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'आपकी-गृहस्थी'- नीरसता में भी रस ढूंढ़ना ही जीवन है।...


हर दिन जीवन बदलाव तो मांगता ही है। यह सोच एक उम्मीद कायम रखना के चलो कल जो हुआ सो हुआ अब आज हम फिर से कोशिश करते हैं। ऐसा हम सभी सोचते हैं। औऱ इससे सामने खड़ा आज का प्रश्न आने वाले कल के ऊपर छोड़ कर हम थोड़ा हल्का महसूस करते है। गृहस्थी में भी बहुत सी बातों को हम कल पर टाल कर निश्चिंत हो लेते हैं। 


आभा के सामने हर दिन की एक ही समस्या थी, के टाइम पर सब कुछ सलटा कर वह कैसे अपने लिए भी थोड़ा समय निकाल सके। पर कोशिश कर के भी उसका समय घर के काम में ही बीत जाता। चलो कल वह सब कुछ जल्दी निपटा कर अपनी योग टीचर से मिल आएगी। उसने बचे हुए क्लासेज पूरे करने का मन बना लिया था। क्लास जाती तो लगता दिन में उसने बस अपने लिए भी कुच्छ किया। आगे वह ख़ुद भी योग क्लास खोलना चाहती थी। इधर घर की ज़िम्मेदारी भी ऐसी की समय निकलने से रहा।  
आख़िर उसने उपाए ढूंढ ही लिया। सीधे गयी औऱ मोर्निंह बैच की क्लास जॉइन कर आई। अगली सुबह सीधे क्लास। घर लौट कर बाक़ी काम। पति को भी सप्ताह बीतते-बीतते आदत हो ही गयी,सुबह की चाय ख़ुद बना लेने की। आभा बाक़ी काम अब ज़्यादा मन लगा कर समय से कर लेती है, आख़िर इसमें वह आराम से क्लास जा सकती है। 


गृहस्थी में बंधन बस स्त्री ही महसूस करे तो उसके जीवन के ये साल कितने नीरस हो जाते हैं, यह बात स्त्री ही समझती है। सही मायनों में जीवन तो नीरसता में भी रस ढूंढ लेना ही है। जिसे आज हम 'me time' कहते है, यह वाक़ई में न मिले तो दिन पूरा नहीं होता।



-अदिति-
 

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