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“गांधी” होने की कीमत चुकाते राहुल

जन्मदिन विशेष।।
भारतीय की राजनीति को गांधी परिवार से अलग करके नहीं देखा जा सकता और न ही गांधी परिवार की राजनीति से इतर पहचान मिली है। ऐसे में गांधी परिवार में जन्म लेने के साथ ही राहुल गांधी को राजनीति से जोड़कर देखा जाने लगा, पर क्या “गांधी” होना सिर्फ वरदान है-  

19 जून, 1970 को दिल्ली में सोनिया-राजीव गांधी के घर बच्चे का जन्म हुआ ‘राहुल’। साधारण बच्चों की तरह उसका भी बचपन था। दादी का दुलारा राहुल खेल-खिलौनों के साथ बड़ा होने लगा।

14 की उम्र में दादी और 21 में पिता को खोया
दादी ने कभी ममता का आंचल बिछाया, तो कभी सख्ती भी दिखाई। छोटे राहुल को अंधेरे से डर लगता था। एक दिन उनकी दादी (इंदिरा गांधी) ने उन्हें एक रात बगीचे में अकेला छोड़ दिया था। राहुल बहुत रोए पर दादी ने दया नहीं दिखाई। परिमाण यह हुआ कि राहुल का डर भाग गया। यूँ ही जिंदगी अच्छी बीत रही थी कि 31 अक्टूबर, 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या हो गई। उस समय राहुल महज 14 साल के थे। दादी को खोकर राहुल बहुत रोए थे। शुरुआती पढ़ाई दिल्ली के मॉडर्न स्कूल से करने के बाद राहुल गांधी देहरादून के दून स्कूल में पढ़ रहे थे, लेकिन इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सुरक्षा कारणों से उन्हें अपनी पढ़ाई घर से ही करनी पड़ी। दादी को खोकर उदास राहुल अपनी जिंदगी आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे थे। अभी 21 की उम्र में पहुंचे ही थे कि उनके पिता (राजीव गांधी) की हत्या 21 मई, 1991 को एक चुनावी सभा में कर दी गई।

सुरक्षाकर्मियों के बीच जिंदगी
आज भी चुनावी रैलियों के दौरान राहुल गांधी सुरक्षा घेरा तोड़कर बाहर निकल जाते हैं। ऐसे में अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं की सुरक्षा में जीना उन्हें कितना नापसन्द है, लेकिन सुरक्षाकर्मी उनकी पसन्द नहीं उनकी मजबूरी हैं। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कुछ साल घर पर पढ़ाई करने के बाद 1989 में उन्होंने दिल्ली के सेंट स्टीफेंस कॉलेज में दाखि‍ला लिया। उनका यह दाखि‍ला पिस्टल शूटिंग में उनके हुनर की बदौलत स्पोर्ट्स कोटे से हुआ। उन्होंने इतिहास ऑनर्स में नाम लिखवाया। वे सुरक्षाकर्मियों के साथ कॉलेज आते थे। तकरीबन सवा साल बाद 1990 में उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया।

राहुल को बनना पड़ा ‛रॉल विंसी’
पिता की हत्या के बाद राहुल गांधी हार्वर्ड विश्वविद्यालय के रोलिंस कॉलेज फ्लोरिडा से साल 1994 में अपनी कला स्नातक की उपाधि हासिल की। उन्होंने साल 1995 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के ट्रिनिटी कॉलेज से डेवलपमेंट स्टडीज में एम.फ़िल. की उपाधि हासिल की।
स्नातक की पढ़ाई करने के बाद वे लंदन चले गए, जहां उन्होंने प्रबंधन गुरु माइकल पोर्टर की प्रबंधन परामर्श कंपनी मॉनीटर ग्रुप के साथ तीन साल तक काम किया। हार्वर्ड बिजनेस स्कूल के प्रोफेसर माइकल यूजीन पोर्टर को ब्रैंड स्ट्रैटजी का विद्वान माना जाता है। सुरक्षा कारणों की वजह से राहुल गांधी ने 'रॉल विंसी' के नाम से काम किया। उनके सहयोगी नहीं जानते थे कि वे राजीव गांधी के बेटे और इंदिरा गांधी के पौत्र के साथ काम कर रहे हैं।

