कहते हैं व्यक्ति का चरित्र उसके गुणों से निखरता और पुख्ता होता हैं। उसकी सोच ही शब्दों का रूप ले कर वाणी की शोभा बढाती हैं। सम्पूर्ण समाज में स्वीकार्यता मिथ्याभिमान हैं पर मनुष्य फिर भी प्रयास करता हैं; सर्व स्वीकार्यता की। आज के दौर में जहाँ भारत दिनों दिन राजनीति की धुरी पर रसातल का सफर तय कर रहा हैं वैसे में एक ऐसे प्रधानमंत्री का सत्ता में होना जो अपने आगे किसी की न सुनता हो, उसे अघोषित एमरजेंसी ही कहेंगे।वर्तमान सत्ता/निर्णयों का एकमात्र केंद्र मोदी हैं
जिस प्रकार से मोदी ने अपने चार साल के कार्यों का लेखा-जोखा न देकर केवल विपक्ष पर हमले की नीति अपनाई हैं वो बीजेपी के लिए 2019 के केंद्र के चुनावों में घातक हो सकती हैं। आज पार्टी के भीतर ही मोदी के खिलाफ विरोध के स्वर फूटने लगे हैं। जब केंद्र के अधिकतर मंत्री अपने निर्णयों को लेने को स्वतंत्र नहीं हैं तो ऐसे में जनता सवाल करे भी तो किससे। हालिया मोदी ने एक सभा को सम्बोधित करते हुए एमरजेंसी में हुए अत्याचारों का हवाला देकर अपनी लोकप्रियता बढ़ाने का प्रयास किया हैं। तो क्या मान लिया जाए कि 2019 आते-आते विकास, बदलाव, रोजगार,महिला सुरक्षा, बैंकिंग घाटा, आतंरिक सुरक्षा ये सभी मुद्दे पीछे छोड़ दिए जाएगे। और मोदी एक बार पुनः कांग्रेस की नाकामियों के लहर पर सवार होना चाहेंगे।
कम से कम हालिया हुए बदलावों से तो ऐसा ही लगता हैं मोदी ने विपक्ष पर छींटाकशी शुरू कर दी हैं। मोदी एमरजेंसी पर बयान दे रहे हैं जबकि देश में भयंकर बेरोजगारी; घटते भू जल स्तर और स्वक्ष गंगा का मुद्दा छाया हुआ हैं। हालिया देश को महिलाओं के लिए असुरक्षित बताया गया हैं। मोदी ने अब तक इसपर एक भी बयान नहीं दिया हैं।
प्रचारक ज्यादा और प्रधानमंत्री कम
मोदी बीजेपी के स्टार प्रचारक हैं और हो भी क्यों नहीं। उन्होंने अपनी पत्नी का साथ छोड़ा, गृह त्याग किया और निःस्वार्थ भाव से देश सेवा में जुट गए। सरकार पर सूट बूट की सरकार होने का आरोप लगा तो महंगे कपड़े पहनना छोड़ दिया। पर राजनीति नहीं छोड़ी। हर मुद्दे पर पहले की तरह ही कांग्रेस पर जमकर आरोप लगाए। और अपने दल के लिए वोट बटोरते रहे। एक के बाद एक हुए राज्यों के चुनाव जीते।
इन सब के बीच ऐसा कुछ भी नहीं हुआ जो मोदी को देश का प्रधानमंत्री साबित कर पाता। बीते चार सालों के उनके शासन में उन्होंने एक बार भी विपक्ष को साधने का प्रयास नहीं किया। लोकतंत्र में मजबूत पक्ष और विपक्ष दोनों का होना आवश्यक माना जाता हैं पर मोदी ने विपक्ष की कम संख्या का हवाला देते हुए पूरे विपक्ष को ही नकार दिया। जानकारों की माने तो मोदी वो प्रधानमंत्री बन ही नहीं पाए जो सबको साथ ले कर चल सके। मोदी अपने कार्यकाल में अक्सर ये भूल गए कि वो देश के प्रधानमंत्री हैं न कि किसी पार्टी के नेता भर।
लोकतंत्र की उलटी चाल
वर्तमान केंद्र सरकार मोदी से शुरू होकर मोदी पर ही खत्म होती हैं। कुछ को छोड़ दिया जाए तो वर्तमान केंद्रीय मंत्रिमंडल में कोई भी चेहरा ऐसा नहीं हैं जो सर्वमान्य हो। तो ऐसे में केवल एक व्यक्ति का पूरे भारत पर शासन करना लोकतंत्र तो नहीं कह सकते। जानकारों की माने तो उनका कहना हैं कि मोदी ने अपने चार साल के शासन में केवल अपने करीबियों को ही मंत्री बनाया। इससे आगे बढ़कर उन्होंने अधिकारीयों को भी मन माफिक शामिल किया। अब जब उन की सरकार पर अघोषित आपातकाल लगाने के आरोप लग रहे हैं तो ये बेमानी नहीं हैं।
स्वीकार्यता केवल संघ की बाकी देश पीछे
वर्तमान केंद्र सरकार केवल एक स्वीकार्यता पर विश्वास करती हैं और वो हैं संघ। अगर राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ ने मान लिया की केंद्र सरकार ठीक काम कर रही हैं तो सबकुछ ठीक हैं। अगर यही लोकतंत्र का तकाजा भर बचा हैं तो सत्ता के दो केंद्र हैं एक संवैधानिक रूप से चुनी सरकार और एक राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ। जानकारों की माने तो जिस प्रकार मोदी के सत्ता में आने के बाद से संघ ने समाज में जो अपनी पैठ बनाई हैं। वो इन सम्बन्धो को खुलकर दृष्टिगोचर करती हैं।
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