकिन कितनी बदली काशी की तस्वीर और यहां के लोगों की तकदीर? लोकसभा चुनाव पास है और वाराणसी के लोग खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं, तो बात तो होगी ही, पर हर जुबान पर मोदीजी के लिए सीख भी है, “काशी कबहुँ न छोड़िये...
पिछले चार सालों में अगर देश के किसी शहर ने सबसे ज्यादा अव्यवस्था देखी है, तो वो हैं देश की सांस्कृतिक राजधानी वाराणसी। मोदी के सत्ता में आने के बाद से ही कभी इसे “क्योटो” बनाया गया, तो कभी जुमलों की मोनो-मेट्रो दौड़ी।यहां तक की आधुनिकता के नाम पर पुराने शहर पर बुलडोजर चला दिया गया। माँ गंगा अपनी निर्मलता के लिए राजनेताओं के दफ्तर के चक्कर काट-काट के आज थक चुकीं हैं। बनारस की अल्हड़ आत्मा मर रही हैं और तानाशाही तरीके से इसके शरीर को नोचने की कवायद जारी हैं। अब जब मोदी एक बार फिर से अपने चुनावी अभियान पर हैं, तो काशी की अस्मिता बाबा विश्वनाथ के भरोसे ही है।
युवाओं से क्या कहेंगे ‛सरकार’
प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी जितनी बार भी काशी के दौरे पर आए उन्हें युवाओं के विरोध का सामना करना पड़ा हैं। कभी युवाओं ने मोदी को काले झंडे दिखाए, तो कभी उनके खिलाफ नारे लगाए गए। बीएचयू में तो युवाओं का विरोध इतना प्रचंड था कि मोदी को रास्ता बदलना पड़ा। मोदी के सिपहसलारों के कहने पर छात्र-छात्राओं पर लाठियां तक चलीं। फिर मामले की लीपापोती करने की कवायद शुरू हुई और वीसी को कुर्सी गंवानी पड़ी। आज भी यहाँ के युवाओं का आक्रोश कम नहीं हुआ हैं और वो गाहे बगाहे प्रधानमंत्री के खिलाफ मार्च निकालते रहते हैं। अब जब मोदी एक बार फिर से वाराणसी आने वाले हैं तो बीजेपी ने कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए एबीवीपी को सक्रीय कर दिया गया है। पर विरोध तो होगा ही जिस युवा के वोट लेकर मोदी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे उन्हें ही मोदी ने रोजगार के लिए तरसा दिया। और अब जब लोकसभा चुनाव फिर करीब है, तो रोजगार को लेकर आंकड़ों को ही कठघरे में खड़ा कर रहे हैं!
मोदीजी से रूठा संत समाज!
हिंदूवादी छवि के साथ राजनीति में पदार्पण करने वाले और हिंदुत्व की बात कर दिल्ली तक पहुंचने वाले नरेंद्र मोदी “राम” और अयोध्या दोनों से कन्नी काटते दिख रहे हैं। मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद एक भी ऐसा निर्णय नहीं लिया, जिससे हिंदुत्व को मानने वालों को कोई फायदा पहुंचा हो। यहाँ तक की हिन्दुओं के पुरोधाओं साधू-संतों को भी मोदी ने नहीं छोड़ा और उन्हें माँ गंगा की निर्मलता और राम मंदिर के निर्माण के नाम पर ठगते रहे। गाहे बगाहे सीधे और अपरोक्ष रूप से साधू-संतों ने मोदी को चेताया भी है। अब जब मोदी एक बार फिर से वाराणसी के दौरे पर आने वाले हैं, तो क्या बीजेपी फिर से साधू-संतों को साध पाएगी? ये तो वक्त ही बताएगा। हां, इतना जरूर हैं, अगर मोदी से रूठ संत समाज मान भी गया, तो ये संत गण अपने अनुयायियों को क्या जबाब देंगे! ऐसे में, वाराणसी की गलियों में चर्चा है कि इस बार मोदीजी को साधू-संतों का विरोध झेलना पड़ सकता है।
छोटे व्यापारियों में नाराजगी
नोटबंदी और जीएसटी लाकर प्रधानमंत्री ने छोटे व्यापारियों को लगभग हाशिये पर डाल दिया। बहुत से व्यापार बंद हो गए और बहुत से बंदी के कगार पर हैं। कुछ की दुकानें विकास की बलि जरूर चढ़ गईं। जुलाहों-बुनकरों का हाथ भी खाली ही रहा। बात ‛अच्छे दिन’ की हो या ‛सबका साथ, सबका विकास’ आस लगाए, टकटकी बांधे बस लोग इन्तजार करते रहे। विकास कुछ हद तक हुआ भी, लेकिन अफसरशाही और लापरवाही ने जानें भी लील लीं। घाट तो जगमगाएं, लेकिन गंगा साफ होने की बजाय सिकुड़ती गईं। नतीजतन, लोग पानी को तरसने लगे।
बहरहाल, सिर्फ इतना कि ये काशी है शिव की नगरी, जहां के बाशिंदे अक्खड़ भी हैं और फक्कड़ भी। इसलिए मोह या माया से इनको भरमाया नहीं जा सकता और कनफ्यूजन का तो सवाल ही नहीं उठता।
