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| उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान |
बदायूं, उत्तर प्रदेश में ३ मार्च १९३१ को जन्मे उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान अपनी गायकी के लिए जाने जाते हैं। यूं तो इनके द्वारा प्राप्त पुरस्कारों की एक लम्बी फेहरिस्त हैं पर सन २०१८ में इन्हे भारत के दुसरे सबसे बड़े सम्मान पद्मविभूषण से नवाजा गया।
बचपन से ही संगीत की बारीकियों के बीच पले बढ़े उस्ताद का जीवन 'रामपुर सहसवान' घराने में बीता। इस घराने ने एक से बढ़कर एक संगीत के महारथियों को जन्म दिया हैं जिसमे उस्ताद इनायत हुसैन खान, उस्ताद फ़िदा हुसैन खान, उस्ताद मुस्ताक हुसैन खान, उस्ताद निसार हुसैन खान का नाम प्रसिद्द हैं। अपने दादा और उस्ताद फ़िदा हुसैन खान की शागिर्दी में ये बचपन से ही संगीत में पारंगत होने लगे।
इन्हे दो घरानो से संगीत की बारीकियों की शिक्षा मिली।
फिल्म जगत से जुड़ाव
उनसे पूछे जाने पर कि किस तरह से आप फिल्मों में आए तो उस्ताद बताते हैं कि सबसे पहले उन्होंने मराठी और गुजराती फिल्मों में गाना शुरू किया। मृणाल सेन की भुवन शोम इनकी पहली हिंदी फिल्म थी। इन्होने उमराव जान में भी अपनी गायकी का हुनर दिखाया।
इन्होने जर्मन की एक फिल्म में बैजू बावरा का किरदार भी निभाया हैं। संगीत की बारीकियों में उस्ताद ने ग़ज़ल, ठुमरी, और सुगम संगीत में भी अपनी छाप छोड़ी हैं।
भारतीय संगीत का भविष्य कैसा हैं ?
इस सवाल के जवाब में उस्ताद हल्का गुनगुनाते हुए कहते हैं कि अभी तो सीख ही रहा हूँ। जो पूर्ण हैं उसका भविष्य भी पूर्ण होगा हम तो केवल कुछ दिनों तक भारतीय संगीत की आराधन कर सकते हैं जो सम्पूर्ण हो जाएगा वो भविष्य बदल देगा। हाँ इस में समय जरूर लगेगा। और भारतीय सगीत सदैव विश्व को अपनी ओर आकर्षित करता रहेगा।



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