Kashi Patrika

वाराणसी के जैन देवालय

April 29, 2021 0
वाराणसी के जैन देवालय

 सनातन काशी का कण-कण शंकर है। परमधाम काशी में धर्म चिरस्थाई और शाश्वत है। कभी यहाँ तथागत बुद्ध उपदेश देते है तो वही मध्यकाल में कबीर, तुलसी, रैदास की सामाजिक चेतना के रूप में धर्म आम जन के दैनिक क्रियाकलापों के रूप में रचा-बसा मिलता हैं। अनेकानेक साधु-संतो,मठों, आश्रम,गुरुकुल,धर्मप्रचारकों की एक लम्बी श्रृंखला है जो काशी को धर्मक्षेत्र के रूप में अग्रणी पंक्ति में रखती है। इन्हीं सबके बीच काशी में जिन परम्परा की भी एक लम्बी थाती है जिसमे जैन धर्म के 24 में से चार प्रमुख तीर्थंकर पार्श्‍वनाथ (तेइसवें), सुपार्श्‍वनाथ (सातवें), त्रेयांसनाथ (ग्‍यारहवें) व चंद्रप्रभुनाथ जी (आठवें) का जन्‍मस्‍थल धर्म नगरी काशी हैं। 

जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव और अंतिम महावीर स्वामी हुए। 24 तीर्थंकरों की इस लम्बी श्रृंखला में तेइसवें पार्श्‍वनाथ का जन्म काशी में हुआ; वर्तमान शोधों के आधार पर इन्हें ही जैन धर्म के स्थापना का श्रेय दिया जाता हैं। जैन धर्म मुख्य रूप से पाँच बातों पर विशेष बल देता है जो क्रमशः अहिंसा, अचौर्य(चोरी नहीं करना), असत्येय (झूठ नहीं बोलना), अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य हैं। 

जैन धर्म 
जैन शब्द संस्कृत के जिन शब्द से बना है, जिसका अर्थ विजेता ( जितेन्द्रिय ) होता है। जैन महात्माओं को निर्ग्रन्थ ( बंधन रहित ) व जैन धर्म के अधिष्ठाता को तीर्थंकर कहा गया। जैन धर्म में प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव या आदिनाथ थे। अरिष्टनेमि का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। 22वें तीर्थंकर अरिष्टनेमि को भी वासुदेव कृष्ण का भाई बताया गया है। जैन धर्मावलम्बियों  विश्वास है कि उनके सबसे महान धर्मोपदेष्टा महावीर थे इसके पहले तेईस और आचार्य हुए हैं, जो तीर्थंकर कहलाते थे।धर्म के प्राचीन सिद्धांतों के उपदेष्टा तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ माने जाते हैं, जो वाराणसी के निवासी थे। जैन अनुश्रुतियों के अनुसार पार्श्वनाथ को 100 वर्ष की आयु में सम्मेद पर्वत पर निर्वाण प्राप्त हुआ। पार्श्वनाथ द्वारा प्रतिपादित चार महाव्रत इस प्रकार हैं- सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह तथा अस्तेय। 

जैन धर्म के सिद्धांत 

जैन धर्म के पांच व्रत -
अहिंसा या हिंसा नहीं करना चाहिए 
सत्य या झूठ नहीं बोलना चाहिए 
अस्तेय या चोरी नहीं करना चाहिए 
अपरिग्रह या संपत्ति अर्जित नहीं करना  
ब्रह्मचर्य या इंद्रियों को वश में करना 

इन पांच व्रतों में ऊपर के चार पार्श्वनाथ ने दिए थे जबकि पांचवा व्रत ब्रह्मचर्य महावीर ने जोड़ा। जैन धर्म में अहिंसा युअ किसी प्राणी को नहीं सताने के व्रत को सबसे अधिक महत्व दिया गया है। जैन धर्म दो सम्प्रदाओं में विभक्त होगया श्वेताम्बर अर्थात सफ़ेद वस्त्र धारण करने वाले और दिगंबर अर्थात नग्न रहने वाले। जैन धर्म में देवताओं के अस्तित्व को स्वीकार किया गया है , परन्तु उनका स्थान जिन से नीचे रखा गया है। 


पार्श्वनाथ जैन मंदिर

यह मंदिर जैनियों के 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ को समर्पित है, इनका जन्म महावीर स्वामी के जन्म से 250 वर्ष पूर्व हुआ।  इनके पिता- अश्वसेन ( काशी के राजा ) माता- वामादेवी ( नरवर्मन की पुत्री ) थी। पत्नी- प्रभावती ( कुशस्थल की राजकुमारी ) पार्श्वनाथ 23वें तीर्थंकर थे तथा ऐतिहासिक माने जाते है। जैन ग्रंथों में पार्श्वनाथ को पुरुषादनीयं कहा गया है। इनके अनुयायियों को निर्ग्रन्थ कहा जाता था- जो शहर के मध्य क्षेत्र से दूर भेलूपुर में स्थित है। यह मंदिर अपने नाम के अनुरूप तीर्थंकर की जन्मस्थली का स्मरण कराता है। मंदिर में किया गया जाली का कार्य बहुत उत्कृष्ट व जटिल है। इसकी दीवारों पर भी नक्काशी इसका महत्व बढ़ाती है। इस मंदिर का प्रबंधन जैन धर्म के दिगाम्बर सम्प्रदाय द्वारा किया जाता है। पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र होने के साथ-साथ जैन समुदाय के लोगों के लिए यह तीर्थस्थल भी है। ऐसी मान्यता है कि यह भगवान आदिनाथ के समय में बनाया गया था। ऐसा भी कहा जाता है कि काशी के राजा की पुत्री सुलोचना का स्वयंवर यहीं पर आयोजित किया गया था। इस तीर्थ का उल्लेख विविध तीर्थ कल्प में भी मिलता है, जिसकी रचना आचार्य जी प्रभा सूरि स्वराजी ने 14वीं सदी में की थी।

श्रेयांशनाथ दिगम्बर जैन मंदिर, सारनाथ 

श्रेयांसनाथ ग्यारहवें तीर्थंकर हैं। श्रेयांसनाथ जी का जन्म फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया को श्रवण नक्षत्र में सिंहपुरी में हुआ था। प्रभु के माता पिता बनने का सौभाग्य इक्ष्वाकु वंश के राजा विष्णुराज व पत्नी विष्णु देवी को प्राप्त हुआ था। इनके शरीर का वर्ण सुवर्ण (सुनहरा) और चिह्न गेंडा था। भगवान श्रेयांसनाथ तीर्थंकर के जन्म एवं चार कल्याणकों के कारण यह प्राचीन काल से जैन तीर्थ रहा है। यहाँ उनके गर्भ, जन्म, दीक्षा और केवलज्ञान ये चार कल्याणक हुए थे। विद्वानों का मत है कि तीर्थंकर श्रेयाँसनाथ जी का जन्म स्थान होने के कारण ही इस स्थान का नाम ‘‘सारनाथ’ पड़ गया है। श्रेयांसनाथ जी शुरु से ही वैरागी थे। लेकिन माता-पिता की आज्ञानुसार उन्होंने गृहस्थ जीवन को भी अपनाया और राजसी दायित्व को भी निभाया। श्रेयांसनाथ जी के शासनकाल के दौरान राज्य में सुख समृद्धि का विस्तार हुआ। लेकिन जल्द ही उन्होंने अपने पुत्र को उत्तराधिकारी बना वैराग्य धारण कर लिया। जैन धर्मानुसार ऋतुओं का परिवर्तन देखकर भगवान को वैराग्य हुआ। ‘विमलप्रभा’ पालकी पर विराजमान होकर मनोहर नामक उद्यान में पहुँचे और फाल्गुन शुक्ल एकादशी के दिन हजार राजाओं के साथ दीक्षित हुए। दो माह तक प्रभु छ्दमस्थ साधक की भुमिका में रहे। माघ कृष्ण अमावस्या के दिन प्रभु केवली बने। श्रावण कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को प्रभु श्रेयांसनाथ ने सम्मेद शिखर पर निर्वाण किया।


मंदिर के गर्भगृह में तीर्थंकर श्रेयांसनाथ जी की ढाई फिट ऊँची श्याम वर्ण की मनोज्ञ प्रतिमा विराजमान है उसी वेदी में आगे एक छोटी श्वेतवर्ण की श्रेयांसनाथ की प्रतिमा है। भगवान की वेदी अत्यन्त कलापूर्ण है। मुख्यवेदी के बगल में नन्दीश्वर जिनालय का फलक है जिसमें ६० प्रतिमाएँ बनी हुई हैं यह भूगर्भ से प्राप्त हुई थीं। तीर्थंकर श्रेयांसनाथ जी का मंदिर अत्यन्त रमणीक स्थान पर स्थित है मंदिर के चारों तरफ एवं बाहर की हरियाली का दृश्य नयनाभिराम है। यहाँ ठहरने के लिए जैन धर्मशाला बनी हुई है पर अधिकतर यात्री वाराणसी में ही निवास करते हैं। 

सुपार्श्वनाथ जन्मस्थली, भदैनी 

जैन धर्म के सातवें तीर्थंकर भगवान श्री सुपार्श्वनाथ जी का जन्म वाराणसी के इक्ष्वाकुवंश में ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को विशाखा नक्षत्र में हुआ था। इनके माता का नाम पृथ्वी देवी और पिता का नाम राजा प्रतिष्ठ था। इनके शरीर का वर्ण सुवर्ण था और इनका चिह्न स्वस्तिक था। 

इनके यक्ष का नाम मातंग और यक्षिणी का नाम शांता देवी था। जैन धर्मावलम्बियों के मतानुसार भगवान श्री सुपार्श्वनाथ जी के कुल गणधरों की संख्या 95 थी, जिनमें विदर्भ स्वामी इनके प्रथम गणधर थे। ज्येष्ठ मास की त्रयोदशी तिथि को वाराणसी में ही इन्होंने दीक्षा प्राप्ति की और दीक्षा प्राप्ति के 2 दिन बाद इन्होंने खीर से प्रथम पारण किया। दीक्षा प्राप्ति के पश्चात् 9 महीने तक कठोर तप करने के बाद फाल्गुन कृष्ण पक्ष सप्तमी को धर्म नगरी वाराणसी में ही शिरीष वृक्ष के नीचे इन्हें कैवल्यज्ञान की प्राप्ति हुई थी।

