काशी सत्संग: अपना-अपना नजरिया - Kashi Patrika

काशी सत्संग: अपना-अपना नजरिया

मास्टर जी क्लास में पढ़ा रहे थे, तभी पीछे से दो बच्चों के आपस में झगड़ा करने की आवाज आने लगी। “क्या हुआ तुम लोग इस तरह झगड़ क्यों रहे हो?” मास्टर जी ने पूछा।
दीपक: सर, अमित अपनी बात को लेकर अड़ा है और मेरी सुनने को तैयार ही नहीं है।
अमित: नहीं सर, राहुल जो कह रहा है वो बिलकुल गलत है, इसलिए उसकी बात सुनने से कोई फायदा नहीं। और ऐसा कह कर वे फिर तू-तू मैं-मैं करने लगे।
मास्टर जी ने उन्हें बीच में रोकते हुए कहा, “एक मिनट तुम दोनों यहाँ मेरे पास आ जाओ। दीपक तुम डेस्क की बाईं और अमित तुम दाईं तरफ खड़े हो जाओ।”
इसके बाद मास्टर जी ने आलमारी से एक बड़ी सी गेंद निकाली और डेस्क के बीचो-बीच रख दी।
मास्टर जी: दीपक तुम बताओ, ये गेंद किस रंग की है।
दीपक: जी ये सफेद रंग की है।
मास्टर जी: अमित तुम बताओ ये गेंद किस रंग की है ?
अमित: जी ये बिलकुल काली है।
दोनों ही अपने जवाब को लेकर पूरी तरह आश्वस्त थे, उनका जवाब सही  है और एक बार फिर वे गेंद के रंग को लेकर एक दूसरे से बहस करने लगे।
मास्टर जी ने उन्हें शांत कराते हुए कहा,“ठहरो, अब तुम दोनों अपने अपने स्थान बदल लो और फिर बताओ की गेंद किस रंग की है?”
दोनों ने ऐसा ही किया, पर इस बार उनके जवाब भी बदल चुके थे। दीपक ने गेंद का रंग काला, तो अमित ने सफेद बताया।

अब मास्टर जी गंभीर होते हुए बोले,“ बच्चों, ये गेंद दो रंगों से बनी है और जिस तरह यह एक जगह से देखने पर काली और दूसरी जगह से देखने पर सफेद दिखती है, उसी प्रकार हमारे जीवन में भी हर एक चीज को अलग–अलग दृष्टिकोण से देखा जा सकता है। ये जरूरी नहीं है कि जिस तरह से आप किसी चीज को देखते हैं, उसी तरह दूसरा भी उसे देखे। इसलिए अगर कभी हमारे बीच विचारों को लेकर मतभेद हो तो ये ना सोचें कि सामने वाला बिलकुल गलत है, बल्कि चीजों को उसके नजरिये से देखने और उसे अपना नजरिया समझाने का प्रयास करें। तभी आप एक अर्थपूर्ण संवाद कर सकते हैं।”

ऊं तत्सत...

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