Kashi Patrika

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वाराणसी के जैन देवालय

April 29, 2021 0
वाराणसी के जैन देवालय

 सनातन काशी का कण-कण शंकर है। परमधाम काशी में धर्म चिरस्थाई और शाश्वत है। कभी यहाँ तथागत बुद्ध उपदेश देते है तो वही मध्यकाल में कबीर, तुलसी, रैदास की सामाजिक चेतना के रूप में धर्म आम जन के दैनिक क्रियाकलापों के रूप में रचा-बसा मिलता हैं। अनेकानेक साधु-संतो,मठों, आश्रम,गुरुकुल,धर्मप्रचारकों की एक लम्बी श्रृंखला है जो काशी को धर्मक्षेत्र के रूप में अग्रणी पंक्ति में रखती है। इन्हीं सबके बीच काशी में जिन परम्परा की भी एक लम्बी थाती है जिसमे जैन धर्म के 24 में से चार प्रमुख तीर्थंकर पार्श्‍वनाथ (तेइसवें), सुपार्श्‍वनाथ (सातवें), त्रेयांसनाथ (ग्‍यारहवें) व चंद्रप्रभुनाथ जी (आठवें) का जन्‍मस्‍थल धर्म नगरी काशी हैं। 

जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव और अंतिम महावीर स्वामी हुए। 24 तीर्थंकरों की इस लम्बी श्रृंखला में तेइसवें पार्श्‍वनाथ का जन्म काशी में हुआ; वर्तमान शोधों के आधार पर इन्हें ही जैन धर्म के स्थापना का श्रेय दिया जाता हैं। जैन धर्म मुख्य रूप से पाँच बातों पर विशेष बल देता है जो क्रमशः अहिंसा, अचौर्य(चोरी नहीं करना), असत्येय (झूठ नहीं बोलना), अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य हैं। 

जैन धर्म 
जैन शब्द संस्कृत के जिन शब्द से बना है, जिसका अर्थ विजेता ( जितेन्द्रिय ) होता है। जैन महात्माओं को निर्ग्रन्थ ( बंधन रहित ) व जैन धर्म के अधिष्ठाता को तीर्थंकर कहा गया। जैन धर्म में प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव या आदिनाथ थे। अरिष्टनेमि का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। 22वें तीर्थंकर अरिष्टनेमि को भी वासुदेव कृष्ण का भाई बताया गया है। जैन धर्मावलम्बियों  विश्वास है कि उनके सबसे महान धर्मोपदेष्टा महावीर थे इसके पहले तेईस और आचार्य हुए हैं, जो तीर्थंकर कहलाते थे।धर्म के प्राचीन सिद्धांतों के उपदेष्टा तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ माने जाते हैं, जो वाराणसी के निवासी थे। जैन अनुश्रुतियों के अनुसार पार्श्वनाथ को 100 वर्ष की आयु में सम्मेद पर्वत पर निर्वाण प्राप्त हुआ। पार्श्वनाथ द्वारा प्रतिपादित चार महाव्रत इस प्रकार हैं- सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह तथा अस्तेय। 

जैन धर्म के सिद्धांत 

जैन धर्म के पांच व्रत -
अहिंसा या हिंसा नहीं करना चाहिए 
सत्य या झूठ नहीं बोलना चाहिए 
अस्तेय या चोरी नहीं करना चाहिए 
अपरिग्रह या संपत्ति अर्जित नहीं करना  
ब्रह्मचर्य या इंद्रियों को वश में करना 

इन पांच व्रतों में ऊपर के चार पार्श्वनाथ ने दिए थे जबकि पांचवा व्रत ब्रह्मचर्य महावीर ने जोड़ा। जैन धर्म में अहिंसा युअ किसी प्राणी को नहीं सताने के व्रत को सबसे अधिक महत्व दिया गया है। जैन धर्म दो सम्प्रदाओं में विभक्त होगया श्वेताम्बर अर्थात सफ़ेद वस्त्र धारण करने वाले और दिगंबर अर्थात नग्न रहने वाले। जैन धर्म में देवताओं के अस्तित्व को स्वीकार किया गया है , परन्तु उनका स्थान जिन से नीचे रखा गया है। 