भगवान श्री सुपार्श्वनाथ जी ने हमेशा सत्य का समर्थन किया और अपने अनुयायियों को अनर्थ हिंसा से बचने और न्याय के मूल्य को समझने का सन्देश दिया। फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की सप्तमी के दिन भगवान श्री सुपार्श्वनाथ ने सम्मेद शिखर पर निर्वाण को प्राप्त किया था।

चन्द्रप्रभ प्रभु जन्मस्थली, चंद्रपुरी 

चन्द्रप्रभ प्रभु आठवें तीर्थंकर के रूप में प्रसिद्ध है। चन्द्रप्रभ जी का जन्म पावन नगरी काशी जनपद के चन्द्रपुरी में पौष माह की कृष्ण पक्ष द्वादशी को अनुराधा नक्षत्र में हुआ था। इनके माता पिता बनने का सौभाग्य राजा महासेन और लक्ष्मणा देवी को मिला। इनके शरीर का वर्ण श्वेत (सफ़ेद) और चिह्न चन्द्रमा था।

चन्द्रप्रभ जी ने भी अन्य तीर्थंकरों की तरह तीर्थंकर होने से पहले राजा के दायित्व का निर्वाह किया। साम्राज्य का संचालन करते समय ही चन्द्रप्रभ जी का ध्यान अपने लक्ष्य यानि मोक्ष प्राप्त करने पर स्थिर रहा। पुत्र के योग्य होने पर उन्होंने राजपद का त्याग करके प्रवज्या का संकल्प किया।

एक वर्ष तक वर्षीदान देकर चन्द्रप्रभ जी ने पौष कृष्ण त्रयोदशी को प्रवज्या अन्गीकार की। तीन माह की छोटी सी अवधि में ही उन्होंने फ़ाल्गुन कृष्ण सप्तमी के दिन केवली ज्ञान को प्राप्त किया और धर्मतीर्थ की रचना कर तीर्थंकर पद उपाधि प्राप्त की। भाद्रपद कृष्णा सप्तमी को भगवान ने सम्मेद शिखर पर मोक्ष प्राप्त किया।

वर्तमान में सुन्दर जिनालय में श्वेत वर्ण के 45 सेमी पद्मासनस्थ श्री चन्द्रप्रभ स्वामी मूलनायक के रूप में विराजमान हैं। यह तीर्थ वाराणसी से लगभग 23 किमी की दूरी पर वाराणसी-गाजीपुर मार्ग पर स्थित हैं। तीर्थ का वर्णन तीर्थमाला में मिलता है और माना जाता है कि विक्रम के 14 सदी में इस तीर्थ का अस्तित्व था। 

February 13, 2021 0

हर ठौर गुजरी आहिस्ते से 

हस्ती-खिलखिलाती रुककर खींचती अंगड़ाइयाँ लेते 

'सिफ़र' कई और सफर है तुझी से रूबरू 

साथ ही रहना ऐ जिंदगी; हमसफ़र बनकर........ 

'मिर्ज़ापुर' बड़ा ही दिलचस्प जिला है; बनारस से लगभग 60 किमी दक्षिण-पश्चिम में माँ गंगा के किनारे बसा मुख्य शहर और बीहड़ पहाड़ियों में छोटे-बड़े बसे अनगिनत बस्तियों वाला। चट्टानों से अठखेलियाँ करते जूझते बनते-बिगड़ते अनगिनत बरसाती और सदानीरा पहाड़ी झड़ने, पथरीले वीराने में अटके दिन-रात, गांव, जंगल, जनावर, मंदिर-मस्जिद, आमिर-ग़रीब; बहुत कुछ वैसा ही जैसा दुनियां के किसी और कोने सा। बस एक बात है जो इसे औरो से अलग करता है वो है प्रकृति की गोद मे बैठा एकटक निहारता शाम का सख्त सन्नाटा जो सूरज के साथ ही ढलते बढ़ता जाता है, रात होते घुप्प अँधेरे में खो जाने को बोझिल बनते-बिगड़ते किसी भी जगह बनने वाले फ़रेबी सपनों में। यकीन मानिए इन कुछ दिलकश लम्हों को अगर करीब से जीना है तो यही आना होगा-भेड़चाल की कश्मक़श से ऊबकर। इन चंद लम्हों के सन्नाटे में वो सबकुछ है जिसे शायद कभी किसी शायर ने लिखा हो या जीवन की सघन समझ रखने वाले किसी कवि या दार्शनिक ने यूं ही झूमकर बतलाया हो।  

देसी बोल है 'मिर्ज़ापुरी बगल में छूरी' कुछ ऐसे ही लोग भी है स्याह जिंदगी की सच्चाई से रूबरू हुए, जानते है - अच्छाई भली थी जीने को जबतक धरती पर इंसान रहते थे अब तो हम है। वैसे तो यहाँ देखने, करने और जीने को बहुत कुछ है जैसे माँ विंध्यावासनी का दरबार, माँ गंगा का किनारा, पहाड़ी सुबह-शाम, गांव, जंगल, जानवर, प्रागैतिहासिक गुफाएँ, ऐतिहासिक किले, रजवाड़ों की हवेलियां, गांव, झड़ने, पास बसे फॉसिल और रेत में लिपटा मिनी गोआ। पर इस बार इस घुमक्कड़ से आपका साथ मिर्ज़ापुर मुख्य राजमार्ग को काटते हुए गुजरे सिरसी बांध और झड़ने का है। 

बात बीते साल की है, जब हमारे अभिन्न मित्र पहुंचे मिर्ज़ापुर दर्शन को तो हमलोगों ने झटपट प्लान बनाया सिरसी का। प्रकृति की गोद में बैठा एक मनोरम स्थल। दूर तक फैला डैम का पानी और झड़ने से निर्बाह बहता जलरूपी अथाह प्रेम और जीवन।  सड़क पर दौड़ती मोटरबाईक और दिल में कौतुहल लिए, हम सभी पहुंच गए सिरसी। मिर्ज़ापुर शहर से रास्ता करीब 2.5 घण्टे का है राबर्ट्सगंज-सोनभद्र मुख्य राजमार्ग से रास्ता मड़िहान से पहले कटता है जो पथरीले गांव और पहाड़ी इलाकों से होता सीधे सिरसी पहुँचता है। सिरसी डैम एक वृहद् भूमिका है जिससे आभास होता है किसी बड़े झील का, मोहक पहाड़ियों से घिरा, जिसके एक छोर का पता ही नहीं लगता। डैम का पानी मुख्य रूप से कृषि कार्य की सिंचाई में प्रयोग होता है और साल भर बना रहता है। डैम को पार कर रास्ता सिरसी फॉल को पहुंच जाता है। पथरीली संरचना है जहां एक ओर तो पानी डैम को जाता है और दूसरी ओर प्रवाह अवरुद्ध है। आप झड़ने के हर ढलान को ऊपर से घूम कर देख सकते है और नीचे उतरकर बनी छोटी झील का भी आनंद ले सकते है। जगह बिलकुल ही बियाबान है और खासकर गर्मियों के मौसम में तो यहाँ विरले ही कोई आता होगा जब चट्टानें तप्त सूर्य सा जलती है। 

ट्रैकिंग और एडवेंचर से भरा दिन खूब बीता। शाम को वहीं पर भोजन और धुंधलके में बाईक की रौशनी में हम पथरीले रास्तों से गुजरते वापस लौटे। सिरसी की बियाबान पहाड़ियों में बैठकर ढ़लते सूरज को देखना एक नैसर्गिक अनुभव है। 

वर्तमान में राज्य सरकार सैलानियों के बोटिंग, एडवेंचर स्पोर्ट्स और विभिन्न पर्यटन सम्बंधी क्रियाकलापों के लिए डैम को प्रयोग में लाने के प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार कर रही है। रोपवे और स्काईवे भी इन्हीं कुछेक भविष्य के प्रयास होंगे। 

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March 24, 2020 0
नासा का पारकर प्रोब सूर्य के राज खोलने को तैयार

अगले महीने 4 अगस्त को नासा अपने प्रोब पारकर को लॉंच करेगा। ये सूर्य की कोरोना और इसके हीट वैव के कारणों का पता लगाएगा। ये अपनी तरह का पहला मिशन होगा जिसमे कोई मानव निर्मित सेटेलाईट सूर्य के इतने नजदीक जाकर हमें उसके बारे में जानकारी देगा। कुछ समय तक पहले ये संभव नहीं था क्योकि सूर्य का तापमान बहुत अधिक हैं। पर नई खोजों ने इस मिशन को कामयाब बनाया हैं।
इस प्रोब में एक ख़ास तरीके का कार्बन शील्ड लगा हैं जो इसे सूर्य की अत्यधिक गर्मी से बचाएगा। इस मिशन की ख़ास बात ये हैं कि सिर्फ तीन महीने के भीतर ही दिसंबर से सूर्य के पास पहुंचकर हमें उसकी तस्वीरें और जानकारी भेजने लगेगा।

टेस्ट ट्यूब आर्टिफीसियल न्यूरल नेटवर्क मॉलिक्युलर लिखाई को पहचानने में सक्षम बना 
हाल ही में वैज्ञानिकों ने टेस्ट ट्यूब आर्टिफीसियल न्यूरल नेटवर्क का निर्माण DNA से किया हैं। इस नए प्रयोग में परिणाम क्रन्तिकारी हो सकते हैं। ये भविष्य में बनने वाली सभी वस्तुओं की मॉलिक्यूल से बनने की सम्भावना को दर्शाता हैं जिससे सभी  निर्मित वस्तुए पर्यावरण की प्रति ज्यादा संवेदनशील बनेंगी। पुराने सभी कम्प्यूटर में कठिन कार्यों में लेखन को पहचानना सबसे कठिन हैं पर टेस्ट ट्यूब आर्टिफीसियल न्यूरल नेटवर्क से ये संभव हैं। अपने परीक्षण के 

चैत्र नवरात्र- वर्तमान समय में क्या करे?

