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बेबाक हस्तक्षेप

भ्रष्टाचार को जड़ से मिटाने के दावों के साथ सत्ता में आने वाली केंद्र सरकार अपने अंतिम दौर में है और लोकसभा चुनाव भी निकट आ रहा है। लेकिन न ही काला धन वापस आया न भ्रष्टाचार खत्म हुआ। न्यूज चैनल पर दिखाए खबर पर गौर करें, तो प्रधानमंत्री की योजना के लाभार्थियों से बातचीत तक में “भ्रष्टाचार” है। डिजिटल इंडिया की बात करने वाली सरकार की वेबसाइट से आंकड़ों का नदारद रहना भी भ्रष्टाचार का ही अनुमान कराता है। ऊपर से विजय माल्या और नीरव मोदी जैसे लोग हजारों करोड़ लूटकर सिर्फ देश से भाग ही नहीं जाते, उनके सहयोग का शक नेताओं से लेकर सीबीआई-बैंक कर्मचारी सब पर जाता है। ऐसे में, अनुमान लगाना मुश्किल नहीं कि भ्रष्टाचार हर जगह ज्यों का त्यौं बना हुआ है।
केंद्र सरकार के दावों से इतर सच्चाई यह है कि  भ्रष्टाचार के मामले में भारत, पाकिस्तान के आसपास आकर खड़ा हो गया है। दुनिया के भ्रष्टाचार पर नजर रखने वाली संस्था ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने 2017 की रिपोर्ट के मुताबिक भ्रष्टाचार में भारत 180 देशों में 81वें नंबर पर है। स्थिति यह है कि भ्रष्टाचार सभी के जीवन का आज आम हिस्सा बन गया हैं। छोटी से लेकर बड़ी जरूरतों तक के लिए भ्रष्टाचार से दो-चार होना पड़ता है। इसे मिटाने के वादे करने वाले नेताओं की इसमें संलिप्तता गाहे बगाहे सभी के सामने खुलकर आती हैं। नतीजतन लोगों का विश्वास लोकतंत्र से उठता जा रहा है। अपराधी को न पकड़ पाने और उसको उसके अंजाम तक न पहुंचाने की टीस सभी को सालती रही हैं। एक ओर जहाँ ये आम जन मानस को शासन के प्रति हतोत्साहित करती हैं, तो वही दूसरी ओर भ्रष्टाचार में लोगो की संलिप्तता को भी बढ़ावा देती हैं। अगर इसी तरह कुछ और दिन भ्रष्टाचार का ये कुचक्र चलता रहा, तो भारत में सत्य और अहिंसा का केवल नाम ही बच जायेगा उसे लेने और उसकी दुहाई देने वाला शायद ही कोई होगा।
देश से भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए सरकार RTI लेकर आई थी, जिससे लोग खुलकर जबाब मांग सके और तंत्र में हो रहे भ्रष्टाचार को उजागर कर सके। पर समय के साथ भ्रष्टाचार पर तो अंकुश नहीं लग पाया। हाँ, अब RTI पर अंकुश लगता जरूर दिख रहा हैं। कितने ही RTI एक्टिविस्ट को मौत के घाट उतार दिया गया। मीडिया पर गाहे-बगाहे नेताओं के सम्बन्धो और उनके प्रोपेगैंडा को प्रसारित करने के आरोप लगते रहे हैं। कानून की लचर व्यवस्था से दोषी बच निकलते हैं, पुलिस से लेकर सीबीआई तक के भ्रष्टाचार में लिप्त होने के मामले सामने आते रहते हैं। ऐसे में, भ्रष्टाचार से परेशान जनता किस दरबार में अपनी गुहार लेकर जाए और कहा से न्याय की उम्मीद लगाए!! और प्रश्न यह भी उठता है कि कहां है साफ नीयत और सबका विकास? 
■ संपादकीय

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