जन्मदिवस विशेष: गंगा किनारे इलाहाबाद में जन्में हरिप्रसाद चौरसिया का बचपन बनारस में बीता और यहीं उन्होंने संगीत के गुर भी यहीं सीखे...
भारतीय बांसुरी वादन कला को विश्व स्तर पर पहचान दिलाने और 60 सालों से अपनी बांसुरी की मधुर तान छेड़ने वाले पद्मविभूषण पंडित हरि प्रसाद चौरसिया आज 74 साल के हो गए...
‛रंग बरसे भीगे चुनार वाली...’
यह गीत आज भी लोगों के जेहन में ताजा है। खासकर होली की हुड़दंग तो जैसे इस गीत के बिना अधूरी सी लगती है। लोगों को इस लोकप्रिय गीत को परदे पर प्रस्तुत करने वाले अभिनेता भी याद हैं, लेकिन संगीतकार के बारे में इक्का दुक्का ही जानते होंगे। पंडित हरि प्रसाद चौरसिया और मशहूर संतूर वादक पंडित शिव प्रसाद शर्मा की जोड़ी “शिव-हरि” ने सिलसिला, चांदनी, लम्हे और डर जैसी फिल्मों में सुपरहिट संगीत दिया। इस जोड़ी के संगीतबद्ध किए गीत, ‛रंग बरसे भीगे चुनर वाली..., ये कहां आ गए हम..., मेरे हाथों में नौ-नौ चूड़ियां... और जादू तेरी नजर...’आज भी सुपरहिट हैं।
पिता पहलवान, बेटा कलाकार
पंडित हरि प्रसाद चौरसिया के पिताजी एक पहलवान थे और वो चाहते थे कि उनका बेटा भी पहलवान बने। हरि प्रसाद चौरसिया को पहलवानी में मजा नहीं आता था। बकौल हरि प्रसाद, "मुझे पहलवानी में मज़ा नहीं आता था। अखाड़े में दूसरों के हाथों मार खाओ या उन्हें चित कर दो, ये सब काम में मेरा मन नहीं लगता था। मैं पिताजी से छुपकर बांसुरी बजाया करता था।"
निजी जीवन और संगीत
पंडित हरिप्रसाद चौरसिया का जन्म 1 जुलाई, 1938 को इलाहाबाद में हुआ था। जब वे पांच बरस के थे, तभी माता का निधन हो गया। हरिप्रसाद चौरसिया का बचपन गंगा किनारे बनारस में बीता। उनकी शुरुआत तबला वादक के रूप में हुई। अपने पड़ोसी पंडित राजाराम से उन्होंने संगीत की बारीकियां सीखीं। इसके बाद बांसुरी सीखने के लिए वह वाराणसी के पंडित भोलानाथ प्रसाना के पास गए। संगीत सीखने के बाद उन्होंने काफी समय ऑल इंडिया रेडियो के साथ भी काम किया। संगीत में उत्कृष्टता हासिल करने की खोज उन्हें बाबा अलाउद्दीन ख़ाँ की सुयोग्य पुत्री और शिष्या अन्नापूर्णा देवी की शरण में ले गयी, जो उस समय एकांतवास कर रही थीं और सार्वजनिक रूप से वादन और गायन नहीं करती थीं। अन्नपूर्णा देवी की शागिर्दी में उनकी प्रतिभा में और निखार आया और उनके संगीत को जादुई स्पर्श मिला।
■ काशी पत्रिका
भारतीय बांसुरी वादन कला को विश्व स्तर पर पहचान दिलाने और 60 सालों से अपनी बांसुरी की मधुर तान छेड़ने वाले पद्मविभूषण पंडित हरि प्रसाद चौरसिया आज 74 साल के हो गए...
‛रंग बरसे भीगे चुनार वाली...’
यह गीत आज भी लोगों के जेहन में ताजा है। खासकर होली की हुड़दंग तो जैसे इस गीत के बिना अधूरी सी लगती है। लोगों को इस लोकप्रिय गीत को परदे पर प्रस्तुत करने वाले अभिनेता भी याद हैं, लेकिन संगीतकार के बारे में इक्का दुक्का ही जानते होंगे। पंडित हरि प्रसाद चौरसिया और मशहूर संतूर वादक पंडित शिव प्रसाद शर्मा की जोड़ी “शिव-हरि” ने सिलसिला, चांदनी, लम्हे और डर जैसी फिल्मों में सुपरहिट संगीत दिया। इस जोड़ी के संगीतबद्ध किए गीत, ‛रंग बरसे भीगे चुनर वाली..., ये कहां आ गए हम..., मेरे हाथों में नौ-नौ चूड़ियां... और जादू तेरी नजर...’आज भी सुपरहिट हैं।
पिता पहलवान, बेटा कलाकार
पंडित हरि प्रसाद चौरसिया के पिताजी एक पहलवान थे और वो चाहते थे कि उनका बेटा भी पहलवान बने। हरि प्रसाद चौरसिया को पहलवानी में मजा नहीं आता था। बकौल हरि प्रसाद, "मुझे पहलवानी में मज़ा नहीं आता था। अखाड़े में दूसरों के हाथों मार खाओ या उन्हें चित कर दो, ये सब काम में मेरा मन नहीं लगता था। मैं पिताजी से छुपकर बांसुरी बजाया करता था।"
निजी जीवन और संगीत
पंडित हरिप्रसाद चौरसिया का जन्म 1 जुलाई, 1938 को इलाहाबाद में हुआ था। जब वे पांच बरस के थे, तभी माता का निधन हो गया। हरिप्रसाद चौरसिया का बचपन गंगा किनारे बनारस में बीता। उनकी शुरुआत तबला वादक के रूप में हुई। अपने पड़ोसी पंडित राजाराम से उन्होंने संगीत की बारीकियां सीखीं। इसके बाद बांसुरी सीखने के लिए वह वाराणसी के पंडित भोलानाथ प्रसाना के पास गए। संगीत सीखने के बाद उन्होंने काफी समय ऑल इंडिया रेडियो के साथ भी काम किया। संगीत में उत्कृष्टता हासिल करने की खोज उन्हें बाबा अलाउद्दीन ख़ाँ की सुयोग्य पुत्री और शिष्या अन्नापूर्णा देवी की शरण में ले गयी, जो उस समय एकांतवास कर रही थीं और सार्वजनिक रूप से वादन और गायन नहीं करती थीं। अन्नपूर्णा देवी की शागिर्दी में उनकी प्रतिभा में और निखार आया और उनके संगीत को जादुई स्पर्श मिला।
■ काशी पत्रिका

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