March 24, 2020 0
चैत्र नवरात्र- वर्तमान समय में क्या करे?
सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुते॥

इस वर्ष चैत्र नवरात्र का प्रारम्भ चैत्र शुक्ल पक्ष प्रथमा से अर्थात 25 मार्च से प्रारंभ होकर 2 अप्रैल अर्थात रामनवमी को समाप्त हो रहा हैं। इसी शुभ समय में देश में ऋतु परिवर्तित होता हैं और सम्पूर्ण वातावरण एक आध्यात्मिक ऊर्जा से गुजरता हैं। शुभ मुहूर्त में नौ दिन देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती हैं जो सभी कष्टों का निवारण करती हैं और मंगल फल प्रदान करती हैं। 

देवी के नौ रूपों की अराधना 
वर्ष में प्रचलित दो नवरात्रों चैत्र और आश्विन में यह चैत्र नवरात्र उत्तर भारत में बड़ी श्रद्धा से मनाया जाता हैं। इन नौ दिनों कलश स्थापना कर देवी के नौ रूपों की पूजा-अर्चना की जाती हैं। प्रथम दिन- माँ शैलपुत्री, दूसरे दिन-माता ब्रह्राचारिणी, तीसरे दिन- माता चन्द्रघंटा, चौथे दिन- माँ कूष्माण्डा, पांचवे दिन- नाग पूजा और माँ स्कंदमाता, छठे दिन-देवी कात्यायनी, सातवें दिन- देवी कालरात्रि, अष्टमी को "दुर्गा अष्टमी" के रूप में भी मनाया जाता है और इसे "अन्नपूर्णा अष्टमी" भी कहा जाता है। इस दिन "महागौरी की पूजा" और "संधि पूजा" की जाती है। नवरात्रि उत्सव का अंतिम दिवस राम नवमी के रूप में मनाया जाता है और इस दिन माँ सिद्धिंदात्री की पूजा-अर्चना की जाती है।

वर्तमान समय में क्या करे?
इस समय देश भीषण आपदा से गुजर रहा हैं। फैली महामारी से लगभग सभी राज्यों में निषेधाज्ञा लागू हैं और सार्वजानिक रूप से लोगों के इकठ्ठे होने पर रोक लगा दी गई हैं। विषम परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए महत्वपूर्ण सभी मंदिरों में दर्शन पर रोक लगा दी गई हैं। तो इस स्थिति में देवी की पूजा कैसे करे?

घर पर अखंड दीप जलाये 
धार्मिक व आध्यात्मिक रूप से अग्नि को सबसे पवित्र माना गया हैं। हिन्दू धर्म में सभी शुभ कार्य अग्नि से ही पूर्ण होते हैं ऐसे में नवरात्र के शुभ अवसर पर अपने घरों में नौ दिन जलने वाला अखंड दीप जलाएं और देवी की उपासना के लिए दुर्गा सप्तसती का पाठ करे। 

प्राप्त सामग्री से देवी को भोग लगाए 
अगर किसी कारणवश कलश की स्थापना नहीं कर पा रहे हो तो इसे किसी अपशकुन के रूप में न ले। घर में प्राप्त सामग्री से ही देवी को भोग लगाए और आराधना करे। अपने स्वास्थ के अनुरूप व्रत का पालन करे और सभी के मंगल के लिए देवी से प्रार्थना करे। 

शिव भी गौरी में समाहित है 
जिस प्रकार हम शिव की आराधना हर विधान से कर सकते हैं उसी प्रकार शक्ति की पूजा भी हम निश्छल मन से हर रूप में कर सकते हैं। देवी को- माँ के रूप में देखकर, की गई हर प्रार्थना सम्पूर्ण रूप में पूरी होती हैं।  

दिहबे अरघिया घाट हम जाइके...

November 02, 2019 0
दिहबे अरघिया घाट हम जाइके...
भारतीय संस्कृति अपनी विविधता और सप्तरंगों के कारण प्राचीन काल से ही विश्व को आकर्षित करती रही है। आज भी इसने अपनी परम्पराओं को जीवित रखा है, जिनमें त्योहारों का विशेष महत्व है। ऐसा ही एक मनमोहक व्रत-त्योहार है छठ। जिसमें प्रकृति में सत्य के प्रतीक सूर्य की पूजा का विधान है।
यह पर्व भारतीय कैलेंडर के अनुसार कार्तिक शुक्ल षष्ठी अर्थात दीपावली से ठीक छठे दिन मनाया जाता है। छठ पर्व भगवान् भास्कर को समर्पित है, जिसमें व्रती स्वच्छता के कठिन नियमों का पालन करता हुआ सूर्य की उपासना करता है। सूर्य को समर्पित होने के कारण इसे सूर्य षष्ठी के रूप में भी माना जाता है। समान्यतः छठ पूजा का व्रत घर की महिलाएं ही करती हैं, पर यदा-कदा पुरुष व्रती भी मिल जाते हैं।

ऐतिहासिक परिचय 
छठ पूजा का इतिहास बहुत पुराना है, माना जाता है कि वैदिक युग से ही इसका प्रचलन भारत में रहा है। ऋग्वेद की अनेक ऋचाओं में भगवान् सूर्य को समर्पित श्लोक लिखे गए हैं और इसी सूर्य उपासना का एक रूप छठ पूजा है। माना जाता हैं कि महाभारत काल में द्रौपदी ने यह पूजा पाण्डवों के कुशल क्षेम के लिए की थी, जिससे उनके जीवन की कठिनाइयां कम हो और उन्हें अपना खोया राज्य पुनः प्राप्त हो सके। महाभारत में सूर्यपुत्र कर्ण को भी छठ पूजा करने का श्रेय दिया जाता है, जिसके बल और पौरुष ने युद्ध में पाण्डवों को शंकित कर दिया था। अनेक मान्यताओं में छठ पूजा का सबसे सही उल्लेख वैदिक युग के ऋग्वेद में किया गया है, जहाँ ऋषि-महात्मा अपने शरीर को भोजन से दूर रख कर निर्बाध रूप में सूर्य का प्रकाश ग्रहण करते थे।

अनुष्ठान पद्धति 
वैसे तो दीपावली के त्यौहार के ठीक बाद ही छठ पूजा का आरम्भ हो जाता है। व्रती घर की साफ-सफाई में लग जाता है और घर को सभी रीतियों से पवित्र करते हुए व्रती सूर्य को अर्पित करने वाले भोग के निर्माण में लग जाता हैं, पर मुख्यतः यह पर्व चार दिनों का होता हैं।

१- नहाई-खाई 
छठ के पहले दिन व्रती व्रत को ग्रहण करते हुए अपने घर को पूर्ण रूप में पवित्र करते हैं। इसके लिए व्रत का संकल्प लेते हुए सुबह नदी में स्नान करने से शुरुआत होती है और दिन भर में केवल एक बार ही भोजन ग्रहण किया जाता है। भोजन में भी विशेषता है कि चावल, चना दाल और लौकी बनाया जाता है। व्रती सिर्फ एक बार आहार ग्रहण करते हुए पर्व के प्रथम दिन का उपवास पूर्ण करता है। इस दिन चावल और लौकी का विशेष महत्व है, इसलिए इसे लौकी-भात भी कहते हैं।

२-खरना 
छठ के दूसरे दिन व्रती दिन भर उपवास रखता है और शाम को सूरज ढलने के बाद एक बार भोजन ग्रहण करता हैं। इस दिन खीर का विशेष महत्व होता है। व्रती शाम को भूमि पूजन करने के बाद रसाइओ खीर, सोहरी और केले का भोग भगवान् को अर्पित करता हैं और पूरा परिवार प्रसाद को ग्रहण करता है। इसी दिन से व्रती छठ के लिए 36 घण्टे के उपवास में प्रवेश करता है, जो बिना जल ग्रहण किए किया जाता है।

३-छठ संध्या अरग 
यह छठ का सबसे महत्वपूर्ण दिन होता है। शाम को इसमें व्रती अपने परिवार, सगे-संबंधियों, और पड़ोसियों के साथ एक गुट में गाते-बजाते निकट की नदी या तालाब में जाकर घुटने तक पानी में प्रवेश किए हुए डूबते सूर्य को अरग देता है। अरग और सूप इसके अभिन्न अंग हैं। व्रती उपवास के साथ सुबह से ही अरग में दिए जाने वाले भोग को तैयार करता है। खजुरी इसका मुख्य अंग है, जिसे इस विशेष अवसर पर तैयार किया जाता है। इसमें सूर्य को अरग में फल, फूल, अंकुरित अनाज, नारियल, मिठाई, गन्ना, खजुरी और सूप अर्पित किया जाता हैं। इस दिन रात के पूजा का विशेष महत्व होता है, जिसमें जलते दीपक को पांच गन्नों के बीच रख कर पूजा की जाती है। यह पांच गन्ने पंचतत्व को प्रदर्शित करते हैं। यह पूजा मुख्यतः उन घरों में बड़े धूम-धाम से होती हैं, जिसमें निकट ही कोई शादी या बच्चे का जन्म होता है।

४- छठ सूर्योदय/पारण/बिहनिया अरग 
यह छठ पूजा का अंतिम दिन होता है, जिसमें व्रती अपने सगे-संबंधियों के साथ सूर्य उदय से पूर्व ही नदी के पास पहुंच जाते हैं और छठ संध्या की रीती दोहराते हुए उगते सूर्य को अरग देते हैं। इसके साथ ही पर्व पूर्ण हो जाता हैं जान-पहचान वालों में प्रसाद वितरित किया जाता है और सामाजिक शिष्टाचार में मिलने-मिलाने की प्रथा पूर्ण की जाती है।

