'लोकसभा चुनाव 2019' में विजय पताका फहराने के लिए सिर्फ सियासी गोटियां फिट करने की माथापच्ची ही नहीं है, बल्कि प्रचार को लेकर भी काफी कसरत करनी पड़ेगी। इसका कुछ भान तो अभी से होने लगा है। ताजा रैलियां आगामी लोकसभा की जमीन तैयार करती दिख रही है। प्रचार होगा, तो करोड़ों रूपए पानी की तरह बहाए जाएंगे। चुनावी रैलियों से लेकर टीवी, न्यूज पेपर, सोशल मीडिया तक प्रचार करने में अनुमान है कि चुनावी साल में बाजार में आएंगे 15-16 हजार करोड़ आएँगे। हालांकि, प्रचार पर स्वाहा होने वाले इतने रुपयों से महंगाई बढ़ने के आसार हैं, लेकिन जानकारों के मुताबिक, चुनाव में होने वाले हजारों करोड़ रुपए के अतिरिक्त खर्च से विकास की रफ्तार को मजबूती मिलेगी। औद्योगिक संगठनों के मुताबिक, हर सीट पर सरकार और उम्मीदवारों की ओर से कम से कम 28 से 30 करोड़ रु. खर्च होंगे। इस तरह बाजार में 15 से 16 हजार करोड़ रुपए आएंगे। औद्योगिक संगठन एसोचैम के मुताबिक इससे आर्थिक विकास तेज होगा। छोटे कारोबारों में तेजी आएगी। ट्रांसपोर्ट, हॉस्पिटैलिटी, एविएशन और सोशल मीडिया सेक्टर्स पर बड़ी रकम खर्च होगी, जिससे आर्थिक विकास को रफ्तार मिलेगा। एसोचैम का अनुमान है कि हर सीट पर कम से कम तीन से चार उम्मीदवार गंभीर रूप से चुनाव लड़ रहे होते हैं। हर एक औसतन 6 करोड़ खर्च करेगा। यानी 4 उम्मीदवार गंभीर हैं तो औसतन 24 करोड़ खर्च होंगे। बाकी उम्मीदवार भी कुल मिलाकर 2 से 2.5 करोड़ रुपए खर्च करेंगे। सरकार भी प्रति सीट 2.5 से 3 करोड़ रु. खर्च करती है। ऐसे में प्रति सीट 28 से 30 करोड़ रु. खर्च होते हैं। सभी 543 लोकसभा सीटों पर इतना खर्च हुआ, तो यह राशि 15 से 16 हजार करोड़ रु. तक पहुंच जाएगी।
औद्योगिक संगठन इसमें विकास की रफ्तार तलाश रहे हैं, लेकिन आम आदमी को क्या हासिल होगा? महंगाई और आसमान छूएगी! वैसे भी, आम जन के लिए यह समझ से परे है कि एक तो प्रचार कर अपनी छवि चमकाने की कोशिश क्यों करते हैं नेताजी। क्योंकि, उन्होंने अपनी जिम्मेदारी निभाई है और जनता का दुःख-दर्द समझा है, तो वोट उन्हें ही मिलेगा! दूसरे यह की जितने पैसे चुनाव में बर्बाद करते हैं उसका आधा भी लोगों की भलाई पर खर्च करते तो जीतने की कसरत से बच जाते। फिलहाल, खुश हो लीजिये कि आथिर्क विकास की सही रफ्तार कही तो तेज होगी, क्योंकि, पीएम आवास, काला धन वापसी, रोजगार...हर जगह रफ्तार घिसट भी नहीं पा रही।
■ संपादकीय
औद्योगिक संगठन इसमें विकास की रफ्तार तलाश रहे हैं, लेकिन आम आदमी को क्या हासिल होगा? महंगाई और आसमान छूएगी! वैसे भी, आम जन के लिए यह समझ से परे है कि एक तो प्रचार कर अपनी छवि चमकाने की कोशिश क्यों करते हैं नेताजी। क्योंकि, उन्होंने अपनी जिम्मेदारी निभाई है और जनता का दुःख-दर्द समझा है, तो वोट उन्हें ही मिलेगा! दूसरे यह की जितने पैसे चुनाव में बर्बाद करते हैं उसका आधा भी लोगों की भलाई पर खर्च करते तो जीतने की कसरत से बच जाते। फिलहाल, खुश हो लीजिये कि आथिर्क विकास की सही रफ्तार कही तो तेज होगी, क्योंकि, पीएम आवास, काला धन वापसी, रोजगार...हर जगह रफ्तार घिसट भी नहीं पा रही।
■ संपादकीय


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