ग्रीष्मकालीन अवकाश के बाद आज विद्यालय खुला और कक्षा में बच्चों को देख एक अध्यापिका को कितनी प्रसन्नता होती है वह क्या लिखा जा सकता है। सभी विद्यार्धियों ने छुट्टियों में करने को दिया गया गृह-कार्य दिखाया। सभी का कार्य अच्छा कहा जा सकता था पर एक बच्चा जिसका की कार्य सबसे कम अच्छा दिखाई पड़ रहा था, अपना कार्य दिखाने में सबसे अधिक रूचि वो ही ले रहा था।
जब एक-एक कर बच्चो ने अपने-अपने किये कार्य के बारे में बताना शुरू किया और उनसे उस से जुड़े प्रश्न किये गए तब मात्र उस एक बच्चे को छोड़ सभी ने बहुत ही कम प्रश्नो के उत्तर देने में समर्थता दिखाई या फिर उन्होंने रटे -रटाये उत्तर ही दिए।
अब जब मैंने उस एक बच्चे से जिसने सबसे कुछ कम अच्छा कार्य किया था;पुछा ,' इस काम को करने में तुमने किसकी सहायता ली। ' बच्चे ने कहा ,' मैडम, ये सब तो मैंने खुद ही किया है। ' मैंने पूछा ,' तुमने क्या सीखा बताओ। ' बच्चे ने उत्तर दिया ,' काम जब आप को दिया जाये तो उसको जैसे भी हो खुद से ही करना चाहिए। जिससे दूसरी बार हम उससे आगे सीख कर और अच्छा करे। ' उसके चमकते चेहरे और आत्मविश्वास को देख मैंने पूछा ,' तुम्हारे साथी कह रहे है के तुमने अच्छा नहीं किया, क्या तुम निराश नहीं हुए ?' उसने बहुत ही अच्छा उत्तर दिया ,' नहीं , बिलकुल भी नहीं हुआ। मुझे भी लगता है के उनका काम अच्छा है। पर आगे भी उनको जीवन में सहायता चाहिए होगी काम पूरा करने को जबकि तब तक़ मैं खुद के बल पर करना सीख जायूँगा।'
ठीक ही है जीवन में जो स्वम लगा रहता है, अपना काम स्वम के बल पर करता है ,प्रयासरत रहता है , स्वम में पूरा हो जाता है।अगर जब गिर गए या किसी ने गिराया ही तो ख़ुद ही को कैसे उठाये ये कला भी सीखनी चाहिए।
अदिति

No comments:
Post a Comment