पुण्यतिथि विशेष : आज स्वामी विवेकानंद की 113 वीं पुण्यतिथि हैं। विराट भारतीय मनीषियों की श्रृंखला के वाहक स्वामी विवेकानंद ने हिन्दू विचारधारा का परचम पूरे विश्व में लहराया। ये स्वामी विवेकानंद ही थे, जिन्होंने समाज में फैली कुरीतियों का भी जमकर विरोध किया और सत्य और सन्मार्ग पर चलने का रास्ता दिखया। आज उनकी पुण्यतिथि पर काशी पत्रिका उनको नमन करते हुए उनके जीवन के कुछ वृतांतों और विचारों को अपने पाठकों के साथ साझा कर रही हैं।स्वामी विवेकानंद को हुआ समाधि का अनुभव
विवेकानंद जब सिर्फ 19 साल के थे, तो वह बहुत तर्कसम्मत और बुद्धिमान थे। साथ ही, वह जोश से भरे हुए थे। वह हर चीज का जवाब चाहते थे। उन्होंने आकर रामकृष्ण से कहा, ‘आप हर समय बस भगवान, भगवान करते रहते हैं। इसका क्या प्रमाण है कि भगवान हैं? मुझे सुबूत दीजिए।’ रामकृष्ण बहुत साधारण इंसान थे। वह पढ़े-लिखे नहीं थे। वह विद्वान नहीं, आध्यात्मिक पुरुष थे। तो उन्होंने कहा, ‘मैं ही प्रमाण हूं।’रामकृष्ण बोले, ‘मैं इस बात का प्रमाण हूं, कि ईश्वर है।’विवेकानंद को समझ नहीं आया कि वह क्या करें क्योंकि यह तो बस पागलपन था। वह किसी बौद्धिक जवाब की उम्मीद कर रहे थे कि ‘बीज का अंकुरण और पृथ्वी का घूमना ईश्वर के होने का प्रमाण है।’ मगर रामकृष्ण बोले, ‘मैं इसका प्रमाण हूं कि ईश्वर का अस्तित्व है।’ रामकृष्ण के कहने का मतलब यह था कि ‘मैं जैसा हूं, यह प्रमाण है।’ विवेकानंद को समझ नहीं आया कि वह क्या कहें और वह चले गए।तीन दिन बाद, उन्होंने वापस आकर पूछा, ‘ठीक है, क्या आप मुझे ईश्वर के दर्शन करा सकते हैं?’ रामकृष्ण ने पूछा, ‘तुम्हारे पास उन्हें देखने की हिम्मत है?’ उस साहसी लड़के ने कहा, ‘हां’ क्योंकि यह बात उसे परेशान कर रही थी। रामकृष्ण ने विवेकानंद की छाती पर अपने पैर रख दिए और विवेकानंद समाधि की अवस्था में चले गए, जहां वह मन की सीमाओं से परे चले गए। वह लगभग 12 घंटे बाद समाधि से बाहर आए और जब आए, तो वह पूरी तरह बदल चुके थे। उसके बाद उन्होंने अपने जीवन में कभी कोई प्रश्न नहीं पूछा.
