Kashi Patrika

काशी सत्संग: संगत की रंगत

January 05, 2019 0
काशी सत्संग: संगत की रंगत
एक भंवरे की मित्रता एक गोबरी (गोबर में रहने वाले) कीड़े से थी! एक दिन कीड़े ने भंवरे से कहा- भाई तुम मेरे सबसे अच्छे मित्र हो, इसलिए मेरे यहां भोजन पर आओ।
भंवरा भोजन करने पहुंचा। बाद में भंवरा सोच में पड़ गया कि मैंने बुरे का संग किया इसलिए मुझे गोबर खाना पड़ा! अब भंवरे ने कीड़े को अपने यहां आने का निमंत्रण दिया कि तुम कल मेरे यहां आओ।
अगले दिन कीड़ा भंवरे के यहां पहुंचा। भंवरे ने कीड़े को उठा कर गुलाब के फूल में बिठा दिया। कीड़े ने परागरस पीने का आनंद लिया। वह मित्र का धन्यवाद कर ही रहा था कि पास के मंदिर का पुजारी आया और फूल तोड़ कर ले गया और बिहारी जी के चरणों में चढा दिया! कीड़े को ठाकुरजी के दर्शन हुए। उनके चरणों में बैठने का सौभाग्य भी मिला। संध्या में पुजारी ने सारे फूल एकत्र किए और गंगाजी में प्रवाहित कर दिए। कीड़ा अपने भाग्य पर हैरान था! इतने में भंवरा उड़ता हुआ कीड़े के पास आया, पूछा-मित्र! क्या हाल है? कीड़े ने कहा-भाई! जन्म-जन्म के पापों से मुक्ति हो गई! ये सब अच्छी संगत का फल है-
संगत से गुण ऊपजे, संगत से गुण जाए,
लोहा लगा जहाज में, पानी में उतराय!

मित्रों, कोई भी नहीं जानता कि हम इस जीवन के सफर में एक-दूसरे से क्यों मिलते हैं! सब के साथ रक्त संबंध नहीं हो सकते, परंतु ईश्वर हमें कुछ लोगों के साथ मिलाकर अद्भुत रिश्तों में बांध देता है। हमें उन रिश्तों को हमेशा संजोकर रखना चाहिए।
ऊं तत्सत…