मूल रूप से यह पर्व बिहार, झारखण्ड और छत्तीसगढ़ में मनाया जाता हैं। छोटे रूप में उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के कुछ भागों में भी छठ का आयोजन होता है। वर्तमान में छठ पर्व लगभग सम्पूर्ण भारत में मनाया जाता है। साथ ही साथ अब इसे विदेशों में भी आंशिक रूप में मनाया जाने लगा हैं। छठ सामूहिक रूप में साथ रहने और जीवन प्रदान करने वाले सूर्य के प्रति अपने श्रद्धा प्रकट करने का त्यौहार है, जिसे भारत की प्रकृति पूजा का एक उदाहरण माना जाना चाहिए।

⬛सिद्धार्थ सिंह 

धान के खेतों में मुस्कुराती बरसात की बूंदे

August 19, 2019 0
धान के खेतों में मुस्कुराती बरसात की बूंदे
शहरों में धूल तो खूब देखी होगी, वो भी जब इंडिया रोज बन रहा है। बड़े शहर तो इस धूल को शान की बात समझते हैं। चमचमाती कार के शीशों से सड़क से गुजरते कुछ गिनती के बचे गरीबों को इसमें सने देखना एक अलग ही अनुभव है, इस नए इंडिया में। ये गरीब अलग नहीं हैं हम-आप जैसे लोग ही हैं, जिन्होंने शहरी जीवनयापन को अपना पेशा बनाया है। घर से दफ़्तर और दफ़्तर से घर, जीवन की छोटी-छोटी खुशियों के सपने देखते और मजबूत चट्टान सा दुश्वारियों को झेलते हुए से। इनके लिए क्या गर्मी, जाड़ा और क्या बरसात !

धूल को नजदीक से देखना या जीना हो, तो कभी भारत के गावों की ओर देखिए। तप्त धरा से जब लपलपाती आग की तरह गर्म हवाए धूल के अम्बार को लेकर आगे बढ़ती हैं, तो सच मानिए केवल किसान ही उनमें सृजन के बीज देख सकता है। खड़ी धूप, धूल और अनगिनत सपने मिलकर उसके चेहरे को हल्का काला रंग दे देती हैं, जिस पर पड़ी रेखाएं सुर्ख हो जाती हैं, जो आधुनिक क्रीम से सने चेहरों के सामने कत्तई सुन्दर नहीं दिखेंगे। किसी कवि ने लिखा होता तो बेशक जानिए वो लिखता ये श्रम का रंग है।

पहली बरसात के बाद जब हम बजबजाते नालों, वॉटर लॉगिंग और सीवर ओवरफ्लो जैसे कठिन शब्दों से जूझ रहे होते हैं, तब तक अन्नदाता खेतों की मेड़, जोताई और पानी के बहाव के लिए स्वयं ही नालियों का निर्माण कर चुका होता है। 'इंतजार' इसके जीवन का एक अद्भुत शब्द है, जिसे ये चाह कर भी नहीं छोड़ सकता। इसकी कहानी इसी एक शब्द के इर्द-गिर्द गुथी होती है।

बरसात अच्छी हुई नहीं कि छींटे बीजों से निकले धान के नन्हे-नन्हे पौधों को ये कीचड़ और पानी से लबालब खेतों में रोपना शुरू कर देता है। उत्सव सा माहौल होता है, पूरा परिवार मिलकर यानी बच्चे से बूढ़े तक अन्न सृजन में जुट जाते हैं। मजाल है प्रकृति प्रदत एक भी पौधा इस जल और कीचड़ से बने तालाब में इधर से उधर हो जाए।

सच मानिए, क्षितिज तक फैली इस हरी धरा में जब मेघ बरसते हैं, तो धान के खेतों में हर पौधे को सहलाती बूंदे किसान के चेहरे की कालिमा को सुनहला कर जाती हैं।

-सिद्धार्थ सिंह 

काशी सत्संग: संगत की रंगत

January 05, 2019 0
काशी सत्संग: संगत की रंगत
एक भंवरे की मित्रता एक गोबरी (गोबर में रहने वाले) कीड़े से थी! एक दिन कीड़े ने भंवरे से कहा- भाई तुम मेरे सबसे अच्छे मित्र हो, इसलिए मेरे यहां भोजन पर आओ।
भंवरा भोजन करने पहुंचा। बाद में भंवरा सोच में पड़ गया कि मैंने बुरे का संग किया इसलिए मुझे गोबर खाना पड़ा! अब भंवरे ने कीड़े को अपने यहां आने का निमंत्रण दिया कि तुम कल मेरे यहां आओ।
अगले दिन कीड़ा भंवरे के यहां पहुंचा। भंवरे ने कीड़े को उठा कर गुलाब के फूल में बिठा दिया। कीड़े ने परागरस पीने का आनंद लिया। वह मित्र का धन्यवाद कर ही रहा था कि पास के मंदिर का पुजारी आया और फूल तोड़ कर ले गया और बिहारी जी के चरणों में चढा दिया! कीड़े को ठाकुरजी के दर्शन हुए। उनके चरणों में बैठने का सौभाग्य भी मिला। संध्या में पुजारी ने सारे फूल एकत्र किए और गंगाजी में प्रवाहित कर दिए। कीड़ा अपने भाग्य पर हैरान था! इतने में भंवरा उड़ता हुआ कीड़े के पास आया, पूछा-मित्र! क्या हाल है? कीड़े ने कहा-भाई! जन्म-जन्म के पापों से मुक्ति हो गई! ये सब अच्छी संगत का फल है-
संगत से गुण ऊपजे, संगत से गुण जाए,
लोहा लगा जहाज में, पानी में उतराय!

मित्रों, कोई भी नहीं जानता कि हम इस जीवन के सफर में एक-दूसरे से क्यों मिलते हैं! सब के साथ रक्त संबंध नहीं हो सकते, परंतु ईश्वर हमें कुछ लोगों के साथ मिलाकर अद्भुत रिश्तों में बांध देता है। हमें उन रिश्तों को हमेशा संजोकर रखना चाहिए।
ऊं तत्सत…

काशी सत्संग: परहित का लाभ

January 03, 2019 0
काशी सत्संग: परहित का लाभ

विजयनगर के प्रजावत्सल सम्राट थे कृष्णदेव राय। वे अपनी प्रजा के सुख-दुःख देखने के लिए अक्सर राज्य में भ्रमण करने के लिए जाते थे। एक बार इसी हेतु वे अपने बुद्धिमान मंत्री तेनालीराम तथा कुछ सिपाहियों के साथ निकले। एक-एक गांव देखते-देखते दूर निकल गए। शाम हो गई सभी थक गए। नदी किनारे उचित जगह देखकर महाराज ने कहा-तेनालीराम! यहीं पड़ाव डाल दो। विश्राम के लिए तम्बू लग गए। सभी भूख-प्यास से बेहाल थे। आसपास नजर दौड़ाने पर महाराज को थोड़ी दूर मटर की फलियों से लदा खेत दिखा।
महाराज ने कुछ सिपाहियों को बुलाकर कहा- जाओ सामने के खेत में से फलियां तोड़कर हम दोनों के लिए लाओ और तुम भी खाओ। सिपाही जैसे ही जाने के लिए पीछे मुड़े, तो तेनालीराम ने कहा- महाराज! इस खेत का मालिक तो वह किसान है, जिसने इस खेत में फसल लगाई और इसे अपने पसीने से सींचा है। आप इस राज्य के राजा अवश्य हैं, पर इस खेत के मालिक नहीं। बिना उसकी आज्ञा के इस खेत की एक भी फली तोड़ना अपराध है। राजधर्म के विरुद्ध आचरण है, जो एक राजा को कदापि शोभा नहीं देता।
महाराज को तेनालीराम की बात उचित लगी, सिपाहियों को आदेश दिया, ‘‘जाओ, इस खेत के मालिक से फलियां तोड़ने की अनुमति लेकर आओ।” सिपाहियों को खेत में देख खेत का मालिक घबरा गया।
सिपाहियों ने कहा- महाराज स्वयं तुम्हारे खेत के नजदीक विश्राम कर रहे हैं और अपनी भूख मिटाने के लिए खेत से थोडी-सी फलियां तोड़ने की अनुमति चाहते हैं।
यह सुन उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा! प्रसन्नता और राजा के प्रति अहोभाव से उसका हृदय भर गया। वह दौड़ा-दौड़ा महाराज के पास पहुंचा। राजा को प्रणाम किया और कहा- महाराज! यह राज्य आपका, यह खेत आपका। आप प्रजापालक हैं, मैं आपकी प्रजा हूं। मुझसे अनुमति लेने की आपको कोई आवश्यकता नहीं थी, फिर भी आपने एक गरीब किसान के अधिकार को इतना महत्त्व दिया! आप धन्य हैं!
किसान खुद सिपाहियों के साथ खेत में गया और फलियां तोड़कर महाराज के सामने प्रस्तुत कीं, फिर आज्ञा लेकर गांव गया। थोड़ी देर बाद वह वापस आया। उसके साथ गांव के कुछ लोग और भी थे, जो अपने साथ सभी के लिए तरह- तरह की भोजन-सामग्री लेकर आए थे। इतना अपनापन, प्रेम व सम्मान पाकर महाराज बड़े प्रसन्न हुए।
मित्रों, जब हम अपने अहं को न पोसकर दूसरों के अधिकारों का ख्याल रखते हैं, तो लोग भी हमारा ख्याल रखते हैं। उनके दिल में हमारे लिए आदर और प्यार बढ़ जाता है और वास्तविक आदरणीय, सर्वोपरि, सर्वेश्वर परमात्मा भी भीतर से प्रसन्न होते हैं।
ऊं तत्सत...