विवेकानंद को मां शारदा का आशीर्वाद
जब तक आप भक्त नहीं हैं, जीवन को आपके लिए उन्मुक्त नहीं होना चाहिए क्योंकि यदि वह उन्मुक्त होता है, तो आप खुद को और बाकी हर किसी को नुकसान ही पहुंचाएंगे। भारत में कभी किसी ऐसे इंसान को ज्ञान नहीं सौंपा जाता था, जिसमें भक्ति की कमी हो।विवेकानंद के जीवन में एक खूबसूरत घटना हुई। रामकृष्ण परमहंस का देहांत हो चुका था, विवेकानंद ने देश भर में घूम-घूम कर युवकों का एक समूह इकट्ठा किया। वह देश को बनाने और देश की सूरत को बदलने की कोशिश कर रहे थे। तभी किसी ने उन्हें बताया कि अमेरिका के शिकागो में धर्म संसद आयोजित हो रही है। लोगों ने विवेकानंद को वहां जाने की सलाह दी क्योंकि यहां कोई उनकी बात नहीं सुन रहा था। कोई भी नहीं! एक युवक जगह-जगह जाकर बड़ी-बड़ी बातें कर रहा था, जो धर्मग्रंथों में लिखी हुई नहीं हैं। कौन उसे सुनना चाहता? उन्होंने कहा, ‘तुम वहां जाकर उन्हें झकझोरो। अगर तुम वहां उन्हें झकझोरोगे, तो यहां हर किसी का ध्यान तुम्हारी ओर जाएगा।’पश्चिम के लिए निकलने से पहले वह रामकृष्ण की पत्नी शारदा का आशीर्वाद लेने गए। वह पहली बार रामकृष्ण का संदेश लेकर अमेरिका जा रहे थे।जब विवेकानंद पहुंचे, उस समय शारदा खाना बना रही थीं। वह कोई धुन गुनगुना रही थीं। 20-30 मिनट का भोजन बनाने में, वे कम से कम तीन से चार घंटे लगाती थीं और हमेशा खाना बनाते समय गाती रहती थीं। जब विवेकानंद ने आकर कहा, ‘मैं अपने गुरु का संदेश पूरी दुनिया तक पहुंचाने के लिए अमेरिका जाना चाहता हूं,’ तो शारदा ने जवाब नहीं दिया। फिर वह अचानक बोलीं, ‘नरेन, वह चाकू मुझे देना।’ विवेकानंद ने उन्हें चाकू पकड़ाया और एक खास तरीके से उसे दिया। फिर मां शारदा बोलीं, ‘तुम जा सकते हो, मैं तुम्हें आशीर्वाद देती हूं।’ विवेकानंद ने पूछा, ‘आपने मुझे इतनी देर बाद आशीर्वाद क्यों दिया और सबसे पहले तो आपने मुझसे चाकू क्यों मांगा? आप तो सब्जियां काट चुकी थीं?’ वह बोलीं, ‘मैं सिर्फ यह देखना चाहती थी कि अपने गुरु के जाने के बाद तुम्हारे अंदर क्या बदलाव आया है? जिस तरह से तुमने मुझे चाकू पकड़ाया, उससे मुझे पता चल गया कि तुम वहां जाने के लिए बिल्कुल सही इंसान हो, तुम अपने गुरु का संदेश लेकर जाने के लिए बिल्कुल उपयुक्त हो।’
स्वामी विवेकानंद के विचार
▶️जिस क्षण मैंने यह जान लिया कि भगवान हर एक मानव शरीर रुपी मंदिर में विराजमान हैं, जिस क्षण मैं हर व्यक्ति के सामने श्रद्धा से खड़ा हो गया और उसके भीतर भगवान को देखने लगा – उसी क्षण मैं बन्धनों से मुक्त हूँ, हर वो चीज जो बांधती है नष्ट हो गयी, और मैं स्वतंत्र हूँ।
▶️स्वतंत्र होने का साहस करो. जहाँ तक तुम्हारे विचार जाते हैं वहां तक जाने का साहस करो, और उन्हें अपने जीवन में उतारने का साहस करो।
▶️प्रेम विस्तार है, स्वार्थ संकुचन है। इसलिए प्रेम जीवन का सिद्धांत है. वह जो प्रेम करता है जीता है, वह जो स्वार्थी है मर रहा है। इसलिए प्रेम के लिए प्रेम करो, क्योंकि जीने का यही एक मात्र सिद्धांत है, वैसे ही जैसे कि तुम जीने के लिए सांस लेते हो।
▶️हम जो बोते हैं वो काटते हैं। हम स्वयं अपने भाग्य के विधाता हैं। हवा बह रही है, वो जहाज जिनके पाल खुले हैं, इससे टकराते हैं, और अपनी दिशा में आगे बढ़ते हैं, पर जिनके पाल बंधे हैं हवा को नहीं पकड़ पाते। क्या यह हवा की गलती है ?…..हम खुद अपना भाग्य बनाते हैं।
▶️श्री रामकृष्ण कहा करते थे,” जब तक मैं जीवित हूँ, तब तक मैं सीखता हूँ ”.वह व्यक्ति या वह समाज जिसके पास सीखने को कुछ नहीं है वह पहले से ही मौत के जबड़े में है।
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