काशी सत्संग: परहित का लाभ

January 03, 2019 0
काशी सत्संग: परहित का लाभ

विजयनगर के प्रजावत्सल सम्राट थे कृष्णदेव राय। वे अपनी प्रजा के सुख-दुःख देखने के लिए अक्सर राज्य में भ्रमण करने के लिए जाते थे। एक बार इसी हेतु वे अपने बुद्धिमान मंत्री तेनालीराम तथा कुछ सिपाहियों के साथ निकले। एक-एक गांव देखते-देखते दूर निकल गए। शाम हो गई सभी थक गए। नदी किनारे उचित जगह देखकर महाराज ने कहा-तेनालीराम! यहीं पड़ाव डाल दो। विश्राम के लिए तम्बू लग गए। सभी भूख-प्यास से बेहाल थे। आसपास नजर दौड़ाने पर महाराज को थोड़ी दूर मटर की फलियों से लदा खेत दिखा।
महाराज ने कुछ सिपाहियों को बुलाकर कहा- जाओ सामने के खेत में से फलियां तोड़कर हम दोनों के लिए लाओ और तुम भी खाओ। सिपाही जैसे ही जाने के लिए पीछे मुड़े, तो तेनालीराम ने कहा- महाराज! इस खेत का मालिक तो वह किसान है, जिसने इस खेत में फसल लगाई और इसे अपने पसीने से सींचा है। आप इस राज्य के राजा अवश्य हैं, पर इस खेत के मालिक नहीं। बिना उसकी आज्ञा के इस खेत की एक भी फली तोड़ना अपराध है। राजधर्म के विरुद्ध आचरण है, जो एक राजा को कदापि शोभा नहीं देता।
महाराज को तेनालीराम की बात उचित लगी, सिपाहियों को आदेश दिया, ‘‘जाओ, इस खेत के मालिक से फलियां तोड़ने की अनुमति लेकर आओ।” सिपाहियों को खेत में देख खेत का मालिक घबरा गया।
सिपाहियों ने कहा- महाराज स्वयं तुम्हारे खेत के नजदीक विश्राम कर रहे हैं और अपनी भूख मिटाने के लिए खेत से थोडी-सी फलियां तोड़ने की अनुमति चाहते हैं।
यह सुन उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा! प्रसन्नता और राजा के प्रति अहोभाव से उसका हृदय भर गया। वह दौड़ा-दौड़ा महाराज के पास पहुंचा। राजा को प्रणाम किया और कहा- महाराज! यह राज्य आपका, यह खेत आपका। आप प्रजापालक हैं, मैं आपकी प्रजा हूं। मुझसे अनुमति लेने की आपको कोई आवश्यकता नहीं थी, फिर भी आपने एक गरीब किसान के अधिकार को इतना महत्त्व दिया! आप धन्य हैं!
किसान खुद सिपाहियों के साथ खेत में गया और फलियां तोड़कर महाराज के सामने प्रस्तुत कीं, फिर आज्ञा लेकर गांव गया। थोड़ी देर बाद वह वापस आया। उसके साथ गांव के कुछ लोग और भी थे, जो अपने साथ सभी के लिए तरह- तरह की भोजन-सामग्री लेकर आए थे। इतना अपनापन, प्रेम व सम्मान पाकर महाराज बड़े प्रसन्न हुए।
मित्रों, जब हम अपने अहं को न पोसकर दूसरों के अधिकारों का ख्याल रखते हैं, तो लोग भी हमारा ख्याल रखते हैं। उनके दिल में हमारे लिए आदर और प्यार बढ़ जाता है और वास्तविक आदरणीय, सर्वोपरि, सर्वेश्वर परमात्मा भी भीतर से प्रसन्न होते हैं।
ऊं तत्सत...

काशी सत्संग: ...का करि सकत कुसंग

January 02, 2019 0
काशी सत्संग: ...का करि सकत कुसंग
एक बार की बात है। एक शराबी अपनी शराब पीने की आदत से बहुत परेशान था। एक दिन वह एक महात्मा के पास गया और बोला- मैं शराब पीने की अपनी आदत से बहुत दुखी हूं। इसके कारण मेरा घर बर्बाद हो गया है। मेरे बच्चे भूख से मर रहे हैं। मेरे घर की शांति नष्ट हो गई है। आप ही बताइए। अब मैं क्या करूं?
महात्मा ने कहा- अगर तुम्हें शराब से इतनी परेशानी है। तुम इसे छोड़ क्यों नहीं देते? उस आदमी ने कहा- मैं शराब को छोड़ना चाहता हूं, लेकिन ये मुझे नहीं छोड़ रही है। महात्मा ने मुस्कुराते हुए कहा- ठीक है। तुम कल आना। मैं तुम्हें शराब को छोड़ने का तरीका बता दूंगा।
अगले दिन वह आदमी फिर से उस महात्मा के पास पहुंचा। उस आदमी को देखते ही महात्मा खड़े हुए और पास के ही एक पेड़ से चिपक गए। वह आदमी चुपचाप खड़े होकर उस महात्मा को देखता रहा। जब काफी समय बीत गया, तो उस आदमी ने महात्मा से कहा- अपने इस पेड़ को क्यों पकड़ रखा है? महात्मा ने कहा- मैंने इस पेड़ को नहीं पकड़ रखा है, बल्कि इस पेड़ ने मुझे ही पकड़ रखा है।
उस आदमी ने आश्चर्य के साथ उस महात्मा से कहा- मैं शराबी हूं, मुर्ख नहीं। इस पेड़ ने आपको नहीं पकड़ रखा है, बल्कि आपने ही पेड़ को पकड़ रखा है। आप जब चाहे इसे छोड़ सकते हैं। यह सुनते ही उस महात्मा ने पेड़ को छोड़ दिया।
उस महात्मा ने कहा- जिस तरह मुझे पेड़ ने नहीं पकड़ा था, ठीक उसी तरह शराब ने तुम्हें नहीं पकड़ रखा है, बल्कि तुमने ही शराब को पकड़ रखा है। तुम जब चाहो इसे छोड़ सकते हो। रहीम ने भी कहा है-
जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग,
चंदन विष व्याप्त नहीं, लपटे रहत भुजंग।
ऊं तत्सत...

