घाटी में बना बेमल तालमेल आखिरकार टूट गया। राजनीतिक विशेषज्ञों की माने तो, वैसे भी इसमें शामिल भाजपा-पीडीपी के लिए कुछ खास करने को बचा नहीं था। जम्मू-कश्मीर में हालात और सिफर हो रहे हैं, पर अचानक अभी गठबंधन क्यों टूटा? यह सवाल खुद भाजपा की सहयोगी शिवसेना भी उठा रही है! सियासी समझ रखने वालों का मानना है कि आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर यह कदम उठाया गया है और भाजपा इसे चुनावी रणनीति की तरह इस्तेमाल कर सकती है। वो न केवल जम्मू-कश्मीर, बल्कि देश के दूसरे हिस्से में भी इस फैसले से फायदा लेने की कोशिश करेगी, क्योंकि कश्मीर का मुद्दा एक नेरेटिव की तरह काम करता है।
सवाल यह भी है कि अब जम्मू-कश्मीर में आगे क्या होगा? स्थितियां यही कहती हैं कि जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन लगते ही सेना और अन्य तमाम सुरक्षा बलों को घाटी से आतंकवादियों के सफाए के लिए खुली छूट मिल जाएगी। घाटी के बिगड़ते हालात पर इससे कितना नकेल कसा जा सकेगा यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन हालिया घटनाओं को देखते हुए लगता है सख्ती ने घाटी को पहले की तुलना में कहीं अधिक अस्थिर किया है। घाटी में सरकार, सेना और प्रशासन के खिलाफ रोष बढ़ता दिखाई पड़ता है, ऐसे में वहां भविष्य में शांति का लक्ष्य दमन के रस्ते पाना कितना कारगर साबित होगा कहना मुश्किल है। ताजा हालात में वहां शांतिपूर्ण चुनाव कराना भी संभव नहीं दिखता।
फिलहाल, यह है कि साल 2014 के अंतिम दिनों में, जब जम्मू कश्मीर ने किसी एक दल को सत्ता की चाबी नहीं दी, तो पीडीपी (28) और भाजपा (25) ने हाथ मिलाकर 44 का जादुई आंकड़ा प् तो लिया, लेकिन यह गठबंधन उतना ही चौकाने वाला था, जितना इसका अचानक टूटना। खास तो यह रहा कि गठबंधन तोड़ने के लिए भाजपा ने राज्यपाल के पास जाना उचित नहीं समझा, बल्कि राम माधव ने मीडिया के सामने इसका ऐलान कर कर्तव्य की इतिश्री कर ली। पीडीपी ने भी गठबंधन टूटने पर विशेष दुख प्रकट नहीं किया, क्योंकि उसे भी इससे नुकसान ही पहुंच रहा था और अपने गढ़ में भी विरोध झेलना पड़ रहा था।
कुल मिलाकर, सत्ता के लिए गठबंधन बनते भी हैं और टूटते भी। नजर अभी 2019 लोकसभा चुनाव पर है, जिसके लिए छोटी-मोटी कुर्बानी देना मजबूरी भी है और जरूरत भी। इसी के इर्दगिर्द सभी दल और सियासत दार तानाबाना बुन रहे हैं।
■
सवाल यह भी है कि अब जम्मू-कश्मीर में आगे क्या होगा? स्थितियां यही कहती हैं कि जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन लगते ही सेना और अन्य तमाम सुरक्षा बलों को घाटी से आतंकवादियों के सफाए के लिए खुली छूट मिल जाएगी। घाटी के बिगड़ते हालात पर इससे कितना नकेल कसा जा सकेगा यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन हालिया घटनाओं को देखते हुए लगता है सख्ती ने घाटी को पहले की तुलना में कहीं अधिक अस्थिर किया है। घाटी में सरकार, सेना और प्रशासन के खिलाफ रोष बढ़ता दिखाई पड़ता है, ऐसे में वहां भविष्य में शांति का लक्ष्य दमन के रस्ते पाना कितना कारगर साबित होगा कहना मुश्किल है। ताजा हालात में वहां शांतिपूर्ण चुनाव कराना भी संभव नहीं दिखता।
फिलहाल, यह है कि साल 2014 के अंतिम दिनों में, जब जम्मू कश्मीर ने किसी एक दल को सत्ता की चाबी नहीं दी, तो पीडीपी (28) और भाजपा (25) ने हाथ मिलाकर 44 का जादुई आंकड़ा प् तो लिया, लेकिन यह गठबंधन उतना ही चौकाने वाला था, जितना इसका अचानक टूटना। खास तो यह रहा कि गठबंधन तोड़ने के लिए भाजपा ने राज्यपाल के पास जाना उचित नहीं समझा, बल्कि राम माधव ने मीडिया के सामने इसका ऐलान कर कर्तव्य की इतिश्री कर ली। पीडीपी ने भी गठबंधन टूटने पर विशेष दुख प्रकट नहीं किया, क्योंकि उसे भी इससे नुकसान ही पहुंच रहा था और अपने गढ़ में भी विरोध झेलना पड़ रहा था।
कुल मिलाकर, सत्ता के लिए गठबंधन बनते भी हैं और टूटते भी। नजर अभी 2019 लोकसभा चुनाव पर है, जिसके लिए छोटी-मोटी कुर्बानी देना मजबूरी भी है और जरूरत भी। इसी के इर्दगिर्द सभी दल और सियासत दार तानाबाना बुन रहे हैं।
■


No comments:
Post a Comment