काशी सत्संग: ...का करि सकत कुसंग

January 02, 2019 0
काशी सत्संग: ...का करि सकत कुसंग
एक बार की बात है। एक शराबी अपनी शराब पीने की आदत से बहुत परेशान था। एक दिन वह एक महात्मा के पास गया और बोला- मैं शराब पीने की अपनी आदत से बहुत दुखी हूं। इसके कारण मेरा घर बर्बाद हो गया है। मेरे बच्चे भूख से मर रहे हैं। मेरे घर की शांति नष्ट हो गई है। आप ही बताइए। अब मैं क्या करूं?
महात्मा ने कहा- अगर तुम्हें शराब से इतनी परेशानी है। तुम इसे छोड़ क्यों नहीं देते? उस आदमी ने कहा- मैं शराब को छोड़ना चाहता हूं, लेकिन ये मुझे नहीं छोड़ रही है। महात्मा ने मुस्कुराते हुए कहा- ठीक है। तुम कल आना। मैं तुम्हें शराब को छोड़ने का तरीका बता दूंगा।
अगले दिन वह आदमी फिर से उस महात्मा के पास पहुंचा। उस आदमी को देखते ही महात्मा खड़े हुए और पास के ही एक पेड़ से चिपक गए। वह आदमी चुपचाप खड़े होकर उस महात्मा को देखता रहा। जब काफी समय बीत गया, तो उस आदमी ने महात्मा से कहा- अपने इस पेड़ को क्यों पकड़ रखा है? महात्मा ने कहा- मैंने इस पेड़ को नहीं पकड़ रखा है, बल्कि इस पेड़ ने मुझे ही पकड़ रखा है।
उस आदमी ने आश्चर्य के साथ उस महात्मा से कहा- मैं शराबी हूं, मुर्ख नहीं। इस पेड़ ने आपको नहीं पकड़ रखा है, बल्कि आपने ही पेड़ को पकड़ रखा है। आप जब चाहे इसे छोड़ सकते हैं। यह सुनते ही उस महात्मा ने पेड़ को छोड़ दिया।
उस महात्मा ने कहा- जिस तरह मुझे पेड़ ने नहीं पकड़ा था, ठीक उसी तरह शराब ने तुम्हें नहीं पकड़ रखा है, बल्कि तुमने ही शराब को पकड़ रखा है। तुम जब चाहो इसे छोड़ सकते हो। रहीम ने भी कहा है-
जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग,
चंदन विष व्याप्त नहीं, लपटे रहत भुजंग।
ऊं तत्सत...

काशी सत्संग: गौरैया का नववर्ष

January 01, 2019 0
काशी सत्संग: गौरैया का नववर्ष

सूरज की किरणें अभी ठीक से पंकज वन में आई भी नहीं थीं कि चारों ओर जश्न का माहौल-सा छा गया। सबसे पहले तो कलियां खिलखिलाकर खिल उठीं और फिर उन पर भौरों का झुंड मंडराने लगा।
कौए ने घोंसले से सिर निकालकर देखा। गौरेया सवेरे-सवेरे उड़ती हुई कहीं जा रही थी।
कौए ने आवाज लगाई, 'बहन, सारे लोग नए वर्ष का स्वागत कर रहे हैं, तुम कहां जा रही हो? नए वर्ष की शुभकामनाएं तो लेती जाओ।'
'तुम्हें भी नववर्ष की ढेर सारी शुभकामनाएं, भैया। मैं भी नए वर्ष का ही स्वागत करने जा रही हूं।' गौरेया ने कहा।
रास्ते में चूहों का झुंड नए वर्ष को सेलिब्रेट कर रहा था। सभी चूहे मधुर संगीत पर कमर मटकाकर नाच रहे थे। गौरेया को तेजी से उड़ते हुए देख वे भी बोल पड़े, 'गौरेया बहन, सवेरे-सवेरे कहां जा रही हो? आओ, हमारे साथ नए वर्ष का जश्न मनाओ।'
'नहीं, आप लोगों के साथ मैं नहीं आ सकती, लेकिन मैं भी नए वर्ष की शुरुआत ही करने जा रही हूं।' गौरेया बोली और उड़ चली।
कुछ ही दूरी पर भालुओं का झुंड भी नए वर्ष की खुशी में उछल-कूद कर रहा था। गौरेया को देखकर एक भालू चिल्लाया, 'गौरेया, ओ गौरेया, क्या आज भी दाना चुगने की चिंता में उड़ी जा रही हो। क्या तुम्हें याद नहीं आज नया वर्ष है?'
'याद है, भाई, याद है। मैं भी नए वर्ष की खुशी मनाने दूसरी जगह जा रही हूं।' गौरेया बोलती हुई उड़ती रही।
शेर की गुफा के पास ढेर सारे जानवर नए वर्ष की धूमधाम से शुरुआत कर रहे थे। वहां कई तरह की मिठाइयां भी बन रही थीं। नाचने-गाने का इंतजाम भी था। बाजे-गाजे के साथ सभी झूम-झूमकर जश्न मना रहे थे।
गौरेया को देख शेर ने आवाज लगाई, 'अरी गौरेया, सवेरे-सवेरे कहां जा रही हो? आओ यहां। हम सब नए वर्ष की शुरुआत अच्छे से करने के लिए इकट्ठा हुए हैं। तुम भी आओ।'
'माफ कीजिए। मैं अपने नए वर्ष की शुरुआत किसी और चीज से करना चाहती हूं। आप सबको नए वर्ष की शुभकामनाएं।' कहती हुई गौरेया उड़ गई।
'क्यों न हम चलकर देख लें, गौरेया क्या कर रही है?' बंदर ने राय दी और सब गौरेया के रास्ते चल पड़े।
'अरे, यह क्या? यह गौरेया तो बड़ा अच्छा काम कर रही है। इस नन्ही चिड़िया की सोच तो देखो, कितनी अच्छी है।' तारीफ करते हुए शेर का चेहरा खिल उठा।
सामने मैदान में गौरेया ढेर सारी चींटियों के झुंड को संबोधित कर रही थी, 'बहनों, तुम में से कई चींटियां गरीबी के कारण पढ़ाई नहीं कर पातीं और स्कूल जाना बंद कर देती हैं। नए वर्ष पर मैंने संकल्प लिया है कि कुछ गरीब चींटियों की पढ़ाई के लिए मदद करूंगी। साथ ही अन्य चिड़ियों और जानवरों को भी प्रेरित करूंगी कि वे तुम्हारी आर्थिक मदद करें।'
यह सुनकर मैदान तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। कई चींटियों की आंखों से खुशी के आंसू टपकने लगे।
आहट पाकर गौरेया जब मुड़ी, तो सब जानवरों को अपने पीछे आंखें फाड़े देखता पाया।
'मैं कुछ गरीब चींटियों का भविष्य संवारकर नए वर्ष की शुरुआत करना चाहती थी, सो मैंने सवेरे से पहले यही काम किया। मैंने सोचा नए वर्ष की इससे अच्छी शुरुआत भला और क्या हो सकती है? गौरेया ने सफाई दी।
'नन्ही-सी चिड़िया और सोच कितनी बड़ी है। इससे हमें भी कुछ सीखना चाहिए। कुछ क्या, हमें भी हंसने-गाने, बाजा बजाने, पकवान-मिठाई खाने से पहले किसी असहाय, लाचार, गरीब की मदद करने का काम जरूर करना चाहिए। अभी भी वक्त गुजरा नहीं है। चलो, आओ, सबके सब किसी मजबूर का भविष्य संवारने के लिए जुट जाओ। इस तरह हमारी भी नए वर्ष की शुरुआत अच्छी रहेगी।' शेर ने सभी की ओर मुखातिब होकर कहा। सभी गौरेया की ओर खुशी से देख रहे थे।
ऊं तत्सत...

प्रज्ञा विस्तार

January 01, 2019 0
प्रज्ञा विस्तार

काशी सत्संग: पर उपदेश कुशल बहुतेरे

December 31, 2018 0
काशी सत्संग: पर उपदेश कुशल बहुतेरे

एक पंडितजी महाराज क्रोध न करने पर उपदेश दे रहे थे। कह रहे थे- ‛क्रोध आदमी का सबसे बड़ा दुश्मन है। उससे आदमी की बुद्धि नष्ट हो जाती है। क्रोध से आदमी में बुद्धि नहीं रहती, वह पशु बन जाता है। लोग बड़ी श्रद्धा से उनका उपदेश सुन रहे थे पंडितजी ने आगे कहा- क्रोध चाण्डाल होता है। उससे हमेशा बचकर रहो।
भीड़ में एक ओर एक व्यक्ति बैठा था। जिसे पंडितजी ने प्राय: सड़क पर झाड़ू लगाते देखा था। अपना उपदेश समाप्त करके जब पंडितजी जाने लगे, तब वह व्यक्ति भी हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। लोगों की भक्ति-भावना से फूले हुए पंडितजी भीड़ के बीच में से आगे आ रहे थे। इतने में पीछे से भीड़ का रेला आया और वे गिरते-गिरते बचे! धक्के में वे सफाई वाले से छू गए। फिर क्या था! उनका पारा चढ़ गया, बोले-“दुष्ट! तू यहां कहां से आ मरा? मैं भोजन करने जा रहा था। तूने छूकर मुझे गंदा कर दिया। अब मुझे स्नान करना पड़ेगा।” उन्होंने जी भरकर कोसा। असल में उनको बड़े जोर की भूख लगी थी और वे जल्दी-से-जल्दी यजमान के घर पहुंच जाना चाहते थे। पास ही में गंगा नदी थी लाचार होकर पंडितजी उस ओर तेजी से लपके।
तभी देखते हैं कि सफाई वाला उनसे आगे-आगे चला जा रहा है। पंडितजी ने कड़ककर पूछा- क्यों रे! तू कहां जा रहा है?
उसने जवाब दिया- नदी में नहाने। अभी आपने कहा था न कि क्रोध चांडाल होता है। मैं उस चंडाल से छू गया, इसलिए मुझे नहाना पड़ेगा। पंडितजी को अब तो जैसे काठ मार गया। वे आगे एक भी शब्द न कह सके और उस व्यक्ति का मुंह ताकते रह गए। इसीलिए तुलसीदासजी ने रामायण में लिखा है-
पर उपदेश कुशल बहुतेरे, जे अचरहिं ते नर न घनेरे॥ 
ऊं तत्सत...

दिन, महीने, साल.. गुजरते जाएंगे..

December 31, 2018 0
दिन, महीने, साल.. गुजरते जाएंगे..



