क्या एशिया की दो महाशक्तियां चीन और भारत पास आ रहे हैं? - Kashi Patrika

क्या एशिया की दो महाशक्तियां चीन और भारत पास आ रहे हैं?

एक महीने में मोदी की दो चीन की यात्रा। भारत का आसिआन में चीन की भागीदारी को महत्व देना। भारत का एससीओ का स्थाई सदस्य बनना।चीन का भारत में अगले साल आने का न्योता स्वीकार करना। क्या ये सभी घटनाए इस ओर संकेत कर रहे हैं कि भारत और चीन नजदीक आ रहे हैं? 

भारत व चीन एक लम्बी अवधि से एक-दूसरे को सामरिक, आर्थिक एवं कूटनीतिक दृष्टि से पीछे करने के लिए प्रयत्न करते आ रहे हैं तथा एशिया में अपने वर्चस्व को लेकर उलझ रहे हैं । आज के राजनीति में चल रहे संक्रमण काल में भारत-चीन संबंधों की नई पहल का महत्व दोनों देशों के हितों के लिए ही नहीं, अपितु तृतीय विश्व के विकासशील देशों के हितों के लिए भी आवश्यक है ।

1954 में भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु तथा तत्कालीन चीनी प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई द्वारा सह अस्तित्व के लिए प्रतिपादित पंचशील सिद्धांत दोनों देशों के बीच सहयोग एवं सम्मान हेतु स्थापित किया गया । पंचशील के पाँच सिद्धांतों में एक-दूसरे की अखण्डता व सम्प्रभुता का सम्मान, अनाक्रमण, समानता, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व तथा एक-दूसरे के आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना शामिल था ।

भारतीय प्रधानमंत्री वाजपेयी की चीन यात्रा के समय चीनी प्रधानमंत्री वेन जिआबाओ के साथ हुई बातचीत के बाद सरहदी रास्ते से व्यापार बढ़ाने की एक सहमति के साथ-साथ आपसी संबंधों को व्यापक बनाने वाला एक साझा घोषणा-पत्र जारी किया गया, जिससे दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग को गति मिलने पर आपसी विश्वास का एक नया परिवेश पनपा।

दोनों देशों ने व्यापार सम्बन्धी सहमति एमओयू और नौ समझौतों पर भी हस्ताक्षर किए । वास्तविकता यह है कि दोनों देशों का आर्थिक व व्यापारिक भविष्य राजनीतिक व राजनयिक वातावरण के द्वारा सही सही अर्थों में तय होगा ।

ऐसा नहीं हैं कि साझा सम्बन्ध सदैव मजबूत ही रहे हैं पर पहल दोनों ओर से हो रही हैं। डोकलाम विवाद पर भारत के नर्म रुख से विवाद आगे नहीं बढ़ा। चीन ने भी वन बैल्ट रोड पर भारत की साझेदारी न करने की नीति को हलके में लेकर आपसी रिश्तों में परिपक्वता का परिचय दिया हैं। आतंकी संगठन के सरगना हाफिज सईद को चीन का समर्थन भारत की निराशा का कारण हैं तो भारत द्वारा चीन सागर में अपनी शक्ति बढ़ाना चीन के लिए कष्टदाई हैं।

तो क्या इन विवादित मुद्दों से ऊपर उठकर भारत और चीन आपसी रिश्तों को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

जानकारों का मानना हैं कि भारत की बढ़ती शक्ति और हिन्द महासागर के रस्ते चीन के बढ़ते व्यापार के कारण ऐसा हो रहा हैं। चीन को विकास करने के लिए नए बाजार की आवश्यकता हैं और भारत से बड़ा केंद्र उसे पूरे विश्व में नहीं मिल सकता।

पर इन संबंधों की मधुरता भारत के लिए कोई परिणाम नहीं लाने वाले क्योकि भारत को चीन से बदले में कोई भी नई तकनीक या बड़े पैमाने पर विकास करने के स्वतंत्रता नहीं मिलने वाली हैं। बल्कि चीन बड़े पैमाने पर भारत का दोहन करना शुरू कर सकता हैं। इन सब के बीच ये मानना ही ज्यादा तर्क संगत लगता हैं कि प्रधानमंत्री मोदी अपने कार्यकाल के अंतिम साल में अपने पड़ोसी देशों से रिश्ते मधुर हैं इस बात पर बल देना चाहते हैं। तो कही यह मोदी की राजनीतिक महत्वकांक्षा का कोई नया अद्ध्याय तो नहीं जहाँ वह खुद को एशिया के सर्वमान्य नेता के रूप में प्रदर्शित करना चाहते हैं। इस प्रश्न का उत्तर तो आने वाला समय ही दे सकता हैं।

खैर मोदी अपनी दो दिनों की एक और विदेश यात्रा के बाद देश में लौट आए हैं। 

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