पार्श्वनाथ जैन मंदिर

यह मंदिर जैनियों के 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ को समर्पित है, इनका जन्म महावीर स्वामी के जन्म से 250 वर्ष पूर्व हुआ।  इनके पिता- अश्वसेन ( काशी के राजा ) माता- वामादेवी ( नरवर्मन की पुत्री ) थी। पत्नी- प्रभावती ( कुशस्थल की राजकुमारी ) पार्श्वनाथ 23वें तीर्थंकर थे तथा ऐतिहासिक माने जाते है। जैन ग्रंथों में पार्श्वनाथ को पुरुषादनीयं कहा गया है। इनके अनुयायियों को निर्ग्रन्थ कहा जाता था- जो शहर के मध्य क्षेत्र से दूर भेलूपुर में स्थित है। यह मंदिर अपने नाम के अनुरूप तीर्थंकर की जन्मस्थली का स्मरण कराता है। मंदिर में किया गया जाली का कार्य बहुत उत्कृष्ट व जटिल है। इसकी दीवारों पर भी नक्काशी इसका महत्व बढ़ाती है। इस मंदिर का प्रबंधन जैन धर्म के दिगाम्बर सम्प्रदाय द्वारा किया जाता है। पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र होने के साथ-साथ जैन समुदाय के लोगों के लिए यह तीर्थस्थल भी है। ऐसी मान्यता है कि यह भगवान आदिनाथ के समय में बनाया गया था। ऐसा भी कहा जाता है कि काशी के राजा की पुत्री सुलोचना का स्वयंवर यहीं पर आयोजित किया गया था। इस तीर्थ का उल्लेख विविध तीर्थ कल्प में भी मिलता है, जिसकी रचना आचार्य जी प्रभा सूरि स्वराजी ने 14वीं सदी में की थी।

श्रेयांशनाथ दिगम्बर जैन मंदिर, सारनाथ 

श्रेयांसनाथ ग्यारहवें तीर्थंकर हैं। श्रेयांसनाथ जी का जन्म फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया को श्रवण नक्षत्र में सिंहपुरी में हुआ था। प्रभु के माता पिता बनने का सौभाग्य इक्ष्वाकु वंश के राजा विष्णुराज व पत्नी विष्णु देवी को प्राप्त हुआ था। इनके शरीर का वर्ण सुवर्ण (सुनहरा) और चिह्न गेंडा था। भगवान श्रेयांसनाथ तीर्थंकर के जन्म एवं चार कल्याणकों के कारण यह प्राचीन काल से जैन तीर्थ रहा है। यहाँ उनके गर्भ, जन्म, दीक्षा और केवलज्ञान ये चार कल्याणक हुए थे। विद्वानों का मत है कि तीर्थंकर श्रेयाँसनाथ जी का जन्म स्थान होने के कारण ही इस स्थान का नाम ‘‘सारनाथ’ पड़ गया है। श्रेयांसनाथ जी शुरु से ही वैरागी थे। लेकिन माता-पिता की आज्ञानुसार उन्होंने गृहस्थ जीवन को भी अपनाया और राजसी दायित्व को भी निभाया। श्रेयांसनाथ जी के शासनकाल के दौरान राज्य में सुख समृद्धि का विस्तार हुआ। लेकिन जल्द ही उन्होंने अपने पुत्र को उत्तराधिकारी बना वैराग्य धारण कर लिया। जैन धर्मानुसार ऋतुओं का परिवर्तन देखकर भगवान को वैराग्य हुआ। ‘विमलप्रभा’ पालकी पर विराजमान होकर मनोहर नामक उद्यान में पहुँचे और फाल्गुन शुक्ल एकादशी के दिन हजार राजाओं के साथ दीक्षित हुए। दो माह तक प्रभु छ्दमस्थ साधक की भुमिका में रहे। माघ कृष्ण अमावस्या के दिन प्रभु केवली बने। श्रावण कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को प्रभु श्रेयांसनाथ ने सम्मेद शिखर पर निर्वाण किया।


