'फेंकू', 'पप्पू', 'बहनजी', 'भइयाजी', 'साहेब'... आदि तमाम मौजूद
संबोधनों में घुली-पकी "राजनीति" इतनी मायावी है कि अंनत काल से देव-दानव, राजे- रजवाड़े ही नहीं, हर आमोखास इसका शिकार होता रहा है। "राजनीति" का कुनबा इतना बड़ा है कि इंद्र, नारद, मंथरा, मारीचि, शकुनि, आर्य-द्रविड़, चाणक्य, तुगलक, क्लाइव, जिन्ना-नेहरू... सब महज इसके प्यादे भर रहे। पुराणों से लेकर विश्व इतिहास का कोई भी पन्ना पलटें, तो "राजनीति" पूरी ईमानदारी से अपना "जाति-धर्म" निभाती नजर आएगी। इसीलिए इसे बतौर "जाति" देखा-समझा जाए, तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। इस परिप्रेक्ष्य में यह कहावत एकदम सटीक बैठती है- "जात स्वभाव न छूटे..."।
देश-दुनिया के तमाम मुद्दों पर शास्त्रार्थ की बौद्धिकता बनारस की थाती भी है और शख्सियत भी। यहां की खास विधा है मुद्दे की तासीर को फेंटते रहने की, जिसे चाहे-अनचाहे यह अनपढ़ मन बचपन से जीता आ रहा है। इस बार मुद्दा इतर था, जिसे समझने की उधेड़बुन में पैर घिसटते अस्सीघाट से लंका तक आ पहुंचा था। कंधे पर बोझ बने गमछे से माथे का पसीना पोछ चायवाले के सामने पड़ी बेंच पर बैठा और अनायास मुंह खुला, "एक ठे चाय दिहा गुरु"। बगल में कुछ लोग चुनावी चर्चा में मग्न थे। उन्हीं में कोई लफ्ज फूटा, "देस से पॉलिटिक्स कभी न जाई गुरु, ई नई बिरादरी हो गइल हव, कहै लन न 'जात स्वभाव न छूटे, ...टांग उठा के..."। इतने में बाकी हंस पड़े और बातचीत ने माहौल पकड़ लिया।
मुझे उनकी बात जम गई, शायद मेरे अंतर्शास्त्रार्थ को भी थोड़ा स्पेस मिल गया था और उन्हें देखे बगैर उनमें रुचि लेने लगा। चाय की दो घूंट गले को सेंकी ही होगी कि उन्हीं में एक परिचित आवाज आई, "का हो किशन, अकेलहीं चाय पियबा..?" पलटा, तो पुराने मित्र थे जो काशी हिंदू विश्वविद्यालय से राजनीतिशास्त्र में पीएचडी कर इन दिनों गेस्ट लेक्चरर हो गए थे। उनके साथ कुछ विवि छात्र और स्थानीय बनारसी बैठे गपिया रहे थे। मैंने लपककर बेंच खिसकाई और बोला, "महादेव गुरु, भदैनी से अस्सी गए, लौउटानी एहर चल आए"। हल्के उपहास के साथ उन्होंने बाकियों से परिचय कराया और बोले, "अइसही एहर न आइल होबा, जरूर दिमाग दउड़त होइ"। मुस्कुराहट घुला जबाव, "बस ! मौजूदा राजनीति की उपयोगिता और परिणति विचारते थका, तो इधर आ बैठा। यहां किसी ने 'जात स्वभाव न छूटे..' कहावत बोली, तो सोचा सही जगह पहुंचा हूं"। इतना सुनते ही सभी ने ठहाका लगाया और चर्चा बढ़ चली।
चाय का दूसरा दौर शुरू हो चुका था। एक महाशय ने शब्दज्ञान फेंका, "गुरु, राजनीतिक समीकरण बदल रहा है। इस बार सत्ता बनाम राष्ट्रव्यापी विपक्ष की हवा बन रही है।" तज्ञ राजनीति में घुला जवाब आया, "कउनो माई के लाल ए बार मोदी के रोक न पाई, सब मिला आपसै में लड़-खप जइहैं"। विषयांतर होता देख मुझसे रहा न गया और टोका, "का मालिक !! इहे चर्चा रहि गयल हव। यहां तो "राजनीति" की बिरादरी (जाति) पर बात हो रही थी। आखिर राजनीति को जाति कैसे कह सकते हैं?? अगर, यह जाति है तो सवर्ण है या दलित!! और धर्म है तो उसकी परिभाषा??"
ताजा सवाल पर मानो सब अचकचा गए और जिसने उक्त कहावत को अंजाम दिया था, आंखों में भरपूर चमक के साथ ज्ञान उड़ेला "भाईसाहब! 'राजनीति' न सिर्फ धर्म निरपेक्ष है, बल्कि यह जाति निरपेक्ष भी है। इसका काल, समाज, परिस्थितियों से कोई लेना-देना नहीं है और यह पूरी शिद्दत से सभी जाति-धर्म-संप्रदाय को साधती है। जब लोग इसे समझ पाएं, तब तक इसके अनुचर अपना काम कर चुके होते हैं।" किसी ने पूछा, "तो अगले इलेक्शन में क्या होने वाला है??" जवाब, "अगले इलेक्शन की भूमिका तो बनने लगी है, हिंदू-मुस्लिम, सवर्ण-दलित के आन-बान-शान की दुहाई तो दे ही रहे हैं, नफरत के जरिए सत्ता हथियाने का जुगाड़ तलाशा जा रहा है।"
बौद्धिकता भरे वाक्यों ने कुछ क्षण के लिए सबको मौन कर दिया, तब तक
चायवाला चौथे दौर की चाय लेकर आया और बोला, "चहिए पर चर्चा होई कि भांग-ठंडई भी चली"। तारतम्य टूटा और किसी ने बढ़ते अंधेरे की ओर इशारा किया, फिर सभी ने चाय खत्म की और एक-दूसरे से अगली मुलाकात का वादा लेकर विदा हो लिए। मैं भी अपनी क्षुद्र संतुष्टि के साथ घर का रुख किया। लेकिन विचारों में कोलाहल था कि जिस अंधेरे ने हमारी चर्चा पर विराम लगाया, वह भले ही वक्त का हो और कुछ घंटों में छंट जाए, पर असली अंधेरा तो "राजनीति" का है जो मानव सभ्यता से शुरू होकर शायद सभ्यता के अंत तक चले।
मुश्किल हालात नहीं हम होते हैं,
बीज प्रेम के नहीं नफरत के बोते हैं।
जब कभी चले सौहार्द की बयार,
तो सबसे ज्यादा सुखी हम ही होते हैं।।
■ कृष्णस्वरूप






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