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बेबाक हस्तक्षेप

2014 चार साल पीछे छूट चुका है और समय के साथ वादे-इरादे-नारे सब बदल गए, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि भी बदल गई। ऐसे में, 2019लोकसभा चुनाव ‛मोदी लहर’ के सहारे जीतना भी मुश्किल गया है। सो, एक बार फिर भाजपा के सफल रणनीतिकार अपनी सूझबूझ के साथ निकल पड़े हैं भाजपा के लिए सियासी जमीन तैयार करने। प्रदेशों की नब्ज टटोलते हुए इस हफ्ते भाजपा अध्यक्ष अमित शाह यूपी पहुंचे और प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से चुनावी शंखनाद किया।

विंध्यधाम और वाराणसी में व्यतीत 10 घंटों के दौरान उन्होंने काशी, अवध और गोरक्षा प्रांत के पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं, विस्तारकों, प्रदेश संगठन के पदाधिकारियों और मंत्रियों के साथ अगले लोकसभा चुनाव की तैयारियों पर मंथन किया। इस दौरान मिशन-2019 में कामयाबी के साथ-साथ अगले 50 सालों तक पंचायत से पार्लियामेंट तक काबिज रहने का खाका भी तैयार हुआ। साथ ही अमित शाह ने आईटी सेल को मूलमंत्र भी दिया। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा का फोकस पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) पर है। यही वजह है कि शामली निवासी हरवीर सिंह मलिक को पश्चिमी उत्तर प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया गया है, तो अमित विश्वकर्मा को पश्चिमी उत्तर प्रदेश पिछड़ा वर्ग मोर्चा का उपाध्यक्ष बनाया गया है। इतना ही नहीं वाराणसी में अमित शाह ने बुआ-भतीजा जोड़ी से सतर्क रहने की नसीहत भी भाजपाइयों को दे दी।

यूपी में अमित शाह ने इस बार 74 सीटें जीतने की उम्मीद जताई। अब यह कितना कठिन कार्य है यह तो शाह भी जानते हैं, क्योंकि यूपी में साफ-सफाई की लिस्ट में अव्वल रहने वाली “काशी” में गंदगी पर इस बार शाह खुद भड़के। ऐसे में, बाकी योजनाओं-दावों का क्या हाल होगा, समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है। फिर 80 लोकसभा सीटों वाला उत्तर प्रदेश सभी राजनीतिक दलों के लिए खास महत्व रखता है, तो इसकी जनता को अपने-अपने ढंग से बहलाने-फुसलाने का काम हर कोई करेगा।

इस बात की भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि 2014 के चुनाव में मोदी लहर के बावजूद भाजपा को कुल 31 प्रतिशत वोट ही मिले थे। और विपक्ष एकजुट हो गया या समाजवादी और बहुजन पार्टियों ने मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ा, तो भाजपा की 50 से 60 सीटें कम हो सकती हैं। वैसे भी, विपक्षी एकजुटता का परिणाम उपचुनाव में देख चुके हैं जब भाजपा को चारों सीटें गंवानी पड़ी, जिनमें से एक मुख्यमंत्री और एक उपमुख्यमंत्री की थी।

हालांकि, आगामी लोकसभा चुनाव जीतना सत्ता-विपक्ष किसी के लिए आसान नहीं होगा, क्योंकि हवा यदि पूरी तरह भाजपा के साथ नहीं है, तो विपक्ष के पास भी 21वीं सदी के भारत का कोई विलक्षण सपना नहीं है। इतना जरूर है कि अगर वे एकजुट हो जाते हैं, तो वे भाजपा की नैया आसानी से डुबो सकते हैं। मगर विपक्षी एकजुटता में बहुत से किंतु-परंतु हैं, सो इनका साथ आना आसान नहीं होगा और आ भी गए तो साथ बने रहना भी उतना ही मुश्किल होगा।
कुल मिलाकर, वर्तमान में भाजपा के चाणक्य अमित शाह देश के प्रदेशों और लोगों के बीच तुरुक का इक्का तलाश रहे हैं और मिलते ही एक बार फिर नरेंद्र मोदी की ताजपोशी की राह आसान करने का ब्रह्मशास्त्र चल देंगे।
■ संपादकीय

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