मंदिर के गर्भगृह में तीर्थंकर श्रेयांसनाथ जी की ढाई फिट ऊँची श्याम वर्ण की मनोज्ञ प्रतिमा विराजमान है उसी वेदी में आगे एक छोटी श्वेतवर्ण की श्रेयांसनाथ की प्रतिमा है। भगवान की वेदी अत्यन्त कलापूर्ण है। मुख्यवेदी के बगल में नन्दीश्वर जिनालय का फलक है जिसमें ६० प्रतिमाएँ बनी हुई हैं यह भूगर्भ से प्राप्त हुई थीं। तीर्थंकर श्रेयांसनाथ जी का मंदिर अत्यन्त रमणीक स्थान पर स्थित है मंदिर के चारों तरफ एवं बाहर की हरियाली का दृश्य नयनाभिराम है। यहाँ ठहरने के लिए जैन धर्मशाला बनी हुई है पर अधिकतर यात्री वाराणसी में ही निवास करते हैं। 

सुपार्श्वनाथ जन्मस्थली, भदैनी 

जैन धर्म के सातवें तीर्थंकर भगवान श्री सुपार्श्वनाथ जी का जन्म वाराणसी के इक्ष्वाकुवंश में ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को विशाखा नक्षत्र में हुआ था। इनके माता का नाम पृथ्वी देवी और पिता का नाम राजा प्रतिष्ठ था। इनके शरीर का वर्ण सुवर्ण था और इनका चिह्न स्वस्तिक था। 

इनके यक्ष का नाम मातंग और यक्षिणी का नाम शांता देवी था। जैन धर्मावलम्बियों के मतानुसार भगवान श्री सुपार्श्वनाथ जी के कुल गणधरों की संख्या 95 थी, जिनमें विदर्भ स्वामी इनके प्रथम गणधर थे। ज्येष्ठ मास की त्रयोदशी तिथि को वाराणसी में ही इन्होंने दीक्षा प्राप्ति की और दीक्षा प्राप्ति के 2 दिन बाद इन्होंने खीर से प्रथम पारण किया। दीक्षा प्राप्ति के पश्चात् 9 महीने तक कठोर तप करने के बाद फाल्गुन कृष्ण पक्ष सप्तमी को धर्म नगरी वाराणसी में ही शिरीष वृक्ष के नीचे इन्हें कैवल्यज्ञान की प्राप्ति हुई थी।

भगवान श्री सुपार्श्वनाथ जी ने हमेशा सत्य का समर्थन किया और अपने अनुयायियों को अनर्थ हिंसा से बचने और न्याय के मूल्य को समझने का सन्देश दिया। फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की सप्तमी के दिन भगवान श्री सुपार्श्वनाथ ने सम्मेद शिखर पर निर्वाण को प्राप्त किया था।

चन्द्रप्रभ प्रभु जन्मस्थली, चंद्रपुरी 

चन्द्रप्रभ प्रभु आठवें तीर्थंकर के रूप में प्रसिद्ध है। चन्द्रप्रभ जी का जन्म पावन नगरी काशी जनपद के चन्द्रपुरी में पौष माह की कृष्ण पक्ष द्वादशी को अनुराधा नक्षत्र में हुआ था। इनके माता पिता बनने का सौभाग्य राजा महासेन और लक्ष्मणा देवी को मिला। इनके शरीर का वर्ण श्वेत (सफ़ेद) और चिह्न चन्द्रमा था।

चन्द्रप्रभ जी ने भी अन्य तीर्थंकरों की तरह तीर्थंकर होने से पहले राजा के दायित्व का निर्वाह किया। साम्राज्य का संचालन करते समय ही चन्द्रप्रभ जी का ध्यान अपने लक्ष्य यानि मोक्ष प्राप्त करने पर स्थिर रहा। पुत्र के योग्य होने पर उन्होंने राजपद का त्याग करके प्रवज्या का संकल्प किया।

एक वर्ष तक वर्षीदान देकर चन्द्रप्रभ जी ने पौष कृष्ण त्रयोदशी को प्रवज्या अन्गीकार की। तीन माह की छोटी सी अवधि में ही उन्होंने फ़ाल्गुन कृष्ण सप्तमी के दिन केवली ज्ञान को प्राप्त किया और धर्मतीर्थ की रचना कर तीर्थंकर पद उपाधि प्राप्त की। भाद्रपद कृष्णा सप्तमी को भगवान ने सम्मेद शिखर पर मोक्ष प्राप्त किया।

वर्तमान में सुन्दर जिनालय में श्वेत वर्ण के 45 सेमी पद्मासनस्थ श्री चन्द्रप्रभ स्वामी मूलनायक के रूप में विराजमान हैं। यह तीर्थ वाराणसी से लगभग 23 किमी की दूरी पर वाराणसी-गाजीपुर मार्ग पर स्थित हैं। तीर्थ का वर्णन तीर्थमाला में मिलता है और माना जाता है कि विक्रम के 14 सदी में इस तीर्थ का अस्तित्व था। 

February 13, 2021 0

हर ठौर गुजरी आहिस्ते से 

हस्ती-खिलखिलाती रुककर खींचती अंगड़ाइयाँ लेते 

'सिफ़र' कई और सफर है तुझी से रूबरू 

साथ ही रहना ऐ जिंदगी; हमसफ़र बनकर........ 