काशी सत्संग: गौरैया का नववर्ष

January 01, 2019 0
काशी सत्संग: गौरैया का नववर्ष

सूरज की किरणें अभी ठीक से पंकज वन में आई भी नहीं थीं कि चारों ओर जश्न का माहौल-सा छा गया। सबसे पहले तो कलियां खिलखिलाकर खिल उठीं और फिर उन पर भौरों का झुंड मंडराने लगा।
कौए ने घोंसले से सिर निकालकर देखा। गौरेया सवेरे-सवेरे उड़ती हुई कहीं जा रही थी।
कौए ने आवाज लगाई, 'बहन, सारे लोग नए वर्ष का स्वागत कर रहे हैं, तुम कहां जा रही हो? नए वर्ष की शुभकामनाएं तो लेती जाओ।'
'तुम्हें भी नववर्ष की ढेर सारी शुभकामनाएं, भैया। मैं भी नए वर्ष का ही स्वागत करने जा रही हूं।' गौरेया ने कहा।
रास्ते में चूहों का झुंड नए वर्ष को सेलिब्रेट कर रहा था। सभी चूहे मधुर संगीत पर कमर मटकाकर नाच रहे थे। गौरेया को तेजी से उड़ते हुए देख वे भी बोल पड़े, 'गौरेया बहन, सवेरे-सवेरे कहां जा रही हो? आओ, हमारे साथ नए वर्ष का जश्न मनाओ।'
'नहीं, आप लोगों के साथ मैं नहीं आ सकती, लेकिन मैं भी नए वर्ष की शुरुआत ही करने जा रही हूं।' गौरेया बोली और उड़ चली।
कुछ ही दूरी पर भालुओं का झुंड भी नए वर्ष की खुशी में उछल-कूद कर रहा था। गौरेया को देखकर एक भालू चिल्लाया, 'गौरेया, ओ गौरेया, क्या आज भी दाना चुगने की चिंता में उड़ी जा रही हो। क्या तुम्हें याद नहीं आज नया वर्ष है?'
'याद है, भाई, याद है। मैं भी नए वर्ष की खुशी मनाने दूसरी जगह जा रही हूं।' गौरेया बोलती हुई उड़ती रही।
शेर की गुफा के पास ढेर सारे जानवर नए वर्ष की धूमधाम से शुरुआत कर रहे थे। वहां कई तरह की मिठाइयां भी बन रही थीं। नाचने-गाने का इंतजाम भी था। बाजे-गाजे के साथ सभी झूम-झूमकर जश्न मना रहे थे।
गौरेया को देख शेर ने आवाज लगाई, 'अरी गौरेया, सवेरे-सवेरे कहां जा रही हो? आओ यहां। हम सब नए वर्ष की शुरुआत अच्छे से करने के लिए इकट्ठा हुए हैं। तुम भी आओ।'
'माफ कीजिए। मैं अपने नए वर्ष की शुरुआत किसी और चीज से करना चाहती हूं। आप सबको नए वर्ष की शुभकामनाएं।' कहती हुई गौरेया उड़ गई।
'क्यों न हम चलकर देख लें, गौरेया क्या कर रही है?' बंदर ने राय दी और सब गौरेया के रास्ते चल पड़े।
'अरे, यह क्या? यह गौरेया तो बड़ा अच्छा काम कर रही है। इस नन्ही चिड़िया की सोच तो देखो, कितनी अच्छी है।' तारीफ करते हुए शेर का चेहरा खिल उठा।
सामने मैदान में गौरेया ढेर सारी चींटियों के झुंड को संबोधित कर रही थी, 'बहनों, तुम में से कई चींटियां गरीबी के कारण पढ़ाई नहीं कर पातीं और स्कूल जाना बंद कर देती हैं। नए वर्ष पर मैंने संकल्प लिया है कि कुछ गरीब चींटियों की पढ़ाई के लिए मदद करूंगी। साथ ही अन्य चिड़ियों और जानवरों को भी प्रेरित करूंगी कि वे तुम्हारी आर्थिक मदद करें।'
यह सुनकर मैदान तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। कई चींटियों की आंखों से खुशी के आंसू टपकने लगे।
आहट पाकर गौरेया जब मुड़ी, तो सब जानवरों को अपने पीछे आंखें फाड़े देखता पाया।
'मैं कुछ गरीब चींटियों का भविष्य संवारकर नए वर्ष की शुरुआत करना चाहती थी, सो मैंने सवेरे से पहले यही काम किया। मैंने सोचा नए वर्ष की इससे अच्छी शुरुआत भला और क्या हो सकती है? गौरेया ने सफाई दी।
'नन्ही-सी चिड़िया और सोच कितनी बड़ी है। इससे हमें भी कुछ सीखना चाहिए। कुछ क्या, हमें भी हंसने-गाने, बाजा बजाने, पकवान-मिठाई खाने से पहले किसी असहाय, लाचार, गरीब की मदद करने का काम जरूर करना चाहिए। अभी भी वक्त गुजरा नहीं है। चलो, आओ, सबके सब किसी मजबूर का भविष्य संवारने के लिए जुट जाओ। इस तरह हमारी भी नए वर्ष की शुरुआत अच्छी रहेगी।' शेर ने सभी की ओर मुखातिब होकर कहा। सभी गौरेया की ओर खुशी से देख रहे थे।
ऊं तत्सत...

