आज है, कल हुई, न हुई - Kashi Patrika

आज है, कल हुई, न हुई

आज है, कल हुई, हुई, न हुई
छांव हर पल हुई, हुई, न हुई

एक पहेली है जिंदगी अपनी
क्या पता हल हुई, हुई, न हुई

देह का फलसफा बताता है
कल ये संदल हुई, हुई, न हुई

जो नदी तुझमें - मुझमें बहती है
उसमें कलकल हुई, हुई, न हुई

ये नुमाइश तो चार दिन की है
फिर ये हलचल हुई, हुई, न हुई

मानकर घास रौंद मत इसको
कल ये मखमल हुई, हुई, न हुई

जितना जी चाहे उतनी पी ले तू
फिर ये बोतल हुई, हुई, न हुई
■ डॉ. उर्मिलेश 

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