गुल ओ महताब लिखना चाहता हूँ,
मैं अपने ख्वाब लिखना चाहता हूँ।
मोहब्बत से भरा है दिल का दरिया,
मगर पायाब लिखना चाहता हूँ।
लिखूँ कैसे कि सारे शेर तुम पर,
बहुत नायाब लिखना चाहता हूँ।
मैं अपना और तुम्हारा नाम इक दिन,
कनार-ए-आब लिखना चाहता हूँ।
मैं खुद को बादशाह-ए-इश्क लिख कर,
तुम्हें बे-ताब लिखना चाहता हूँ।
मैं सारे जख्म जो तुम से मिले हैं,
उन्हें शादाब लिखना चाहता हूँ।
मैं 'साबिर' जिंदगी के सारे मंजर,
पस-ए-गिर्दाब लिखना चाहता हूँ।
■ साबिर वसीम
मैं अपने ख्वाब लिखना चाहता हूँ।
मोहब्बत से भरा है दिल का दरिया,
मगर पायाब लिखना चाहता हूँ।
लिखूँ कैसे कि सारे शेर तुम पर,
बहुत नायाब लिखना चाहता हूँ।
मैं अपना और तुम्हारा नाम इक दिन,
कनार-ए-आब लिखना चाहता हूँ।
मैं खुद को बादशाह-ए-इश्क लिख कर,
तुम्हें बे-ताब लिखना चाहता हूँ।
मैं सारे जख्म जो तुम से मिले हैं,
उन्हें शादाब लिखना चाहता हूँ।
मैं 'साबिर' जिंदगी के सारे मंजर,
पस-ए-गिर्दाब लिखना चाहता हूँ।
■ साबिर वसीम



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