वक्त की घड़ियां कभी थमतीं नहीं
ये अलग बात है धड़कन थम जाए
जी हां, 31 दिसंबर की रात ठीक 12 बजे जैसे ही घड़ी की दो सूइयों का संगम
हुआ, प्रहर के पहरे ने कलेंडर बदल लिया। धड़कनों की रफ्तार ने भी जिंदगी से एक धड़कन कम कर अगले वर्ष में छलांग लगा दी। इस अनपढ़ ने भी सालों का सिलसिला बरकरार रखते हुए अपनों में छिपे परायों को दिल खोलकर मुबारक बोला। रिश्ते-नातों की भीड़ में कुछ अहसास बिना बधाई के अपनी सहलाहट दे डाले और हमने सामान्य सी बदलती तारीख को भी खुशियों की पोटली में संजो लिया। 
नए साल की पुरानी कहानी फिर नए लिबास में रंगी-पुती नजर आई। शब्दों के मायाजाल में बधाइयों के तड़के और अखबारों में पुती स्याही भी उन्हीं कहानियों को नए रंगों में ढाल तमाशबीनों का मनोरंजन करती नजर आई। साल-दर-साल बदलते कलेंडर में कुछ बदला तो बस मशीनीकरण, जो हमें टीवी/ रेडियो/ परिवार/ समाज से निकाल फेसबुक/ ट्विटर/ इंस्टाग्राम और जाने कौन-कौन से भदेसपन (क्षमा.. 'स्मार्टनेस') में ले आया। शाम को टीवी पर नजर पड़ी, तो न्यू-ईयर सेलिब्रेशन के प्रोमो देख मन कुढ़ गया जो आज भी उसी ढर्रे पर थे- वहीं शरीर को खंड-खंड तोड़ती/ मरोड़ती पाश्चात्य नृत्यशैली नए साल के स्वागत में थी, जो करीब 20-25 साल पहले थे, बस चेहरे बदल गए थे। 
तो चलिए, इसके पहले कि इस अनपढ़ की बकवास बातों पर आप भड़कें.. हम भी उसी भीड़ में शामिल हो जाते हैं और उन बिंदुओं को खंगालते हैं, जिनमें बीते साल हमने कुछ पाया, तो कुछ खोया। 

बीती ताहि बिसारि दें
खींचतान के बावजूद साल 2018 में विपक्षी एकता की बानगी खूब दिखी। राजनीतिक गलियारों में आंध्रप्रदेश ने खूब लुभाया, तो हालिया हुए तीन राज्यों के चुनाव ने भरपूर सुर्खियां बटोरीं। राजनीति के पटल पर क्षेत्रीय ताकतों का जोर रहा, तो एनडीए में बिखराव व हिंदुत्व के ध्रुवीकरण के बीच जनता-जनार्दन में बदलती आवोहवा की मुनादी सुनाई दी। शेयर बाजार कुछ को अर्श पर पहुंचाया, तो निवेशकों ने सवा सात लाख करोड़ रुपये गंवा दिए। बॉलीवुड में कम बजट की फिल्मों ने धमाल किया, तो कई नए चेहरे और साइड आर्टिस्ट फ्रंट फ्लोर पर नजर आए।इसी बीच सिनेमा और बिजनेस जगत की कई आला हस्तियां शादी की डोर में बंध गईं, जिनकी साक्षी देश-दुनिया बनी। इसके अलावा विभिन्न मामलों में राजनैतिक-संवैधानिक टकराव सामने आए और तीन तलाक से लेकर अडल्ट्री के कानून तक और रिश्तों की आजादी में एलजीबीटी से लेकर #मीटू तक ने तमाम लोगों को झिंझोड़े रखा। राम-नाम के बीच हनुमान, सबरीमाला, राफेल-डील, बाढ़-बारिश-आग ने जहां आम-ओ-खास का चैन छीना, तो श्रीदेवी, केदारनाथ सिंह, गोपालदास नीरज, एम.करुणानिधि, अजीत वाडेकर, अटलबिहारी बाजपेई, सोमनाथ चटर्जी, अनंत कुमार जैसी हस्तियां अपने चाहने वालों की आंखें नम कर गए। कुल मिलाकर बीता साल हिसाब-किताब में अपने पूर्वज सालों से कमतर नहीं रहा, और हम बची-खुची आबादी के साथ चल पड़े नए साल की इबारत लिखने।

आगे की सुधि लेहि 
नया साल भी कुछ कम नहीं, पिछले अनुभवों को देखते हुए इस साल भी तमाम उपलब्धियों की बानगी तय है। 2019 हम सबके लिए ला रहा है कुछ खास, कुछ नया और कुछ ऐसा, जिसका हमें इंतजार। इस साल होने वाला आम चुनाव सिर्फ नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के भाग्य की परीक्षा ही नहीं, अगले पांच साल के लिए देश की दिशा और दशा निर्धारित करेगा। हर 12 साल बाद लगने वाला भारतीय अध्यात्म व आस्था का केंद्र बिंदु महाकुंभ इस साल तीर्थराज प्रयाग में है। आस्था की डुबकी के बीच 2019 में 3 सूर्य ग्रहण और 2 चंद्र ग्रहण भी लगने वाले हैं। खेल जगत में हम भारतीयों के लिहाज से अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट का सबसे बड़ा आयोजन और क्रिकेट प्रेमियों के दिल की धड़कन क्रिकेट विश्वकप 2019 इस साल इंग्लैंड में होने जा रहा है। केंद्रीय शिक्षा बोर्ड CBSE में नैशनल टेस्टिंग एजेंसी ( एनटीए) की एंट्री भी होगी। इंजिनियरिंग, मेडिकल, नेट-जेआरएफ, गेट सहित अन्य अहम प्रवेश पूर्व परीक्षा नेशनल टेस्टिंग एजेंसी करा सकती है। ऐसे में, सीबीएसई के पास सिर्फ बारहवीं और दसवीं की परीक्षाएं का कामकाज ही रह जाएगा। डिजिटल दुनिया में 5G दस्तक देने वाला है। इस साल कई देशों में हाई स्पीड इंटरनेट सेवा की शुरुआत हो सकती है। नए साल की शुरुआत में बहुप्रतीक्षित चंद्रयान-2 मिशन लॉन्च किए जाने की भी तैयारी है। 2019 में भारत के पास विश्व की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का मौका है और इस बार हमारा मुकाबला ब्रिटेन से है। सिनेमा जगत की बात करें, तो बॉलीवुड में साल 2019 के लिए करीब 220 फिल्में कतार में हैं। इसके अलावा रक्षा, कृषि, अनुसंधान, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, रेल, परिवहन, इंफ्रास्ट्रक्चर आदि सभी क्षेत्रों में नए आयाम गढ़ने की तैयारी है।

नई इबारत की तैयारी
कुल मिलाकर हम हमारी थाती को बरकरार रखेंगे और अपनी समूची ऊर्जा नए साल में नए जोश से नई इबारत लिखने में खर्चेंगे। कभी नाम के साथ 'जी' कहलाने वाले लोग 'फर्जी' दुनिया में जा पहुंचे और '2जी' का सफर '5जी' की रफ्तार में पहुंच गया। हम भी इसके सगे वाले बदलते कलेंडर के साथ पांडुलिपि से निकलकर डिजिटल दस्तक हो गए। अगर, कुछ नहीं बदला तो वह है हमारा दिल-ओ-दिमाग जो तब भी वैचारिक था और आज भी वैचारिक है। हम दुनिया को भले न समझ पाएं, खुद को समझना नहीं छोड़े और शायद यही हमारी पहचान हमें कलेंडर के साथ भी बरकरार रखे हुए है। इसी के साथ काशी-पत्रिका के सभी सुधी पाठकों को सपरिवार नववर्ष की शुभकामनाएं, नया साल आपके लिए सफलता की नई इबारत लिखे।
हर वक्त लाजमी था, हर हाल लाजमी है।
वो साल लाजमी था, ये साल लाजमी है।।
■ कृष्णस्वरूप

भोले भण्डारी- सप्त पाठ

December 29, 2018 0
भोले भण्डारी- सप्त पाठ
 उड़ गए तोते 

देश के राजनीतिक वांग्मय में अनादि काल से ही शकुन-अपशकुन, जादू-टोने, और टोटकों का बोलबाला रहा है। त्रेता युग के यशस्वी राजा राम भी इससे अछूते नहीं थे। रामायण में ढेरों ऐसे आख्यान हैं, जिनमें मुख्यतः बाई आँख का फड़फड़ाना, खाली घड़ों का मार्ग में मिलना इत्यादि है। अब जब प्रभु ही इन बातों पर विश्वास करते हों, तो साधारण मनुष्य की बिसात ही क्या है!