'मिर्ज़ापुर' बड़ा ही दिलचस्प जिला है; बनारस से लगभग 60 किमी दक्षिण-पश्चिम में माँ गंगा के किनारे बसा मुख्य शहर और बीहड़ पहाड़ियों में छोटे-बड़े बसे अनगिनत बस्तियों वाला। चट्टानों से अठखेलियाँ करते जूझते बनते-बिगड़ते अनगिनत बरसाती और सदानीरा पहाड़ी झड़ने, पथरीले वीराने में अटके दिन-रात, गांव, जंगल, जनावर, मंदिर-मस्जिद, आमिर-ग़रीब; बहुत कुछ वैसा ही जैसा दुनियां के किसी और कोने सा। बस एक बात है जो इसे औरो से अलग करता है वो है प्रकृति की गोद मे बैठा एकटक निहारता शाम का सख्त सन्नाटा जो सूरज के साथ ही ढलते बढ़ता जाता है, रात होते घुप्प अँधेरे में खो जाने को बोझिल बनते-बिगड़ते किसी भी जगह बनने वाले फ़रेबी सपनों में। यकीन मानिए इन कुछ दिलकश लम्हों को अगर करीब से जीना है तो यही आना होगा-भेड़चाल की कश्मक़श से ऊबकर। इन चंद लम्हों के सन्नाटे में वो सबकुछ है जिसे शायद कभी किसी शायर ने लिखा हो या जीवन की सघन समझ रखने वाले किसी कवि या दार्शनिक ने यूं ही झूमकर बतलाया हो।  

देसी बोल है 'मिर्ज़ापुरी बगल में छूरी' कुछ ऐसे ही लोग भी है स्याह जिंदगी की सच्चाई से रूबरू हुए, जानते है - अच्छाई भली थी जीने को जबतक धरती पर इंसान रहते थे अब तो हम है। वैसे तो यहाँ देखने, करने और जीने को बहुत कुछ है जैसे माँ विंध्यावासनी का दरबार, माँ गंगा का किनारा, पहाड़ी सुबह-शाम, गांव, जंगल, जानवर, प्रागैतिहासिक गुफाएँ, ऐतिहासिक किले, रजवाड़ों की हवेलियां, गांव, झड़ने, पास बसे फॉसिल और रेत में लिपटा मिनी गोआ। पर इस बार इस घुमक्कड़ से आपका साथ मिर्ज़ापुर मुख्य राजमार्ग को काटते हुए गुजरे सिरसी बांध और झड़ने का है। 

बात बीते साल की है, जब हमारे अभिन्न मित्र पहुंचे मिर्ज़ापुर दर्शन को तो हमलोगों ने झटपट प्लान बनाया सिरसी का। प्रकृति की गोद में बैठा एक मनोरम स्थल। दूर तक फैला डैम का पानी और झड़ने से निर्बाह बहता जलरूपी अथाह प्रेम और जीवन।  सड़क पर दौड़ती मोटरबाईक और दिल में कौतुहल लिए, हम सभी पहुंच गए सिरसी। मिर्ज़ापुर शहर से रास्ता करीब 2.5 घण्टे का है राबर्ट्सगंज-सोनभद्र मुख्य राजमार्ग से रास्ता मड़िहान से पहले कटता है जो पथरीले गांव और पहाड़ी इलाकों से होता सीधे सिरसी पहुँचता है। सिरसी डैम एक वृहद् भूमिका है जिससे आभास होता है किसी बड़े झील का, मोहक पहाड़ियों से घिरा, जिसके एक छोर का पता ही नहीं लगता। डैम का पानी मुख्य रूप से कृषि कार्य की सिंचाई में प्रयोग होता है और साल भर बना रहता है। डैम को पार कर रास्ता सिरसी फॉल को पहुंच जाता है। पथरीली संरचना है जहां एक ओर तो पानी डैम को जाता है और दूसरी ओर प्रवाह अवरुद्ध है। आप झड़ने के हर ढलान को ऊपर से घूम कर देख सकते है और नीचे उतरकर बनी छोटी झील का भी आनंद ले सकते है। जगह बिलकुल ही बियाबान है और खासकर गर्मियों के मौसम में तो यहाँ विरले ही कोई आता होगा जब चट्टानें तप्त सूर्य सा जलती है। 

