आज जब राजनीति में केंद्रीय पार्टियां देश की आजादी के 70 साल बाद भी पूरे भारत को समुचित विकास देने में असमर्थ नजर आ रहे हैं, तो ऐसे में लोगों में लोकतंत्र के खिलाफ आक्रोश बढ़ता जा रहा हैं, यहाँ तक की लोगों ने पूरे तंत्र को नाकारा मान लिया हैं तो ऐसे में लोकतंत्र को बचाने और लोगों में राजनीति के प्रति विश्वास जागृत करने में छोटे राजनीतिक दल महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।केंद्र की सत्ता पर भारी क्षेत्रीय पार्टियां
छोटे राजनीतिक दल एक नियत क्षेत्र में प्रभावी होते हैं। इस क्षेत्र की दुश्वारियों से ये भली भांति परिचित होते हैं। इनकी राजनीति इसी नियत क्षेत्र के विकास कार्यों के भरोसे चलती हैं और इनका जनता से सीधा संवाद भी होता हैं। एक ओर जहाँ केंद्रीय राजनीतिक दलों तक पहुंचना और काम करवाना आम जनता के लिए दुष्कर होता हैं, वही छोटे राजनीतिक दल के नेता सुगम्य रूप से लोगों के बीच मौजूद होते हैं। अगर उत्तर प्रदेश, बिहार का उदाहरण ले जहाँ से सबसे ज्यादा सांसद चुन कर केंद्र में पहुंचते हैं तो हम पाते हैं कि 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद से इन सांसदों की प्रासंगिकता लगभग समाप्त हो चुकी हैं।
जहाँ 2014 के पहले लोग आसानी से अपने सांसदों तक फ़रियाद पहुंचा सकते थे, वही केंद्रीय राजनीतिक पार्टी के सांसदों का यहाँ से चुन कर जाना अब लोगों पर भारी पड़ रहा हैं। सपा और बसपा जिसका प्रभुत्व उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा हैं। उनके चुने सांसद लोगों से आसानी से संवाद स्थापित कर पाते थे और केंद्र की सत्ता पर दबाब बना कर लोगों की आम समस्याओं में भरपूर सरकारी मदद भी पंहुचा पाते थे। पर केंद्रीय राजनीतिक पार्टियों के यहाँ से जीत के जाने के बाद ऐसा संभव नहीं हैं।
राज्यों में केंद्र की बढ़ता दखल
ये सही हैं कि राज्य सरकार स्थानीय शासन के लिए जिम्मेदार होती हैं पर विगत कुछ वर्षो में इसका रूप बदल गया हैं। भारतीय लोकतंत्र अब केंद्र की नीतियों से ज्यादा प्रभावित होता है। कारण साफ़ हैं जब केंद्रीय राजनीतिक पार्टियों के नुमाईन्दे केंद्र और राज्य दोनों में जीतते हैं तो वो अपनी राजनीतिक पार्टी के लिए ज्यादा जिम्मेदार होते हैं। ऐसे में इन पार्टियों के अध्यक्ष ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका में होते हैं। और इन अध्यक्षों का झुकाव केंद्रीय शासन के प्रति ज्यादा होता हैं न कि स्थानीय शासन के।
ऐसे में स्थानीय राज्य सरकारें भी इन्ही के इर्दगिर्द घूमने को मजबूर होती हैं। ऐसे में, आम जनता के लिए कठनाई दोगुनी हो जाती हैं। एक ओर राज्य सरकार के नुमाइंदे आम जनता के लिए कुछ न कर पाने की स्थिति में होते हैं तो उनके चुने सांसद उनसे दूर होते हैं। अगर स्थानीय दल के नेता केवल केंद्र में भी होते हैं तो जनता उनको अपने ज्यादा करीब मानती हैं। और यह सत्य भी हैं कि वो अपने क्षेत्र के आम लोगों के लिए ज्यादा कार्यकुशल होते हैं।
दक्षिण के राज्य
भारत के दक्षिण के राज्य इसके सबसे अच्छे उदाहरण हैं। वहां की जनता केंद्र और राज्य दोनों जगहों पर स्थानीय दल के नेता को चुन कर भेजती हैं। जो दोनों जगहों पर आम जनता की भरपूर मदद कर पाते हैं। देश की आजादी के बाद कुछ घटनाओं को छोड़ दे तो ऐसा विरले ही हुआ हैं कि दक्षिण के राज्य केंद्र की सत्ता में अपना प्रभुत्व दिखा पाए हो। इसके बावजूद भी वहां का विकास उत्तर भारत से कही ज्यादा हैं। कारण साफ़ हैं कि वहां की जनता छोटे और स्थानीय राजनीतिक दलों की प्रासंगिकता को भली भांति समझते हैं। दक्षिण की जनता केंद्र और राज्य के चुनावों में अपने क्षेत्र के योग्य उम्मीदवार को चुनना ज्यादा श्रेयकर समझती हैं न कि किसी केंद्रीय दल के उम्मीदवार को चुन कर दिल्ली के चक्कर लगाना।
ऐसे में आज की दुष्कर परिस्थितयों में हम इतना ही कह सकते हैं कि अगर लोगों को लोकतंत्र में फिर से विश्वास कायम करना हैं, तो उन्हें छोटे और स्थानीय दल के नेताओं की उपयोगिता और प्रासंगिकता को समझना होगा।
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