एक तरफ भारत के राजनीतिज्ञ साधारण से असाधारण हो गए, पर उनमें मानवी गुण, शकुन-अपशकुन अब भी बाकी हैं। देश के तत्कालीन नरेश की सांस्कृतिक पार्टी तो पूर्णतया इन टोटकों पर विश्वास करती है। और हो भी क्यों नहीं! इन्होंने ‛राम’ का पेटेंट अपने नाम करवा जो रखा है। वर्तमान में सबसे प्रचलित प्रथा तोतों की हैं। सत्ताधारी पार्टी के सभी राजनेताओं का अटूट विश्वास आज हरे-हरे तोतों पर हैं। तोतों की जितनी महत्ता आज के समय में है, उतनी शायद ही पहले कभी रही हों। 

शासक दल का हर राजनेता सुबह से शाम तक अपने हर कार्य का लेखा-जोखा तोतों से पूछ कर करता है। हालिया हुए चार राज्यों के चुनावों में तो इन तोतों ने खुलकर प्रदर्शन किया। स्थिति यहाँ तक आ गई थी कि दूसरे राज्यों के मशहूर तोतों को इन राज्यों में बुलाया गया और उनसे भविष्यवाणी करवाई गई। पर पिछले चार सालों में हुए अपने अपमान का बदला लेते हुए इन तोतों ने सामूहिक रूप से संगठित हो गलत भविष्यवाणी की। नतीजा साफ निकला और सत्ताधारी दल के धुरंधर राजनेताओं के तोते उड़ गए। 

चुनाव परिणामों के बाद स्थिति यह आ गई हैं कि शासक दल का हर राजनेता अब तोतों को केवल अपने कंधों पर नहीं बिठाता, वरन अब ये राजनेता उन्हें अपने सिर पर भी बिठाने को तैयार दिखते हैं। रोज नए-पुराने टोटकों को ध्यान में रखकर इन तोतों की पूजा की जा रही है। इन्हें नए-नए प्रलोभन दिए जा रहे हैं। सुबह-शाम इनके सामने राम की महिमा का पाठ सुनाया जा रहा है। देश की अस्मित्ता और परंपरा की दुहाई दी जा रही है। 

पर तोतों के साथ जीवन का अनुभव यही कहता है कि एक बार अगर तोतें उड़ गए, तो उन्हें दुबारा पकड़ना मुश्किल है। 
■सिद्धार्थ सिंह 

भोले भण्डारी- षष्ठः पाठ

December 22, 2018 0
भोले भण्डारी- षष्ठः पाठ
अंधेर नगरी, चौपट राजा 

“अपना देश बेशक महान है, सौ में से निन्यान्वे बईमान हैं...” ये फिल्मी डॉयलॉग देश और देशवासियों के साथ कुछ ऐसा चिपका है कि सालों से सत्ता परिवर्तन के बावजूद ईमानदारी की शीतल बयार देश में बहने का नाम ही नहीं ले रही है। अपने शासन के चरम पर किसी प्रधानमंत्री ने लाल किले से ये कहते हुए कि जो एक रुपया सरकार से योजनाओं के लिए जाता है, उसमें से केवल एक पैसा लोगों तक पहुंचता है, इसका विस्तृत ब्यौरा तक दे डाला। खैर, ये बात अलग है कि जनता ने इसे परिहास समझ कर आसानी से भुला दिया, वर्ना आज देश की स्थिति शायद कुछ और होती। आम जनता के मनोभाव को समझे तो हाल- फिलहाल देश में प्रजातंत्र के स्थान पर राजतंत्र ने देश की शासन व्यवस्था को कब्जे में ले रखा है। इसके मूल को समझे, तो ये समझना बिल्कुल दीगर नहीं कि तत्कालीन राजा ने देश को भ्रष्टाचार से मुक्त कराने के नाम पर ही सत्ता हासिल की थी। 'हाथ से हाथ मिले, सौभाग्य बने हमारा' के नाम पर दो लोगों ने राजतंत्रीय सत्ता तो हासिल कर ली, पर अपेक्षित परिवर्तन अभी तक नहीं आया।

देश के बेरोजगार मंडलियों के साथ चाय पर चर्चा की जाए, तो निचोड़ ये निकलता है कि राजा का चुनाव तो हुआ था 'हरिभजन, को, पर सत्ता में आते ही राजा ने तेजी से कपास ओटना शुरू कर दिया। आम चर्चाओं की माने, तो 'लम्बी जुबान, खोटे काम' का जो रूप वर्तमान में चल रहा है, वो देश की वास्तविक स्थिति के साथ बिल्कुल सही बैठता है। स्थिति आज तो ऐसी हो गई है कि नौसिखिया राजनेता खुले तौर पर सत्ता पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा रहा है और देश का चयनित राजा शांत है।

इन सारे पचड़ों के बीच देश पुनः एक बार अपने नियत मार्ग पर चलने को मजबूर है। चहुओर भ्रष्टाचार की काली बयार निर्बाध रूप से बह रही है। पुनः एक बार लोगों ने लेन-देन को प्रकृति का उपहार मान कर चलना शुरू कर दिया है। सुखद इस माहौल में 'हमाम में सभी नंगे हैं' का देश का रूप प्रतिबिंबित हो रहा है। अंधेर इस नगरी में वांछित राजा तो लोगों ने चार साल पहले ही पाया था, पर समझ का फेर ही था, जो लोगों ने पहचानने में देर कर दी।
■सिद्धार्थ सिंह 

काशी सत्संग: ढोलक का राज

December 21, 2018 0
काशी सत्संग: ढोलक का राज

एक गांव में एक नाई रहता था। उसकी एक बुरी आदत थी कि उसके पेट में कोई बात पचती नहीं थी। अत: इधर की बातें उधर बताने का उसे शौक था। एक बार राजा का शाही नाई बीमार पड़ गया, तो राजा ने उस नाई को बुलवा भेजा। राजमहल जाकर नाई राजा के बाल काटने लगा, तो उसने देखा कि राजा के कान गधे जैसे हैं, जो कि पगड़ी व राजमुकुट के कारण दिखाई नहीं देते थे।
हजामत के बाद राजा ने नाई को पैसे देकर कहा- मेरे कानों का राज तुमने जान लिया है। यह राज तुमने किसी को भी बताया, तो तुम्हारी जीभ काट दी जाएगी और कोड़ों की सजा भी मिलेगी। लो, राज को राज रखने के लिए यह मोती की माला इनाम में ले जाओ।
नाई ने निश्चय कर लिया कि राजा के कानों के बारे में किसी को नहीं बताएगा वरना उसे सजा मिलेगी।
नाई घर पहुंचा। बार-बार उसका मन करता कि वह राजा के कानों के बारे में अपनी पत्नी को बता दे, परंतु जीभ कटने के डर से उसने पत्नी को नहीं बताया और रात भर करवटें बदलता रहा। एक-दो बार पत्नी ने भी पूछा कि क्यों बेचैन हो रहे हो, फिर भी वह चुप रहा। अगले दिन वह दुकान पर गया, तो उसका मित्र हजामत बनवाने आया। नाई ने सोचा कि मित्र को बताने में क्या हर्ज है, लेकिन जीभ कटने की बात याद आ गई। अत: कुछ न बोला। नाई का मन बेचैन हुआ जा रहा था। वह अपनी बात किसी को बताना चाहता था। फिर सजा के डर से चुप रह जाता। अब वह हर समय यही सोचता रहता कि राजा के कानों के बारे में किसे बताए? धीरे-धीरे उसका पेट में दर्द होने लगा, तब नाई जंगल की ओर भागा। उसने सोचा कि जंगल में पेड़-पौधे तो बेजुबान होते हैं, क्यों न उन्हें ही बता दिया जाए! कुछ सोच-विचार के बाद वह एक पेड़ के पास गया और जाकर धीरे से बोला- राजा के गधे के कान, राजा के गधे के कान।
अचानक नाई का पेट दर्द ठीक हो गया और वह घर वापस आ गया। उसी दिन जंगल में एक लकड़हारा लकड़ी काटने गया। एक बड़ा वृक्ष देखकर उसकी लकड़ी काटने लगा।
संयोगवश यह वही वृक्ष था, जिसे नाई ने अपना राज सुनाया था। उस पेड़ को काटकर उसकी ढोलक बनाई गई। ढोलक एक घर में विवाह के अवसर पर बजाई गई, तो ठीक से बजने के स्थान पर खास आवाज निकल रही थी। लोगों ने सुना ढोलक से बार-बार आवाज आ रही थी-राजा के गधे के कान, राजा के गधे के कान।
पहले तो लोगों को यकीन नहीं हुआ, परंतु धीरे-धीरे यह बात पूरे गांव में फैल गई 'राजा के गधे के कान'। लोग ढोलक का गाना सुनने के लिए उसे किराए पर लेने आते और खूब मजा लेकर सुनते। अब पूरे गांव में राजा के कानों की चर्चा थी। खबर राजा तक पहुंची। राजा जानता था कि इस नाई के अलावा यह काम किसी का नहीं हो सकता। उसने नाई को बुलवा भेजा। नाई डरता-डरता आया। राजा ने कहा- तुमने हमारी आज्ञा का उल्लंघन किया है, तुम्हें सजा अवश्य मिलेगी। तुम्हारी जीभ काट दी जाएगी।
नाई राजा के पैरों में पड़कर गिड़गिड़ाने लगा, मेरी जीभ मत कटवाइए। मैंने तो सिर्फ पेड़ से कहा था। राजा का दिल पिघल गया और आज्ञा दी कि इसकी जीभ न काटी जाए, परंतु सजा के तौर पर इसे कोड़े जरूर मारे जाएं, ताकि यह इधर की बात उधर करने की आदत को सुधार सके। नाई पर जमकर कोड़े बरसाए गए और उसने कसम खाई कि वह कभी भी इधर की बात उधर नहीं करेगा।
सच ही है-
दोस पराए देखि करि, चला हसन्‍त हसन्‍त,
अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत!!
ऊं तत्सत...

काशी सत्संग: संकल्प की शक्ति

December 20, 2018 0
काशी सत्संग: संकल्प की शक्ति

एक संन्यासी जीवन के रहस्यों को खोजने के लिए कई दिनों तक तपस्या और कठोर साधना में लगे रहे, पर आत्मज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई। थक-हारकर उन्होंने तपस्या छोड़कर घर लौटने का निश्चय किया। दुख और पराजय की भावना ने उन्हें अंदर से तोड़ दिया था। वह लड़खड़ाते कदमों से वापस आ रहे थे। रास्ते में उन्हें प्यास लगी। पानी पीने के लिए वह एक नदी के किनारे गए। सामने उन्हें एक अजीब नजारा दिखाई दिया। एक नन्ही गिलहरी नदी के जल में अपनी पूंछ भिगोकर पानी बाहर छिड़क रही थी। गिलहरी बिना थके अविचल भाव से इस कार्य को करती जा रही थी। संन्यासी को उत्सुकता हुई। उन्होंने गिलहरी से पूछा, ‘प्यारी गिलहरी, तुम यह क्या कर रही हो?’
गिलहरी ने विनम्रता से उत्तर दिया, ‘इस नदी ने मेरे बच्चों को बहाकर मार डाला। मैं उसी का बदला ले रही हूं। मैं नदी को सुखाकर ही रहूंगी।’ संन्यासी ने कहा, ‘तुम्हारी छोटी सी पूंछ में भला कितनी बूंदें आती होंगी। तुम्हारे इतने छोटे बदन, थोड़े से बल और सीमित साधनों से यह नदी कैसे सूख सकेगी? इतना बड़ा काम असंभव है। तुम इसे कभी खाली नहीं कर सकती।’
गिलहरी बोली, ‘यह नदी कब खाली होगी, यह मैं नहीं जानती। लेकिन मैं अपने काम में निरंतर लगी रहूंगी। मैं श्रम करने और कठिनाइयों से टकराने के लिए तैयार हूं। फिर मुझे सफलता क्यों नहीं मिलेगी?’
संन्यासी सोचने लगे कि जब यह नन्ही गिलहरी अपने थोड़े से साधनों सें इतना बड़ा कार्य करने का स्वप्न देखती है, तब भला मैं उच्च मस्तिष्क और मजबूत बदन वाला विकसित मनुष्य अपनी मंजिल को क्यों नहीं पा सकता! ठीक ही कहा जाता है कि कठिनाइयों से लड़ने के संकल्प से ही मनुष्य में शक्ति का संचार होता है और वह सफलता हासिल करता है। मुसीबतों से लोहा लेकर ही मनुष्य का चरित्र चमकता है और उसमें देवत्व का विकास होता है। यह सोचकर वह फिर साधना के लिए लौट पड़े।
ऊं तत्सत...