ट्रैकिंग और एडवेंचर से भरा दिन खूब बीता। शाम को वहीं पर भोजन और धुंधलके में बाईक की रौशनी में हम पथरीले रास्तों से गुजरते वापस लौटे। सिरसी की बियाबान पहाड़ियों में बैठकर ढ़लते सूरज को देखना एक नैसर्गिक अनुभव है। 

वर्तमान में राज्य सरकार सैलानियों के बोटिंग, एडवेंचर स्पोर्ट्स और विभिन्न पर्यटन सम्बंधी क्रियाकलापों के लिए डैम को प्रयोग में लाने के प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार कर रही है। रोपवे और स्काईवे भी इन्हीं कुछेक भविष्य के प्रयास होंगे। 

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March 24, 2020 0
नासा का पारकर प्रोब सूर्य के राज खोलने को तैयार

अगले महीने 4 अगस्त को नासा अपने प्रोब पारकर को लॉंच करेगा। ये सूर्य की कोरोना और इसके हीट वैव के कारणों का पता लगाएगा। ये अपनी तरह का पहला मिशन होगा जिसमे कोई मानव निर्मित सेटेलाईट सूर्य के इतने नजदीक जाकर हमें उसके बारे में जानकारी देगा। कुछ समय तक पहले ये संभव नहीं था क्योकि सूर्य का तापमान बहुत अधिक हैं। पर नई खोजों ने इस मिशन को कामयाब बनाया हैं।
इस प्रोब में एक ख़ास तरीके का कार्बन शील्ड लगा हैं जो इसे सूर्य की अत्यधिक गर्मी से बचाएगा। इस मिशन की ख़ास बात ये हैं कि सिर्फ तीन महीने के भीतर ही दिसंबर से सूर्य के पास पहुंचकर हमें उसकी तस्वीरें और जानकारी भेजने लगेगा।

टेस्ट ट्यूब आर्टिफीसियल न्यूरल नेटवर्क मॉलिक्युलर लिखाई को पहचानने में सक्षम बना 
हाल ही में वैज्ञानिकों ने टेस्ट ट्यूब आर्टिफीसियल न्यूरल नेटवर्क का निर्माण DNA से किया हैं। इस नए प्रयोग में परिणाम क्रन्तिकारी हो सकते हैं। ये भविष्य में बनने वाली सभी वस्तुओं की मॉलिक्यूल से बनने की सम्भावना को दर्शाता हैं जिससे सभी  निर्मित वस्तुए पर्यावरण की प्रति ज्यादा संवेदनशील बनेंगी। पुराने सभी कम्प्यूटर में कठिन कार्यों में लेखन को पहचानना सबसे कठिन हैं पर टेस्ट ट्यूब आर्टिफीसियल न्यूरल नेटवर्क से ये संभव हैं। अपने परीक्षण के 

चैत्र नवरात्र- वर्तमान समय में क्या करे?

March 24, 2020 0
चैत्र नवरात्र- वर्तमान समय में क्या करे?
सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुते॥

इस वर्ष चैत्र नवरात्र का प्रारम्भ चैत्र शुक्ल पक्ष प्रथमा से अर्थात 25 मार्च से प्रारंभ होकर 2 अप्रैल अर्थात रामनवमी को समाप्त हो रहा हैं। इसी शुभ समय में देश में ऋतु परिवर्तित होता हैं और सम्पूर्ण वातावरण एक आध्यात्मिक ऊर्जा से गुजरता हैं। शुभ मुहूर्त में नौ दिन देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती हैं जो सभी कष्टों का निवारण करती हैं और मंगल फल प्रदान करती हैं। 