■ सिद्धार्थ सिंह
पिछले चार सालों में अगर देश के किसी शहर ने सबसे ज्यादा अव्यवस्था देखी है, तो वो हैं देश की सांस्कृतिक राजधानी वाराणसी। मोदी के सत्ता में आने के बाद से ही कभी इसे “क्योटो” बनाया गया, तो कभी जुमलों की मोनो-मेट्रो दौड़ी।यहां तक की आधुनिकता के नाम पर पुराने शहर पर बुलडोजर चला दिया गया। माँ गंगा अपनी निर्मलता के लिए राजनेताओं के दफ्तर के चक्कर काट-काट के आज थक चुकीं हैं। बनारस की अल्हड़ आत्मा मर रही हैं और तानाशाही तरीके से इसके शरीर को नोचने की कवायद जारी हैं। अब जब मोदी एक बार फिर से अपने चुनावी अभियान पर हैं, तो काशी की अस्मिता बाबा विश्वनाथ के भरोसे ही है।
युवाओं से क्या कहेंगे ‛सरकार’
प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी जितनी बार भी काशी के दौरे पर आए उन्हें युवाओं के विरोध का सामना करना पड़ा हैं। कभी युवाओं ने मोदी को काले झंडे दिखाए, तो कभी उनके खिलाफ नारे लगाए गए। बीएचयू में तो युवाओं का विरोध इतना प्रचंड था कि मोदी को रास्ता बदलना पड़ा। मोदी के सिपहसलारों के कहने पर छात्र-छात्राओं पर लाठियां तक चलीं। फिर मामले की लीपापोती करने की कवायद शुरू हुई और वीसी को कुर्सी गंवानी पड़ी। आज भी यहाँ के युवाओं का आक्रोश कम नहीं हुआ हैं और वो गाहे बगाहे प्रधानमंत्री के खिलाफ मार्च निकालते रहते हैं। अब जब मोदी एक बार फिर से वाराणसी आने वाले हैं तो बीजेपी ने कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए एबीवीपी को सक्रीय कर दिया गया है। पर विरोध तो होगा ही जिस युवा के वोट लेकर मोदी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे उन्हें ही मोदी ने रोजगार के लिए तरसा दिया। और अब जब लोकसभा चुनाव फिर करीब है, तो रोजगार को लेकर आंकड़ों को ही कठघरे में खड़ा कर रहे हैं!
मोदीजी से रूठा संत समाज!
हिंदूवादी छवि के साथ राजनीति में पदार्पण करने वाले और हिंदुत्व की बात कर दिल्ली तक पहुंचने वाले नरेंद्र मोदी “राम” और अयोध्या दोनों से कन्नी काटते दिख रहे हैं। मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद एक भी ऐसा निर्णय नहीं लिया, जिससे हिंदुत्व को मानने वालों को कोई फायदा पहुंचा हो। यहाँ तक की हिन्दुओं के पुरोधाओं साधू-संतों को भी मोदी ने नहीं छोड़ा और उन्हें माँ गंगा की निर्मलता और राम मंदिर के निर्माण के नाम पर ठगते रहे। गाहे बगाहे सीधे और अपरोक्ष रूप से साधू-संतों ने मोदी को चेताया भी है। अब जब मोदी एक बार फिर से वाराणसी के दौरे पर आने वाले हैं, तो क्या बीजेपी फिर से साधू-संतों को साध पाएगी? ये तो वक्त ही बताएगा। हां, इतना जरूर हैं, अगर मोदी से रूठ संत समाज मान भी गया, तो ये संत गण अपने अनुयायियों को क्या जबाब देंगे! ऐसे में, वाराणसी की गलियों में चर्चा है कि इस बार मोदीजी को साधू-संतों का विरोध झेलना पड़ सकता है।
छोटे व्यापारियों में नाराजगी
नोटबंदी और जीएसटी लाकर प्रधानमंत्री ने छोटे व्यापारियों को लगभग हाशिये पर डाल दिया। बहुत से व्यापार बंद हो गए और बहुत से बंदी के कगार पर हैं। कुछ की दुकानें विकास की बलि जरूर चढ़ गईं। जुलाहों-बुनकरों का हाथ भी खाली ही रहा। बात ‛अच्छे दिन’ की हो या ‛सबका साथ, सबका विकास’ आस लगाए, टकटकी बांधे बस लोग इन्तजार करते रहे। विकास कुछ हद तक हुआ भी, लेकिन अफसरशाही और लापरवाही ने जानें भी लील लीं। घाट तो जगमगाएं, लेकिन गंगा साफ होने की बजाय सिकुड़ती गईं। नतीजतन, लोग पानी को तरसने लगे।
बहरहाल, सिर्फ इतना कि ये काशी है शिव की नगरी, जहां के बाशिंदे अक्खड़ भी हैं और फक्कड़ भी। इसलिए मोह या माया से इनको भरमाया नहीं जा सकता और कनफ्यूजन का तो सवाल ही नहीं उठता।
■ सिद्धार्थ सिंह




No comments:
Post a Comment