आम जिंदगी की चाहत
ज्यादातर लोग खास जिंदगी चाहते हैं, लेकिन कई बार खास होने की बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। राहुल गांधी हमेशा सुरक्षाकर्मियों से घिरे रहे हैं, इसलिए उन्हें आम इंसान की तरह जीने का मौका नहीं मिला। वे अपना जीवन जीना चाहते थे। राहुल गांधी ने एक बार कहा था, "अमेरिका में पढ़ाई के बाद मैंने जोखिम उठाया और अपने सुरक्षा गार्डो से निजात पा ली, ताकि इंग्लैंड में आम जिंदगी जी सकूं।”राहुल गांधी को घूमने-फिरने और खेलकूद का बचपन से ही शौक रहा है। उन्होंने तैराकी, साईलिंग और स्कूबा-डायविंग की और स्वैश खेला। उन्होंने बॉक्सिंग सीखी और पैराग्लाइडिंग का भी प्रशिक्षण लिया।

पिता की तरह शौक
राहुल गांधी के बहुत से शौक उनके पिता राजीव गांधी जैसे ही हैं। अपने पिता के तरह उन्होंने दिल्ली के नजदीक हरियाणा स्थित अरावली की पहाड़ियों पर एक शूटिंग रेंज में निशानेबाजी सीखी। उन्हें भी आसमान में उड़ना उतना ही पसंद है, जितना उनके पिता को पसंद था। उन्होंने भी हवाई जहाज उड़ाना सीखा। वे अपनी सेहत का भी काफी ख्याल रखते हैं और व्यस्त दिनचर्या में भी कसरत के लिए समय निकाल ही लेते हैं। साथ ही वे रोज दस किमी तक जॉगिंग करते हैं।

मुंबई में शुरू की फर्म
दस साल बाद 2002 के अंत में राहुल भारत लौटे। उन्होंने मुंबई में एक इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी आउटसोर्सिग फर्म, बेकॉप्स सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड बनाई। रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज में दर्ज आवेदन के मुताबिक इस कंपनी का मकसद घरेलू और अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों को सलाह और सहायता मुहैया कराना, सूचना प्रौद्योगिकी में परामर्शदाता और सलाहकार की भूमिका निभाना और वेब सॉल्यूशन देना था। साल 2004 के लोकसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग को दिए हलफनामे के मुताबिक बेकॉप्स सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड में राहुल गांधी की हिस्सेदारी 83 प्रतिशत थी।

2003 से सियासत में दखल
राहुल गांधी के सियासी जीवन  की शुरुआत भी अचानक ही हुई। वे साल 2003 में कांग्रेस की बैठकों और सार्वजनिक समारोहों में नजर आए। एक दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट श्रृंखला देखने के लिए एक सद्भावना यात्रा पर वह अपनी बहन प्रियंका गांधी के साथ पाकिस्तान भी गए। 7 मार्च, 2004 में लोकसभा चुनाव का ऐलान हुआ, तो राहुल गांधी ने सियासत में आने का ऐलान कर दिया। उन्होंने अपने पिता के पूर्व निर्वाचन क्षेत्र अमेठी से लोकसभा चुनाव लड़ा। इससे पहले उनके चाचा संजय गांधी ने भी इसी क्षेत्र का नेतृत्व किया था। उस समय उनकी मां सोनिया गांधी यहां से सांसद थीं। उन्होंने अपने नजदीकी प्रतिद्वंदी को एक लाख वोटों से हराकर शानदार जीत हासिल की। इस दौरान उन्होंने सरकार या पार्टी में कोई ओहदा नहीं लिया और अपना सारा ध्यान मुख्य निर्वाचन क्षेत्र के मुद्दों और उत्तर प्रदेश की राजनीति पर केंद्रित किया।
काशी पत्रिका

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