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‛धारा 370’ और ‛राम मंदिर’ अब कब?

अपनी स्थापना के दिनों से ही भारतीय जनता पार्टी के मुख्य एजेंडे में दो बातें
सबसे महत्वपूर्ण रही हैं, एक अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण करना और दूसरा जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटाना। भारतीय जनता पार्टी हर बार इन दो मुद्दों को भुना कर केंद्र में सत्ता की सीढ़िया चढ़ती आई हैं। आज पूर्ण बहुमत से बनी बीजेपी सरकार के लिए आगामी लोकसभा चुनाव कठिन माना जा रहा है, तो इसका सबसे बड़ा कारण यही दो मुद्दे हैं। हालिया हुए उपचुनावों में बीजेपी को मिली करारी हार क्या ये बता रही हैं कि मोदी देश की जनता को समझने में नाकामयाब हुए हैं और उन्होंने भी आम जनता को पहले की सरकारों की तरह केवल वोट देने की मशीन मानना शुरू कर दिया हैं।



2014 के हुए लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने विकास के एजेंडे पर वोट माँगा और पूरे भारत में विकास के गुजरात मॉडल को लागू करने का भरोसा दिलाया। मोदी के वादों का यह एक ऐसा दौर था, जिसमें उन्होंने हर ख़ास-ओ-आम को सरकार बनने के बाद कुछ न कुछ देने का वायदा किया। ये वादों का सिलसिला यही नहीं रुका। मोदी समय-समय पर होने वाले राज्यों के चुनावों के पहले भी नए वादे सामने लेकर आए। अब जब मोदी सरकार अपनी सत्ता के अंतिम साल में कार्यरत हैं तो विपक्ष लोगों को ये विश्वास दिलाने में कामयाब दिख रहा हैं कि मोदी सरकार केवल वादों की सरकार हैं।

मोदी सरकार केवल वादों की सरकार :कितनी सच्चाई 

आज लोगों का मोदी से विश्वास उठता जा रहा हैं। विश्वास उठने का सबसे बड़ा कारण अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण न होना और कश्मीर में धारा 370 पर कोई ठोस कदम न उठा पाना हैं। मोदी सरकार अपने 4 साल के कार्यकाल में एक बार भी इन मुद्दों पर प्रतिबद्ध नहीं दिखाई दी। मोदी ने गाहे बगाहे राज्यों के चुनाव में इन मुद्दों को उठाया पर जब भी इन मुद्दों पर कार्य करने का समय आया तो मोदी खुद को विपक्ष के पीछे छुपाने का प्रयास करते नजर आए। मोदी ने इन मुद्दों पर कोई भी प्रगति न हो पाने का ठीकरा विपक्ष पर फोड़ा और आगे बढ़ते नजर आए। लोकतंत्र में चुनी हुई सरकार ही सर्वमान्य होती हैं इसका उदाहरण वो शायद इंदिरा गाँधी से नहीं ले पाए जिन्होंने तमाम दुश्वारियों को नकारते हुए भी पकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए थे। तभी आज केंद्र सरकार की सहयोगी पार्टी शिवसेना खुल; कर मोदी को वादों और जुमलों की सरकार कह रही हैं।

सत्ता के सुख के लिए बीजेपी-पीडीपी गठबंधन और धारा 370 को किनारे करना
अब जब मोदी 2019 के लोकसभा चुनावों की तैयारी में जुटे हैं और मगहर में आम जन सभा कर दलितों और पिछड़ों को लुभाने का प्रयास कर रहें हैं तो हालिया हुए कश्मीर के मुद्दे को शायद भूल गए हैं। यहाँ उन्होंने केवल सत्ता में बने रहने के लिए पीडीपी के गठबंधन में धारा 370 के मुद्दे को ठंढे बस्ते में डाल दिया। अब जब जनता उनसे सवाल पूछ रही हैं तो एक बार फिर से बीजेपी ने नाकामियों का ठीकरा पीडीपी पर डाल कर खुद को पाक साफ़ साबित करने का प्रयास किया हैं। पर कश्मीर की वर्तमान स्थिति कुछ और ही बयां करती हैं। आज कश्मीर सबसे ज्यादा अव्यवस्थित हैं उस समय बीजेपी का इस तरह का फैसला हर एक को सोचने को मजबूर कर गया कि क्या ये वही बीजेपी हैं, जिसके अगुआ ने कभी अपनी चुनावी सभा से दहाड़ा था कि जवान के एक सर के बदले आतंकवादियों के दस सर लाएंगे।

क्या मोदी अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण चाहते हैं या ये भी एक चुनावी जुमला हैं ?

मोदी के चार सालों के कार्यकाल में जनता इतना तो समझ ही गई हैं कि मोदी अन्य राजनेताओं से अलग नहीं हैं। मुद्दा चाहे गरीबी मिटने का हो या विकास का, चाहे रोजगार का हो या गंगा सफाई का, युवाओं के बेहतर भविष्य का हो या महिलाओं की सुरक्षा का मोदी की कथनी और करनी में उतना ही फर्क हैं जितना अन्य राजनेताओं की। मोदी ने एक बार भी राम मंदिर निर्माण के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं किया; हर बार साधु संतों के नाराज होने पर उन्हें कोई जुमला थमा दिया। आम जनता को मोदी दिग्भ्रमित करने में भी कामयाब हुए और उन्हें चार साल तक शांत रखा की विपक्ष उन्हें ऐसा करने से रोक रहा हैं। अब जब चुनाव का समय नजदीक आ रहा हैं तो मोदी को इस बार जनता के सामने किस रूप में पेश किया जाए ये उनके योजनाकारों के पसीने छुड़ा रहा हैं।
जानकारों  की माने, तो मोदी ने बीजेपी के हर सर्वमान्य चेहरे को मिटा कर एक तानाशाही रवैये में चार साल तक केंद्र में शासन किया हैं। जानकार ये भी कहने से गुरेज नहीं करते की लोकतंत्र सामूहिक जिम्मेदारी का प्रतिफल होता हैं न कि तानाशाही शासन का। मोदी कभी लोकतंत्र की गरिमा समझ ही नहीं पाए या ये भी कह सकते हैं कि मोदी लोकतंत्र को समझना या मान्यता देना ही नहीं चाहते।
◼️सिद्धार्थ सिंह

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