प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक और बयान संदेह के घेरे में आ गया हैं, जब उनसे एक इंटरव्यू के दौरान पूछा गया कि आप के शासन में बेरोजगारी बढ़ी हैं, तो उन्होंने कहाँ कि 'देश में रोजगार की कमी नहीं हैं, रोजगार के आंकड़ों की कमी हैं।' 2010 से UPA सरकार ने देशभर में रोजगार और बेरोजगारी के आंकड़े जुटाना शुरू किया था। यह आंकड़े मोदी सरकार ने 2016 के बाद से जुटाना बंद कर दिया। जहाँ एक ओर देश में बेरोजगारी बढ़ती जा रही हैं, और गंभीर रूप धारण करती जा रही हैं, ऐसे में मोदी के इस बयान पर आम जन मानस हताश और निराश हैं।2016 के लेबर ब्यूरों की रिपोर्ट के अनुसार बेरोजगारी पांच साल के चरम पर 5% पर थी, इसमें महिलाओं में यही संख्या 8.7% और पुरुषों में 4.3% थी। इन आकड़ों में ग्रामीण क्षेत्र में बेरोजगारी 5.1% पर और शहरी क्षेत्र में 4.9 % पर थी।
सरकार की नीतियों और वादों को विफल साबित करते इन आंकड़ों के परिणाम को देखते हुए सरकार को इस दिशा में सोचना और कार्य करना चाहिए था, तो वही केंद्र सरकार ने इसके बाद से सालाना रोजगार और बेरोजगारी रिपोर्ट के लिए आंकड़े जुटाना ही बंद कर दिया।
इसी रिपोर्ट में यह भी कहाँ गया था कि पूरे भारत में 77% घर ऐसे हैं, जिसके एक भी सदस्य के पास आय का कोई निश्चित श्रोत नहीं है। आंकड़े हमें-आपको चौका सकती है, लेकिन केंद्र सरकार की स्थिति कुछ ऐसी हो गए है,“भैस के आगे बीन बजाए, भैस खड़ी पगुराए।”
■ सिद्धार्थ सिंह



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