देवी के नौ रूपों की अराधना 
वर्ष में प्रचलित दो नवरात्रों चैत्र और आश्विन में यह चैत्र नवरात्र उत्तर भारत में बड़ी श्रद्धा से मनाया जाता हैं। इन नौ दिनों कलश स्थापना कर देवी के नौ रूपों की पूजा-अर्चना की जाती हैं। प्रथम दिन- माँ शैलपुत्री, दूसरे दिन-माता ब्रह्राचारिणी, तीसरे दिन- माता चन्द्रघंटा, चौथे दिन- माँ कूष्माण्डा, पांचवे दिन- नाग पूजा और माँ स्कंदमाता, छठे दिन-देवी कात्यायनी, सातवें दिन- देवी कालरात्रि, अष्टमी को "दुर्गा अष्टमी" के रूप में भी मनाया जाता है और इसे "अन्नपूर्णा अष्टमी" भी कहा जाता है। इस दिन "महागौरी की पूजा" और "संधि पूजा" की जाती है। नवरात्रि उत्सव का अंतिम दिवस राम नवमी के रूप में मनाया जाता है और इस दिन माँ सिद्धिंदात्री की पूजा-अर्चना की जाती है।

वर्तमान समय में क्या करे?
इस समय देश भीषण आपदा से गुजर रहा हैं। फैली महामारी से लगभग सभी राज्यों में निषेधाज्ञा लागू हैं और सार्वजानिक रूप से लोगों के इकठ्ठे होने पर रोक लगा दी गई हैं। विषम परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए महत्वपूर्ण सभी मंदिरों में दर्शन पर रोक लगा दी गई हैं। तो इस स्थिति में देवी की पूजा कैसे करे?

घर पर अखंड दीप जलाये 
धार्मिक व आध्यात्मिक रूप से अग्नि को सबसे पवित्र माना गया हैं। हिन्दू धर्म में सभी शुभ कार्य अग्नि से ही पूर्ण होते हैं ऐसे में नवरात्र के शुभ अवसर पर अपने घरों में नौ दिन जलने वाला अखंड दीप जलाएं और देवी की उपासना के लिए दुर्गा सप्तसती का पाठ करे। 

प्राप्त सामग्री से देवी को भोग लगाए 
अगर किसी कारणवश कलश की स्थापना नहीं कर पा रहे हो तो इसे किसी अपशकुन के रूप में न ले। घर में प्राप्त सामग्री से ही देवी को भोग लगाए और आराधना करे। अपने स्वास्थ के अनुरूप व्रत का पालन करे और सभी के मंगल के लिए देवी से प्रार्थना करे। 

शिव भी गौरी में समाहित है 
जिस प्रकार हम शिव की आराधना हर विधान से कर सकते हैं उसी प्रकार शक्ति की पूजा भी हम निश्छल मन से हर रूप में कर सकते हैं। देवी को- माँ के रूप में देखकर, की गई हर प्रार्थना सम्पूर्ण रूप में पूरी होती हैं।  

दिहबे अरघिया घाट हम जाइके...

November 02, 2019 0
दिहबे अरघिया घाट हम जाइके...
भारतीय संस्कृति अपनी विविधता और सप्तरंगों के कारण प्राचीन काल से ही विश्व को आकर्षित करती रही है। आज भी इसने अपनी परम्पराओं को जीवित रखा है, जिनमें त्योहारों का विशेष महत्व है। ऐसा ही एक मनमोहक व्रत-त्योहार है छठ। जिसमें प्रकृति में सत्य के प्रतीक सूर्य की पूजा का विधान है।
यह पर्व भारतीय कैलेंडर के अनुसार कार्तिक शुक्ल षष्ठी अर्थात दीपावली से ठीक छठे दिन मनाया जाता है। छठ पर्व भगवान् भास्कर को समर्पित है, जिसमें व्रती स्वच्छता के कठिन नियमों का पालन करता हुआ सूर्य की उपासना करता है। सूर्य को समर्पित होने के कारण इसे सूर्य षष्ठी के रूप में भी माना जाता है। समान्यतः छठ पूजा का व्रत घर की महिलाएं ही करती हैं, पर यदा-कदा पुरुष व्रती भी मिल जाते हैं।

