
तारीख: 17 नवंबर 1994, स्थान: मारवाड़ी अस्पताल, गोदौलिया, काशी। यही वह जगह है, जहां मैंने जिंदगी की पहली सांस ली। मेरा जन्म कुछ ऐसा हुआ कि शायद ठंड मेरे अंदर घुस गई थी और डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए। बाबा विश्वनाथ की नगरी में जब उनकी सहमति के बिना कुछ नहीं होता, तो भला मैं अदना सा जीव कैसे दुनिया से विदा हो जाता। बाबा भोले की इच्छा से मेरी बड़ी मामी (जो एक नर्स थी) बिना देर किए मुझे लेकर रामकृष्ण मिशन हॉस्पिटल की ओर दौड़ पड़ी और मैं बच गया। इस तरह जिंदगी की जद्दोजहद से लड़कर जीतना मैंने “काशी नगरी” से सीखा। वर्तमान मैं काशी में नहीं रहता, पर महादेव की नगरी से दिल और अपने काम दोनों से जुड़ा हुआ हूं।
बांग्लादेश से विस्थापित होकर मेरे पिता बंगाल से काफी दूर आंध्र प्रदेश के आदिलाबाद जिले पहुंचे रोजी-रोटी की जुगाड़ में। वहां कागज की फैक्ट्री में काम किया और ट्रेड यूनियन के बड़े लीडर बने। हालांकि, इसकी बड़ी कीमत भी चुकानी पड़ी। फैक्ट्री वालों ने शर्त रखी कि अब उनकी तनख्वाह कभी नहीं बढ़ेगी और ओहदा भी नहीं बढ़ेगा। मजदूरों के हित के लिए पिताजी ने यह स्वीकार कर लिया और सेवानिवृत्त होने तक उनकी तनख्वाह 8000 महीने रही। इतनी सी तनख्वाह में बूढ़ी मां, पत्नी और बेटे के साथ उन्होंने C टाइप क्वार्टर में जिंदगी बिताया। पिताजी को देखकर बचपन से राजनीति में दिलचस्पी जाग गई। धीरे-धीरे मैं संघ से जुड़ गया, फिर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद संभालना शुरू किया। कार्यकर्ता से लेकर जिलाध्यक्ष तक का सफर बहुत कठिन था।
मेरा गांव, सिरपुर कागजनगर एक छोटा सा भारत ही था। हर क्षेत्र और समुदाय के लोगों के बीच रहकर मैंने हिंदी, तेलुगु, उर्दू, मराठी, पंजाबी, भोजपुरी, मैथिली, बंगाली, और मारवाड़ी बोलना सीख लिया। हर तरह के दोस्त भी थे। गांव में गिनकर कुल चार स्कूल थे, जिनमें मैं हिंदी माध्यम का छात्र था। दसवीं में अव्वल आने के बाद एक सरकारी पॉलीटेक्निक से मैकेनिकल इंजीनियरिंग का डिप्लोमा करने आदिलाबाद पहुंच गया। यहां मुझे एक लड़की से प्यार हो गया। साथ ही साथियों की संगत में कुछ नशे भी करने लगा, हालांकि इनकी कभी लत नहीं हुई। मैं प्रेमिका के साथ सपने बुन रहा था, पर नियती को यह मंजूर नहीं था। हैपेटाइटिस ने उसकी जान ले ली और मैं जिंदगी से बेजार हो गया।
पॉलीटेक्निक छोड़कर कगजनगर में रहने लगा। 12 वीं की पढ़ाई सरकारी कॉलेज से कर नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (वरंगल) से फिर से डिप्लोमा किया। मगर जिंदगी अब भी हताशा से भरी लगती, फिर घर छोड़ मैंने सन्यास लेने का सोचा और रामकृष्ण मिशन, कोलकाता से ब्रह्मचर्य की दीक्षा ले ली।
सालभर कभी कोलकाता, उज्जैन, तो कभी गोरखपुर रहा। योगी आदित्यनाथ जी के पास रहकर भी बहुत कुछ सीखा। पुरोहित भी रहा, लेकिन 'खुद का पिंडदान' करने का अवसर नहीं प्राप्त हुआ और मुझे गृहस्थ जीवन में जाकर माता-पिता की सेवा करने का आदेश मिला।
हैदराबाद के शेनॉय ट्रेड सेंटर से नौकरी की शुरुआत की। फिर कोचिंग सेंटर शुरू किया और भोपाल पहुंच गया। पिताजी सेवानिवृत्त हुए तो मुझे घर वापस बुला लिया। अब गांव में रहकर कोचिंग पढ़ाता रहा और कंप्यूटर का व्यापार शुरू किया। व्यापर बढ़ा हैदराबाद, भोपाल, कागजनगर, मंचेरियाल, चंद्रपुर और आदिलाबाद ज़िला एक कर दिया। ऐसे ही ट्रैवेल्स में दिलचस्पी के कारण 'शाम्भवी ट्रेवल्स' की नींव रखी। बड़ी संख्या में तेलुगु लोग काशी दर्शन और घूमने-फिरने के उद्देश्य से जाते हैं। मेरे पास भी बनारस/काशी/वाराणसी घूमने वाले आते हैं और अपने वाराणसी अनुभव से मैं उनका दिल जीत लेता हूं। इसी तरह वाराणसी से जुड़ा भी हूं।
बात 2014 लोकसभा चुनाव की है। मुझे संघ कार्यालय से एक कॉल आया कि विद्यार्थी परिषद के सारे जिलाध्यक्ष कृपया वाराणसी पहुंचे। नरेंद्र मोदी जी के लिए 1 महीना प्रचार करना है। मैं चल पड़ा। उस कार्य के बाद दिल्ली भेजा गया DU के चुनाव में कार्य दिया गया। डिजिटल इंडिया, मुद्रा बैंक ने मेरी जिंदगी बदल दी। मेरा कारोबार पूरे देश में ही नहीं सिंगापुर, थाईलैंड और फिलीपींस में भी फ़ैल गया। जीवन पथ पर कोशिश अभी जारी है।
ये है मेरी साढ़े 23 साल की कहानी, जो काशी की धरती पर मेरे जन्म के साथ शुरू हुई।
■ कौशिक भट्टाचार्या
'शिवम ग्रुप', 'शाम्भवी ट्रेवल्स' के CEO, रेलवे विकास प्राधिकरण के सदस्य, रामकृष्ण मिशन(सिरपुर, कगजनगर) के सचिव और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के एडवाइजर भी हैं।
जिंदगी की जद्दोजहद से लड़कर आगे बढ़, अपनी राह खुद बनाने वाले युवाओं के लिए कौशिक प्रेरणा हैं और काशी पत्रिका उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करती है।


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