प्रज्ञा विस्तार

January 01, 2019 0
प्रज्ञा विस्तार

काशी सत्संग: पर उपदेश कुशल बहुतेरे

December 31, 2018 0
काशी सत्संग: पर उपदेश कुशल बहुतेरे

एक पंडितजी महाराज क्रोध न करने पर उपदेश दे रहे थे। कह रहे थे- ‛क्रोध आदमी का सबसे बड़ा दुश्मन है। उससे आदमी की बुद्धि नष्ट हो जाती है। क्रोध से आदमी में बुद्धि नहीं रहती, वह पशु बन जाता है। लोग बड़ी श्रद्धा से उनका उपदेश सुन रहे थे पंडितजी ने आगे कहा- क्रोध चाण्डाल होता है। उससे हमेशा बचकर रहो।
भीड़ में एक ओर एक व्यक्ति बैठा था। जिसे पंडितजी ने प्राय: सड़क पर झाड़ू लगाते देखा था। अपना उपदेश समाप्त करके जब पंडितजी जाने लगे, तब वह व्यक्ति भी हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। लोगों की भक्ति-भावना से फूले हुए पंडितजी भीड़ के बीच में से आगे आ रहे थे। इतने में पीछे से भीड़ का रेला आया और वे गिरते-गिरते बचे! धक्के में वे सफाई वाले से छू गए। फिर क्या था! उनका पारा चढ़ गया, बोले-“दुष्ट! तू यहां कहां से आ मरा? मैं भोजन करने जा रहा था। तूने छूकर मुझे गंदा कर दिया। अब मुझे स्नान करना पड़ेगा।” उन्होंने जी भरकर कोसा। असल में उनको बड़े जोर की भूख लगी थी और वे जल्दी-से-जल्दी यजमान के घर पहुंच जाना चाहते थे। पास ही में गंगा नदी थी लाचार होकर पंडितजी उस ओर तेजी से लपके।
तभी देखते हैं कि सफाई वाला उनसे आगे-आगे चला जा रहा है। पंडितजी ने कड़ककर पूछा- क्यों रे! तू कहां जा रहा है?
उसने जवाब दिया- नदी में नहाने। अभी आपने कहा था न कि क्रोध चांडाल होता है। मैं उस चंडाल से छू गया, इसलिए मुझे नहाना पड़ेगा। पंडितजी को अब तो जैसे काठ मार गया। वे आगे एक भी शब्द न कह सके और उस व्यक्ति का मुंह ताकते रह गए। इसीलिए तुलसीदासजी ने रामायण में लिखा है-
पर उपदेश कुशल बहुतेरे, जे अचरहिं ते नर न घनेरे॥ 
ऊं तत्सत...