ऐतिहासिक परिचय 
छठ पूजा का इतिहास बहुत पुराना है, माना जाता है कि वैदिक युग से ही इसका प्रचलन भारत में रहा है। ऋग्वेद की अनेक ऋचाओं में भगवान् सूर्य को समर्पित श्लोक लिखे गए हैं और इसी सूर्य उपासना का एक रूप छठ पूजा है। माना जाता हैं कि महाभारत काल में द्रौपदी ने यह पूजा पाण्डवों के कुशल क्षेम के लिए की थी, जिससे उनके जीवन की कठिनाइयां कम हो और उन्हें अपना खोया राज्य पुनः प्राप्त हो सके। महाभारत में सूर्यपुत्र कर्ण को भी छठ पूजा करने का श्रेय दिया जाता है, जिसके बल और पौरुष ने युद्ध में पाण्डवों को शंकित कर दिया था। अनेक मान्यताओं में छठ पूजा का सबसे सही उल्लेख वैदिक युग के ऋग्वेद में किया गया है, जहाँ ऋषि-महात्मा अपने शरीर को भोजन से दूर रख कर निर्बाध रूप में सूर्य का प्रकाश ग्रहण करते थे।

अनुष्ठान पद्धति 
वैसे तो दीपावली के त्यौहार के ठीक बाद ही छठ पूजा का आरम्भ हो जाता है। व्रती घर की साफ-सफाई में लग जाता है और घर को सभी रीतियों से पवित्र करते हुए व्रती सूर्य को अर्पित करने वाले भोग के निर्माण में लग जाता हैं, पर मुख्यतः यह पर्व चार दिनों का होता हैं।

१- नहाई-खाई 
छठ के पहले दिन व्रती व्रत को ग्रहण करते हुए अपने घर को पूर्ण रूप में पवित्र करते हैं। इसके लिए व्रत का संकल्प लेते हुए सुबह नदी में स्नान करने से शुरुआत होती है और दिन भर में केवल एक बार ही भोजन ग्रहण किया जाता है। भोजन में भी विशेषता है कि चावल, चना दाल और लौकी बनाया जाता है। व्रती सिर्फ एक बार आहार ग्रहण करते हुए पर्व के प्रथम दिन का उपवास पूर्ण करता है। इस दिन चावल और लौकी का विशेष महत्व है, इसलिए इसे लौकी-भात भी कहते हैं।

२-खरना 
छठ के दूसरे दिन व्रती दिन भर उपवास रखता है और शाम को सूरज ढलने के बाद एक बार भोजन ग्रहण करता हैं। इस दिन खीर का विशेष महत्व होता है। व्रती शाम को भूमि पूजन करने के बाद रसाइओ खीर, सोहरी और केले का भोग भगवान् को अर्पित करता हैं और पूरा परिवार प्रसाद को ग्रहण करता है। इसी दिन से व्रती छठ के लिए 36 घण्टे के उपवास में प्रवेश करता है, जो बिना जल ग्रहण किए किया जाता है।

३-छठ संध्या अरग 
यह छठ का सबसे महत्वपूर्ण दिन होता है। शाम को इसमें व्रती अपने परिवार, सगे-संबंधियों, और पड़ोसियों के साथ एक गुट में गाते-बजाते निकट की नदी या तालाब में जाकर घुटने तक पानी में प्रवेश किए हुए डूबते सूर्य को अरग देता है। अरग और सूप इसके अभिन्न अंग हैं। व्रती उपवास के साथ सुबह से ही अरग में दिए जाने वाले भोग को तैयार करता है। खजुरी इसका मुख्य अंग है, जिसे इस विशेष अवसर पर तैयार किया जाता है। इसमें सूर्य को अरग में फल, फूल, अंकुरित अनाज, नारियल, मिठाई, गन्ना, खजुरी और सूप अर्पित किया जाता हैं। इस दिन रात के पूजा का विशेष महत्व होता है, जिसमें जलते दीपक को पांच गन्नों के बीच रख कर पूजा की जाती है। यह पांच गन्ने पंचतत्व को प्रदर्शित करते हैं। यह पूजा मुख्यतः उन घरों में बड़े धूम-धाम से होती हैं, जिसमें निकट ही कोई शादी या बच्चे का जन्म होता है।