काशी सत्संग: मूर्तिकार की मौत

December 19, 2018 0
काशी सत्संग: मूर्तिकार की मौत
एक बहुत बड़ा मूर्तिकार हुआ। उसकी बड़ी ख्याति थी। दूर-दूर के देशों तक उसकी कला के पारखी और प्रशंसक थे। वे उसकी कला देखने आते और दांतों तले उंगलियां दबा लेते। लोग कहते थे कि अगर वह किसी की मूर्ति बना दे और उस मूर्ति के बगल में वह आदमी सांस रोककर खड़ा हो जाए, जिसकी मूर्ति है, तो बताना मुश्किल है कि असली आदमी कौन है और मूर्ति कौन है?
मूर्तिकार के मौत की घड़ी करीब आई। उसने सोचा कि अपनी कला से क्यों न मौत को ही धोखा दिया जाए? उसने अपनी ही ग्यारह मूर्तियां बनाकर तैयार कर लीं। जब यमदूत आए, तो वह उन ग्यारह मूर्तियों के साथ छिप कर खडा हो गया। यमदूतों ने देखा कि वहां एक जैसे बारह इंसान हैं। यमदूत को भी भ्रम हो गया। एक को लेने आए थे, बारह लोग खड़े हैं। किसको ले जाए?
फिर कौन असली है? कहीं चूक से गलत प्राण न हर लें। यमदूत वापस लौटे और परमात्मा से कहा कि बड़ी मुश्किल पड़ गई है। वहां एक जैसे बारह लोग हैं! असली की पहचान कैसे हो?
परमात्मा ने उसके कान में एक सूत्र दिया और कहा- इसे सदा याद रखना। जब भी असली और नकली के बीच में से असली को खोजना हो। यमदूत वापस लौटे। फिर उस कमरे में गए। मूर्तियों को देखा और कहा-मूर्तियां बनी तो बहुत सुंदर हैं, पर मूर्तिकार से सिर्फ एक भूल रह गई। काश वह भूल न हुई होती, तो ये मूर्तियां संसार की सर्वश्रेष्ठ होतीं। मूर्तियों के बीच सांसे रोके खड़ा चित्रकार सुनते ही बोल उठा- कौन सी भूल?
यमदूतों ने कहा- यही कि तुम स्वयं को नहीं भूल सकते। बाहर आ जाओ। परमात्मा ने बताया कि जो स्वयं को नहीं भूल सकता, उसे तो मरना ही पड़ेगा और जो अपने को भूल जाए, उसे मारने का कोई उपाय ही नहीं। वह अमृत को उपलब्ध हो जाता है।
मृत्यु लोक में जो भी आएगा उसे मरना ही है। परमात्मा स्वयं भी इस नियम से बंधे हैं। उन्हें भी शरीर त्यागना पड़ा। फिर भी इंसान अमर हो सकता है- अपने कर्मों से। कर्मों से अर्जित यश उसे अमर बना सकते हैं।
ऊं तत्सत…

काशी सत्संग: रुपये की खेती

December 18, 2018 0
काशी सत्संग: रुपये की खेती

किसी गांव में एक किसान रहता था। वह बड़ा ही भला और मेहनती था। उसके दो लड़के थे। वह दोनों को अच्छी सीख देता था। कहता था- जो बोओगे, वही काटोगे। जब किसान बूढ़ा हुआ, तो उसने अपने सारे रुपए और जमीन दोनों लड़कों में बांट दी। फिर एक दिन किसान का स्वर्गवास हो गया।
बड़ा लड़का चतुर था। उसने पिता के दिए पैसे से बढ़िया बीज खरीदा और खेत को खूब जोतकर बो दिया। छोटा लड़का बहुत ही भोला था। उसे याद आया कि उसके पिता कहा करते थे- ‛जो बोओगे, सो काटोगे।’
उसने सोचा कि यदि वह रुपयों को बो देगा, तो उनकी फसल उगेगी और अनाज की तरह उसका घर रुपयों से भर जाएगा। यह सोचकर उसने सारे रुपए खेत में बो दिए।
कुछ दिनों में बड़े भाई की खेती लहलहाने लगी, लेकिन छोटे भाई के खेत में अंकुर भी नहीं फूटा। काफी दिन बीत गए, तो छोटे भाई को हैरानी होने लगी। मारे परेशानी के वह बहुत ही दुबला हो गया। एक दिन बड़े भाई ने उससे दुबले होने का कारण पूछा तो उसने सारी बातें बता दी।
सुनकर बड़ा भाई उसके भोलेपन पर बहुत हंसा। उसने कहा- पिताजी जो कहते थे उसका मतलब यह था कि दूसरों के साथ हमेशा भलाई करो। बदले में तुम्हें भी भलाई मिलेगी।
वह छोटे भाई को साथ लेकर उसके खेत में गया और रुपए ढूंढ़कर निकलवाए, उनसे बीज खरीदे और खेती कराई। जब बढ़िया फसल आई, तो भोले भाई ने समझा कि खेत में अनाज ही उगता है। रुपए की फसल तो तिजोरी में होती है।
ऊं तत्सत…

दुख को त्यागो...

December 17, 2018 0
दुख को त्यागो...
दुख पर ध्यान दोगे तो हमेशा दुखी रहोगे, सुख पर ध्यान देना शुरू करो। दअसल, तुम जिस पर ध्यान देते हो वह चीज सक्रिय हो जाती है। ध्यान सबसे बड़ी कुंजी है...

कभी लगता है कि तुम दुख में मजा लेने वाले हो, तुम्हें कष्ट से प्रेम है। दुख से लगाव होना एक रोग है, यह विकृत प्रवृत्ति है, यह विक्षिप्तता है। पर मुश्किल यह है कि सिखाया यही गया है। असल में स्वस्थ व्यक्ति जिंदगी का मजा लेने में इतना व्यस्त रहता है कि वह दूसरों पर हावी होने की फिक्र ही नहीं करता।
अस्वस्थ व्यक्ति मजा ले ही नहीं सकता, इसलिए वह अपनी सारी ऊर्जा वर्चस्व कायम करने में लगा देता है। जो गीत गा सकता है, जो नाच सकता है, वह नाचेगा और गाएगा, वह सितारों भरे असामान के नीचे उत्सव मनाएगा। लेकिन जो नाच नहीं सकता, जो वह कुटिल बन जाएगा। जो रचनाशील है, वह रचेगा। जो नहीं रच सकता, वह नष्ट करेगा, क्योंकि उसे भी तो दुनिया को दिखाना है कि वह भी है।
जरा इसके पीछे का कारण देखो। अगर वह खुद जिंदगी का मजा नहीं ले सकता, तो वह कम से कम तुम्हारे मजे में जहर तो घोल ही सकता है। इसी लिए सभी तरह के असंतुष्ट और रचनाविहीन बस कुछ न कुछ नकारात्मक खोजते रहते हैं।
अब तुम पूछोगे कि तो मुझे क्या करना चाहिए? मैं कहूंगा कि दुख के प्रति अपनी आसक्ति त्याग दो और जीवन से प्रेम करो, और अधिक खुश रहो। जब तुम एकदम प्रसन्न होते हो, संभावना तभी होती है, वरना नहीं। कारण यह है कि दुख तुम्हें बंद कर देता है, सुख तुम्हें खोलता है। क्या तुमने यही बात अपने जीवन में नहीं देखी? जब भी तुम दुखी होते हो, बंद हो जाते हो, एक कठोर आवरण तुम्हें घेर लेता है। तुम खुद की सुरक्षा करने लगते हो, तुम एक कवच-सा ओढ़ लेते हो। वजह यह है कि तुम जानते हो कि तुम्हें पहले से काफी तकलीफ है और अब तुम और चोट बर्दाश्त नहीं कर सकते। दुखी लोग हमेशा कठोर हो जाते हैं। उनकी नरमी खत्म हो जाती है, वे चट्टानों जैसे हो जाते हैं।
एक प्रसन्न व्यक्ति तो एक फूल की तरह है। उसे ऐसा वरदान मिला हुआ है कि वह सारी दुनिया को आशीर्वाद दे सकता है। वह ऐसे वरदान से संपन्न है कि खुलने की जुर्रत कर सकता है। उसके लिए खुलने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि सभी कुछ कितना अच्छा है, कितना मित्रतापूर्ण है। पूरी प्रकृति उसकी मित्र है। वह क्यों डरने लगा? वह खुल सकता है। वह इस अस्तित्व का आतिथेय बन सकता है। वही होता है वह क्षण जब दिव्यता तुममें प्रवेश करती है। केवल उसी क्षण में प्रकाश तुममें प्रवेश करता है, और तुम बुद्धत्व प्राप्त करते हो।
सौजन्य: ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन