आज देश अव्यवस्थित विकास के उस मुहाने पर खड़ा हैं कि जहाँ अमीर और अमीर होता जा रहा हैं और गरीब और अन्नदाता और गरीब। प्रबंधन में खामियों की वजह से रोज नई-नई समस्याए मुँह बाए खड़ी हो जाती हैं और हमें विश्व में हर रोज पीछे धकेलेने को तत्पर दिखती हैं। तो क्या हम आजादी के ७० सालों में लोकतंत्र में बस यही सीख पाए हैं कि कैसे पैसा; पैसे को खींचता हैं। और गरीबी; गरीबी को न्यौता देती हैं। शहरों में हद से ज्यादा भीड़, जनसंख्या का असामान्य वितरण, प्राकृतिक संसाधनों का दुरुपयोग, समस्याओं का निपटारा न हो पाना, सरकारों की स्थिलता और एक चिढ जो रोज बढ़ती जा रही हैं व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर और लोकतंत्र को दिन पे दिन खोखला करती जा रही हैं।
वर्तमान वादों की सरकार का हाल भी बुरा हैं जिसने लोगों से इतने वादे कर दिए कि लगा इन पांच सालों के बीतते-बीतते आम जनमानस की सभी समस्याए काफूर हो जाएंगी। हर रोज एक नए वादे और उनसे सम्बंधित विज्ञापन। आप अक्सर सत्ता के समर्थकों को हर मुद्दे पर जनता को भला बुरा कहता पाएंगे। अगर विकास नहीं हुआ तो कहने का सिलसिला ऐसे शुरू होता हैं कि जनता दोषी हैं, कभी उसे अनपढ़ कहाँ जाता हैं, तो कभी उसमे खामियां निकाली जाती हैं। आखिर इन्ही खामियों से निकलकर राजसुख भोगने को नेता निकलते हैं। वो तब तक ठीक होते हैं जबतक वो जनता के बीच रहते हैं। सत्ता की कुर्सी पर विराजमान होते ही खेल अपनी जेबें भरने का शुरू हो जाता हैं।
वर्तमान सरकार के हर सांसद को एक गांव गोद लेकर विकास करना था अगर सभी गांव सही से विकसित किए जाते तो बीते चार सालों में अबतक १७०० गांव विकसित हो चुके होते। शहरों पर बोझ कुछ तो काम हुआ होता।पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। सरकार के विज्ञापन की मार ऐसी पड़ी की चार साल बीतते-बीतते लोगों का विश्वास केंद्र सरकार से उठ गया।
अमूमन यह स्थिति सभी सरकारों के साथ होती हैं ऐसा नहीं हैं कि ये भारत के लोकतान्त्रिक इतिहास में पहली बार हो रहा हैं। जनता ने अच्छे-अच्छे नेताओं को समय आने पर उनकी करनी का फल दिया हैं। तो क्या इस बार भी जनता प्रधानमंत्री मोदी को सबक सिखाएगी। हालिया उपचुनावों के नतीजे तो यही दिखलाते हैं। खैर मोदी एक अच्छे नेता होने के साथ एक कुशल राजनीतिज्ञ भी हैं हो सकता हैं अभी साल रहते वो कुछ ऐसी योजनाओं को क्रियान्वित करें कि उनपर जनता का विश्वास एक बार फिर बन जाए। और २०१९ में केंद्र में फिर से एक बार पूर्ण बहुमत की कोई सरकार विराजमान हो और जनता इस बार ठगा महसूस न करे।
:संपादकीय


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