४- छठ सूर्योदय/पारण/बिहनिया अरग 
यह छठ पूजा का अंतिम दिन होता है, जिसमें व्रती अपने सगे-संबंधियों के साथ सूर्य उदय से पूर्व ही नदी के पास पहुंच जाते हैं और छठ संध्या की रीती दोहराते हुए उगते सूर्य को अरग देते हैं। इसके साथ ही पर्व पूर्ण हो जाता हैं जान-पहचान वालों में प्रसाद वितरित किया जाता है और सामाजिक शिष्टाचार में मिलने-मिलाने की प्रथा पूर्ण की जाती है।

मूल रूप से यह पर्व बिहार, झारखण्ड और छत्तीसगढ़ में मनाया जाता हैं। छोटे रूप में उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के कुछ भागों में भी छठ का आयोजन होता है। वर्तमान में छठ पर्व लगभग सम्पूर्ण भारत में मनाया जाता है। साथ ही साथ अब इसे विदेशों में भी आंशिक रूप में मनाया जाने लगा हैं। छठ सामूहिक रूप में साथ रहने और जीवन प्रदान करने वाले सूर्य के प्रति अपने श्रद्धा प्रकट करने का त्यौहार है, जिसे भारत की प्रकृति पूजा का एक उदाहरण माना जाना चाहिए।

⬛सिद्धार्थ सिंह 

धान के खेतों में मुस्कुराती बरसात की बूंदे

August 19, 2019 0
धान के खेतों में मुस्कुराती बरसात की बूंदे
शहरों में धूल तो खूब देखी होगी, वो भी जब इंडिया रोज बन रहा है। बड़े शहर तो इस धूल को शान की बात समझते हैं। चमचमाती कार के शीशों से सड़क से गुजरते कुछ गिनती के बचे गरीबों को इसमें सने देखना एक अलग ही अनुभव है, इस नए इंडिया में। ये गरीब अलग नहीं हैं हम-आप जैसे लोग ही हैं, जिन्होंने शहरी जीवनयापन को अपना पेशा बनाया है। घर से दफ़्तर और दफ़्तर से घर, जीवन की छोटी-छोटी खुशियों के सपने देखते और मजबूत चट्टान सा दुश्वारियों को झेलते हुए से। इनके लिए क्या गर्मी, जाड़ा और क्या बरसात !

धूल को नजदीक से देखना या जीना हो, तो कभी भारत के गावों की ओर देखिए। तप्त धरा से जब लपलपाती आग की तरह गर्म हवाए धूल के अम्बार को लेकर आगे बढ़ती हैं, तो सच मानिए केवल किसान ही उनमें सृजन के बीज देख सकता है। खड़ी धूप, धूल और अनगिनत सपने मिलकर उसके चेहरे को हल्का काला रंग दे देती हैं, जिस पर पड़ी रेखाएं सुर्ख हो जाती हैं, जो आधुनिक क्रीम से सने चेहरों के सामने कत्तई सुन्दर नहीं दिखेंगे। किसी कवि ने लिखा होता तो बेशक जानिए वो लिखता ये श्रम का रंग है।

पहली बरसात के बाद जब हम बजबजाते नालों, वॉटर लॉगिंग और सीवर ओवरफ्लो जैसे कठिन शब्दों से जूझ रहे होते हैं, तब तक अन्नदाता खेतों की मेड़, जोताई और पानी के बहाव के लिए स्वयं ही नालियों का निर्माण कर चुका होता है। 'इंतजार' इसके जीवन का एक अद्भुत शब्द है, जिसे ये चाह कर भी नहीं छोड़ सकता। इसकी कहानी इसी एक शब्द के इर्द-गिर्द गुथी होती है।

बरसात अच्छी हुई नहीं कि छींटे बीजों से निकले धान के नन्हे-नन्हे पौधों को ये कीचड़ और पानी से लबालब खेतों में रोपना शुरू कर देता है। उत्सव सा माहौल होता है, पूरा परिवार मिलकर यानी बच्चे से बूढ़े तक अन्न सृजन में जुट जाते हैं। मजाल है प्रकृति प्रदत एक भी पौधा इस जल और कीचड़ से बने तालाब में इधर से उधर हो जाए।

सच मानिए, क्षितिज तक फैली इस हरी धरा में जब मेघ बरसते हैं, तो धान के खेतों में हर पौधे को सहलाती बूंदे किसान के चेहरे की कालिमा को सुनहला कर जाती हैं।

-सिद्धार्थ सिंह