प्रधानमंत्री मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी की ट्रैफिक व्यवस्था दिनों दिन चरमराती जा रही। इस चिलचिलाती धूप में घंटों जाम में फंसे रहना आम जनता की नियति हो गई हैं। मोदी के केंद्र में प्रधानमंत्री बनने के बाद वाराणसी में ट्रैफिक व्यवस्था के सुधार के लिए पानी की तरह पैसे बहाए गए।
लगभग इतने छोटे शहर की हर सड़क पर डिवाइडर बनवाया गया। चौराहों पर ट्रैफिक सिग्नल लगवाया गया और तो और कई क्षेत्रों के रूट डाइवर्जन और नो वेह्किल जोन भी घोषित किया गया पर नतीजा सिफर ही साबित हुआ।
योजनाओं की प्लानिंग के बिना कार्य करने का यही नतीजा होता हैं। जब रोड डिवाइडरों का निर्माण हो रहा था, उस समय भी लगभग तीन या चार बार एक ही डिवाइडर को बनवाया गया था। ये खराब प्लानिंग का ही नतीजा था कि जिन चौराहों पर गाड़ियों को पास करने की भी जगह नहीं हैं, वहां पर ट्रैफिक सिग्नल लगा दिए गए।
अब यही ट्रैफिक सिग्नल बंद पड़े है और प्रशासन को मुँह चिढ़ा रहे हैं। विश्व के सबसे पुराने शहर की ऐसी दुर्दशा हो गई है कि अब यहाँ के निवासी प्रशासन के खिलाफ आंदोलन करने को मजबूर हो रहे हैं।
घाटों और चाय की अडियों पर ये चर्चा आम होती जा रही हैं कि विकास के नाम पर जीतने वाला प्रधानमंत्री जब अपने संसदीय क्षेत्र का कायाकल्प नहीं कर पाया तो देश का क्या करेगा।
■काशी पत्रिका
लगभग इतने छोटे शहर की हर सड़क पर डिवाइडर बनवाया गया। चौराहों पर ट्रैफिक सिग्नल लगवाया गया और तो और कई क्षेत्रों के रूट डाइवर्जन और नो वेह्किल जोन भी घोषित किया गया पर नतीजा सिफर ही साबित हुआ।
योजनाओं की प्लानिंग के बिना कार्य करने का यही नतीजा होता हैं। जब रोड डिवाइडरों का निर्माण हो रहा था, उस समय भी लगभग तीन या चार बार एक ही डिवाइडर को बनवाया गया था। ये खराब प्लानिंग का ही नतीजा था कि जिन चौराहों पर गाड़ियों को पास करने की भी जगह नहीं हैं, वहां पर ट्रैफिक सिग्नल लगा दिए गए।
अब यही ट्रैफिक सिग्नल बंद पड़े है और प्रशासन को मुँह चिढ़ा रहे हैं। विश्व के सबसे पुराने शहर की ऐसी दुर्दशा हो गई है कि अब यहाँ के निवासी प्रशासन के खिलाफ आंदोलन करने को मजबूर हो रहे हैं।
घाटों और चाय की अडियों पर ये चर्चा आम होती जा रही हैं कि विकास के नाम पर जीतने वाला प्रधानमंत्री जब अपने संसदीय क्षेत्र का कायाकल्प नहीं कर पाया तो देश का क्या करेगा।
■काशी पत्रिका

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