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काशी सत्संग: विनम्रता ही संत का गुण


शांत स्वभावी संत एकनाथ को नाहक कोई सताता था, तो वे चुपचाप सहन कर लेते थे। उनकी विनम्रता को देखकर अधिकांश लोग उन्हें महात्मा मानने लगे, जिस पर कुछ लोग उन्हें महात्मा कहे जाने पर ईर्ष्या करने लगे। एकनाथ गंगा नदी से नहाकर घर आ रहे थे, तो एक ईर्ष्यालु व्यक्ति रोज-रोज उन पर थूकता। एकनाथ चुपचाप लौट जाते और फिर नहाकर आते। इस तरह 108 बार ऐसा हुआ। अंतिम बार वह नहाकर आए और इंतजार करने लगे कि वह व्यक्ति कब थूके।
वह आदमी एकनाथ के पास आया और पश्चाताप करता हुआ बोला-महाराज! मैं आपसे अपने गुनाहों की माफी मांगता हूं। संत एकनाथ मुस्कराते हुए बोले-श्रीमान! आपके गुनाह के कारण ही तो आज मुझे 108 बार पवित्र गंगा नदी में नहाने का पुण्य मिला है। यानी जो सच्चा संत है, वो किसी भी परिस्थिति में विनम्रता का त्याग नहीं करता।
ऊं तत्सत...

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